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गुजरात के सरकारी स्कूलों में 13 हज़ार से ज्यादा शिक्षकों की कमी

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।


गुजरात में राज्य सरकार द्वारा संचालित सरकारी स्कूलों में 1,67,461 शिक्षक काम कर रहे हैं। जबकि यहां पर शिक्षकों के कुल एक लाख 80 हज़ार स्वीकृत पद हैं। यानि यहां 13 हज़ार से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।

समाचार एजेंसी पीटीआई पर छपी एक ख़बर में यह आँकड़े सामने आये हैं। शिक्षकों की कमी सिर्फ गुजरात में है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। शिक्षकों की कमी गुजरात के साथ-साथ राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी है।

आदिवासी इलाकों की उपेक्षा

रिपोर्ट के अनुसार आदिवासी इलाक़ों में प्राथमिक शिक्षकों के ज्यादा पद खाली हैं। इसमें पंचमहल और दाहोद का जिक्र है। पंचमहल में शिक्षकों के 935 पद खाली हैं। वहीं दाहोद में 912 शिक्षकों के पद खाली हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षकों के पद रिक्त होने के कारण शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पर पड़ रहा है। क्योंकि जिन स्कूलों में शिक्षक कम हैं, वहां पर एक या दो शिक्षकों के भरोसे पढ़ाई का काम चल रहा होगा। जबकि अर्ली लिट्रेसी (प्रारंभिक साक्षरता) वाला समय ऐसा होता है जब बच्चों पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है।

ख़ासकर सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों की शिक्षा पर। क्योंकि इनमें से अधिकांश बच्चे सीधे पहली कक्षा में दाखिला ले रहे होते हैं। अगर इनके साथ पहली-दूसरी में अच्छे से काम नहीं होता है तो ये बच्चे पठन-लेखन का कौशल विकसित नहीं कर पाएंगे।। जिसका असर आने वाले सालों में उनकी पढ़ाई पर भी होगा। अगर ये बच्चे अगली कक्षाओं में पढ़ना-लिखना नहीं सीख पाते तो इनके स्कूल छोड़ने की आशंका बढ़ जायेगी। इस नज़रिये से भी प्राथमिक शिक्षा में पहली-दूसरी क्लास के ऊपर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर

स्कूल में अगर बच्चे आकर दिनभर खाली बैठे रहते हैं तो क्या होता है? ऐसे बच्चों और स्कूल न आने वाले बच्चों में कोई ख़ास अंतर नहीं रह जाता। स्कूल न आने वाले बच्चे भी पढ़ना-लिखना सीखने से वंचित रहते हैं और ये बच्चे स्कूल आकर भी ऐसे अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते। इसलिए जरूरी है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हों। बच्चों के स्कूल में खाली बैठने वाली स्थितियां न पैदा हों। क्योंकि इससे बच्चों को तकनीकी तौर पर शिक्षा का अधिकार तो मिलता है, मगर शिक्षा की वह गुणवत्ता नहीं मिल पाती जो उन्हें आगे शिक्षा जारी रखने में मदद करे।

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