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स्कूल की लायब्रेरी के बारे में कौन सोच रहा है?

पठन कौशल का विकास, पढ़ने की आदत, भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति, अर्ली लिट्रेसीकिसी स्कूल में पुस्तकालय होना जरूरी है क्या? इस सवाल का क्या जवाब हो सकता है? आमतौर पर लोग कहेंगे कि हाँ होना चाहिए। वहां किस तरह की किताबें होनी चाहिए तो लोगों की जवाब होगा कि बच्चों से जुड़ी किताबें होनी चाहिए। बाल पत्रिकाएं होनी चाहिए। नैतिक शिक्षा वाली किताबों का भी जिक्र आएगा, क्योंकि नैतिक शिक्षा के महत्व को आँख मूंदकर स्वीकार करने वाले और उसे बच्चों पर थोपने वाले शिक्षकों की भरमार है।

हमारे देश में पता नहीं क्यों लोगों को लगता है कि जो काम स्कूल की शिक्षा नहीं कर सकती, वह काम नैतिक शिक्षा से हो जाएगा। जबकि हमारी शैक्षिक प्रक्रिया में बहुत सारी बातें होती हैं जो जीवन में नैतिक शिक्षा के ज्ञान बांटने वाले किस्सों से कहीं ज्यादा काम आती हैं। जैसे किसी बात को तर्क की कसौटी पर कसना। किसी परिस्थिति में स्व-विवेक का उपयोग करते हुए फैसला करना। किसी के फैसले का सम्मान करना। लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करना। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और मजबूती को समर्थन देना। उसके पक्ष में अपनी आवाज़ को मुखर करना।

कैसा हो बच्चों का पुस्तकालय

मगर जब बात बच्चों के पुस्तकालय की हो रही हो तो शायद वहां ऐसी बड़ी-बड़ी बातों के लिए बहुत ज्यादा स्कोप नहीं होता। क्योंकि बच्चों का पुस्तकालय तो ऐसा होना चाहिए, जहाँ उनके पसंद की किताबें हों। उनके पास किताबें चुनने की आज़ादी हो। कोई ऐसी व्यक्ति वहां पर हो जो बच्चों की जिज्ञासा के प्रति संवेदनशील हो और उनकी पसंद को तरजीह देता हो। क्योंकि आमतौर पर बच्चों पर अपनी पसंद थोपने में बड़ों को काफी आनंद आता है। वह भी इस तर्क के साथ कि हम जो भी कर रहे हैं तुम्हारे भले के लिए कर रहे हैं। एक निजी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा बताता है कि उसके स्कूल में सिर्फ आध्यात्मिक किताबें मिलती हैं। बच्चों के लिए वहां कोई किताब नहीं आती। वहीं एक अन्य निजी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा बताता है कि पहले हमारे स्कूल में सारे बच्चों को कहानी की किताबें, उपन्यास और पत्रिकाएं स्कूल में पढ़ने और घर ले जाने को मिलती थीं। लेकिन अब बच्चों को कोई किताब नहीं दी जाती है। वे किताबों को केवल स्कूल की लायब्रेरी में पढ़ सकते हैं।

राजस्थान के बहुत से सरकारी स्कूलों में गिजूभाई बधेका के किताबों की पूरी सीरीज़ इस उम्मीद के साथ भेजी गई थी कि शिक्षक उसे पढ़ेंगे। दिवास्वपन और अन्य किताबों के पढ़ने से उनके भीतक संवेदनशीलता और बच्चों के लिए कुछ करने के जज्बे का विकास होगा। मगर बहुत से स्कूलों में उन किताबों के बंडल आज भी धूल फांक रहे हैं। बहुत से शिक्षक साथियों को यह भी पता नहीं है कि यह मूंछ वाला आदमी कौन है और शिक्षा के क्षेत्र में इसका क्या योगदान है? बहुत से स्कूलों में ऐसी किताबें ताले के भीतर सुरक्षित हैं ताकि कोई पाठक उनको दीमक से भी ज्यादा बेरहमी से चट न कर जाए। कुछ ऐसा ही हाल एनसीईआरटी की रीडिंग सेल की तरफ से भेजी गई किताबों का भी है। ये किताबें हिंदी सिखाने के लिए ही बनाई गई हैं। मगर अधिकांश स्कूलों में किताबें जिस उद्देश्य और उम्मीद के साथ के साथ भेजी गई थीं, उसको शिक्षकों के साथ कभी साझा नहीं किया गया। ऐसी किताबों के साथ कोई पत्र भी आना चाहिए जिसमें किताबों का जिक्र हो कि ये किताबें क्ों पढ़नी जरूरी है, इन किताबों को पढ़ने से बतौर शिक्षक हमें और हमारे स्कूल के बच्चों को क्या फायदा होने वाला है, इस तरह की बातचीत होनी चाहिए।

