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एजुकेशन टिप्सः अच्छी स्कूल लायब्रेरी की 5 खास बातें

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एक लायब्रेरी एजुकेटर पुस्तकालय के बारे में कहते हैं कि बच्चों को यहां अपनी बात कहने का मौका मिलना चाहिए।

स्कूल की लायब्रेरी एक ऐसी जगह है जहां बच्चे किताबों से दोस्ती करना सीखते हैं। अपने पठन कौशल का इस्तेमाल करने का अवसर पाते हैं। अच्छा पाठक बनने की सीढ़ियां चढ़ते हैं। किताबों को पढ़ने की आदत एक बच्चे की ज़िंदगी में आजीवन काम आती है।

शुरू में हमारा पढ़ना, पढ़ना सीखने के लिए होता है। मगर बाद में सीखने के लिए पढ़ना होता है। यानि अपनी जरूरतों व रुचि के अनुरूप एक व्यक्ति किताबों का चुनाव करता है। उनसे अपने जरूरत की चीज़ों का उपयोग वास्तविक ज़िंदगी में समस्याओं का समाधान करता है। अगर आप अपने स्कूल में लाब्रेरी को बेहतर बनाना चाहते हैं तो ये 5 बातें आपकी मदद कर सकती हैं।

सभी बच्चों के स्तर की किताबें हैं जरूरी

स्कूल लायब्रेरी में किताबें बच्चों के पठन स्तर के अनुरूप होनी चाहिए। यानि पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों से लेकर आठवीं-दसवीं तक के बच्चों के लिए किताबें होनी चाहिए। ताकि किसी बच्चे के मन में ऐसी बात न आए कि लायब्रेरी तो सिर्फ बड़े लोग जाते हैं। बहुत से कॉलेज में ऐसा होता है कि पीजी के लोगों को जो सुविधा लायब्रेरी मे मिलती है, वह यूजी वालों को नहीं मिलती। ठीक यही बात स्कूल स्तर पर भी दिखाई देती है। कुछ शिक्षक कहते हैं, “अरे, पहले-दूसरी वालों को तो पढ़ना भी नहीं आता। इनको किताबें देकर क्या करेंगे?”

अगर आप कर रहे हैं लायब्रेरी का संचालन

अगर आपके ऊपर स्कूल के लायब्रेरी के संचालन की जिम्मेदारी है तो कुछ बातों का ध्यान रखें। सभी बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें, मगर सिर्फ बातों के जरिए नहीं। बच्चों को किताबें पढ़कर सुनाएं। किताबों के बारे में बताएं कि फलां किताब में कौन सी जानकारी है। फलां किताब की कहानी में क्या-क्या होता है? बच्चों को किताबों की दुनिया से धीरे-धीरे परिचित होने दे। उनकी स्वाभाविक रुचि को परिपक्व होने का पूरा मौका दें।

बच्चों को दें ‘लायब्रेरी इमर्जन’ का मौका

लायब्रेरी इमर्जन है जरूरी। यानि स्कूल में आने वाले नए बच्चों को लायब्रेरी में कौन-कौन सी किताबें हैं यह जानने का मौका दें। उनको किताबों के साथ संवाद करने का मौका दें। हो सकता है कि छोटे बच्चे किताबों की व्यवस्था को थोड़ा तितर-बितर करें। उनको ऐसा करने दें। बस उनको ग़ौर से देखें कि वे कैसे किताबों के साथ दोस्ती करते हैं, अपने दोस्तों को किताबों के बारे मैं कैसे बताते हैं, अपने आसपास की चीज़ों को किताबों में देखकर क्या प्रतिक्रिया देते हैं? इन सारी बातों को देखना आपको खुशी और ऊर्जा से भर देगा। ऐसे अनुभव आपको अपने काम से प्यार करने के प्रेरित करें।

बच्चों को किताबें चुनने का पर्याप्त समय दें

बच्चों को किताबों के चुनाव में समय लगता है। जैसे शॉपिंग मॉल में या सब्जी के बाज़ार के बाज़ार से खरीददारी में वक्त लगता है। वैसे ही किताबों के चुनाव में वक्त लगता है। यह वक्त बच्चों की ज़िंदगी में बड़े बदलाव की आहट सरीखा हो सकता है। इसलिए उनको टोके नहीं। हर बच्चे को अपनी किताब चुुनने का अपना वक्त लेने दें। उनके ऊपर गुस्सा न करें। उनके ऊपर चीखें नहीं, क्योंकि आप बड़े हैं आपको अपनी पसंद-नापसंद पता है। मगर बच्चे अभी इन चीज़ों को तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए उनको अपना वक्त लेने दें।

लायब्रेरी का मतलब सिर्फ किताबें नहीं हैं

स्कूल की लायब्रेरी सिर्फ किताब पढ़ने की आदत का विकास करने सायास प्रयास भर नहीं है। यह किताबों की दुनिया के अमूर्त सिरे तक पहुंचने का जरिया भी होता है। जैसे किताबें लिखी जाती हैं। इसे हमारे-आपके जैसे लोग लिखते हैं। हर किसी का लिखना अलग होता है। क्योंकि हर किसी का सोचना अलग होता है। यह बात बच्चों तक पहुंचनी चाहिए ताकि बच्चे लिखी हुई बातों को अपने तर्क की कसौटी पर कसने की दिशा में आगे बढ़ सकें। लायब्रेरी में अपने होने के अहसास को जी सकें। अपनी पसंद को आकार दे सकें। अपने विचारों को अभिव्यक्ति दे सकें।

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