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‘किताबें उसी माटी की बनी होनी चाहिए जिससे बच्चा बना है’

सिल्विया एश्टन-वॉरनर, अध्यापक, शिक्षा में नवाचार, न्यूजीलैंड, शिक्षाविद्

सिल्विया एश्टन-वॉरनर प्रारंभिक शिक्षा के बहुत बुनियादी चीज़ों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं।

अपनी किताब ‘अध्यापक’ में सिल्विया एश्टन- वॉरनर ने बतौर शिक्षक अपने अनुभवों का निचोड़ सामने रखा है। उनका जन्म न्यूजीलैंड में हुआ। उन्होंने भारत में भी शिक्षण कार्य किया।

इस किताब के बारे में प्रोफेसर कृष्ण कुमार कहते हैं, “पढ़ना सिखाने की रूढ़ विधियों को उखाड़ फेंकने में मदद देने के अलावा सिल्विया एश्टन-वारनर की छोटे बच्चों से संवाद स्थापित करने की क्षमता हजारों शिक्षकों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी। बच्चे का विश्वास जीते बिना कोई शिक्षा नहीं दी जा सकती, यह सिद्धांत और बच्चे का विश्वास जीतने का तरीका इस किताब के दो सबसे बड़े आकर्षण हैं।”

पढ़ने के लिए प्यार

पहले शब्दों का बच्चे के लिए विशेष अर्थ होना ही चाहिए।

पहले शब्दों का बच्चों के लिए गहरा अर्थ होना चाहिए। बल्कि उन्हें तो उसके लिए मानस का हिस्सा होना चाहिए।

पढ़ने के लिए प्यार पर कितना कुछ निर्भर करता है। किताब थामने की, उठा लेने की स्वाभाविक ललक। यही तो चाहिए। इस प्रारंभिक विकास काल में ही किताब की ओर हाथ बढ़ाकर थाम लेना एक सहज प्रतिक्रिया बन जानी चाहिए। और इस स्थिति तक पहुंचने के लिए सुखद और कोमल शब्द नहीं चलेंगे। हमें ऐसे शब्दों की जरूरत होगी जो सहज हों। जो बच्चे के गतिशील जीवन से जन्मे हों।

अगर पहली किताबों पर गौर करें। पहले शब्द तो उसी माटी के बने होने चाहिए, जिस माटी के बच्चे खुद हों। मैं तो हाथ बढ़ाकर बच्चे के दिमाग में से मुट्ठीभर शब्द निकाल लेती हूँ और उनका पहले-पहल इस्तेमाल करती हूँ। फिर चाहें ये शब्द अच्छे हों, बुरे हों, उग्र हों या शांत, रंगीन हों या फीके। ताकि प्रारंभ टुटन से न हो, कटाव से न हो।

 ग्रंथ शिल्पी से प्रकाशित सिल्विया एश्टन-वॉरनर की इस किताब का अनुवाद किया है पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा ने।

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amrita tanmay

यही होना चाहिए .

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