आखिर में दो बातें

इन स्थितियों के अभाव में  पुस्तकालय पर निबंध लिखे जाएंगे। इनके  लाभों की चर्चा होगी। पुस्तकालय के नियमों का हवाला देते हुए सरकारी शिक्षक बार-बार कहेंगे कि हमें अगले आदमी को किताबों का चार्ज देना है। अगर कोई किताब फट गई तो हम क्या जवाब देंगे? इसके साथ ही किताबों और पुस्तकालय के महत्व को रेखांकित करने वाले विमर्श के लिए भी गुंजाइश बनी रहेगी। मगर वास्तविक प्रेरणा के अभाव में इस दिशा में होने वाले प्रयास सीमित उपलब्धियों की मंज़िल तक पहुंचकर कमज़ोर पड़ जाएंगे। क्योंकि हमारे समाज में किताबें पढ़ने और उनके ऊपर चर्चा करने वाली संस्कृति का घोर अभाव है।

बहुत से सरकारी स्कूल में दस-बीस सालों से पढ़ाने वाले शिक्षकों से सवाल करो कि सर आपने पिछले साल कौन सी किताब पढ़ी थी तो कोर्स की किताबों या फिर प्रमोशन के सिलसिले में पढ़ी गई किताबों का जिक्र होता है। यही कारण है कि किसी स्कूल में लाखों रूपए की किताबें होने के बावजूद लोगों को रोज़ाना लायब्रेरी खोलने, उसकी किताबें बच्चों को देने और लायब्रेरी को संपन्न बनाने की दिशा में कोई विशेष पहल होती दिखाई नहीं देती। अगर ऐसा कोई प्रयास होता है और शिक्षकों का कोई काम आड़े आता है तो वे खीजकर कहते हैं, “आधा कोर्स बाकी है और आप चाहते हैं कि मैं कहानी सुनाऊं?” इस तरह के वाक्य कहानी की किताबों, पढ़ने की आदत, पढ़ने के कौशल और घरों में किताब पढ़ने की संस्कृति के बारे में बहुत कुछ कहते हैं, मगर इसके बारे में पूर्वाग्रहों के तमाम दायरों को किनारे रखकर सोचने की जरूरत है कि बच्चे किताबों के बेहद समृद्ध संग्रह के करीब होकर भी उसकी छांव से दूर क्यों हैं?

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2 Comments on स्कूल की लायब्रेरी के बारे में कौन सोच रहा है?

  1. मीतू जी, बहुत-बहुत शुक्रिया अपने विचारों को साझा करने के लिए। आपका पुस्तकालय शुरू करने का विचार और इरादा अच्छा है। इसके बारे में बात की जा सकती है कि आपको किस स्तर पर मदद चाहिए और किस क्षेत्र में आप अपना काम शुरू करना चाहती हैं। किताबों के साथ आपका लगाव अगर बाकी लोगों को साथ साझा होता है, तो यह भी एक बड़ी बात होगी।

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  2. Sir mai library kholna chahti hu mujhe kitabo se kafi lagaw h maine kafi granth bhi padhe h to kya yah Sagittarius h koi meri madat karega es kam me free time books hi reading karti hu

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