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दक्षिण अफ्रीका में सबके लिए निजी शिक्षा की माँग क्यों हो रही है?

education-mirrorदक्षिण अफ्रीका के जोहानेसबर्ग में द फोरम फॉर सर्विस डिलीवरी ((F4SD) नामक संस्था ने सभी के लिए अच्छी निजी शिक्षा मुहैया कराने की माँग की। इस माँग के पीछे का कारण है निजी स्कूलों में पढ़ाई करने वाले तकरीबन 99 फीसदी छात्रों का पास होना। इन पास होने वाले छात्रों में से 87 फीसदी का चयन बैचलर डिग्री के लिए और तकरीबन 9.83 का चयन डिप्लोमा कोर्सेस के लिए हुआ है।

इस संगठन की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया, “हमारी शिक्षा व्यवस्था जॉब मार्केट के हिसाब से योग्य छात्रों की माँग पूरी करने में विफल हो रही है, दक्षिण अफ्रीका में पहले से युवा बेरोजगारी की दर बहुत ज्यादा है जिसमें विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने वाले छात्र शामिल हैं।”

इस खबर से एक संकेत तो साफ है कि सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा से लोगों का मोहभंग हो रहा है। जिसे इस संस्था द्वारा अपनी माँग के माध्यम से उभारने की कोशिश की जा रही है। ताकि स्थितियों में बदलाव की रूपरेखा बन सके। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकों पर ध्या दिया जा सके जैसे शिक्षक प्रशिक्षण, स्कूल में अच्छी पढ़ाई पर ज्यादा फोकस करना, बच्चों को कॉलेज वाली पढ़ाई के लिए तैयार करना, निजी स्कूलों के पक्ष में आवाज़ें तो भारत में भी उठती हैं। मगर इतने खुले तौर पर माँग अभी नहीं हो रही है।

सबको मिले गुणवत्तापूर्ण निजी शिक्षा

दक्षिण अफ्रीका की एक वेबसाइट पर प्रकाशित खबर के मुताबिक संगठन की तरफ से कहा गया कि बेसिक शिक्षा विभाग को निजी स्कूलों से मैट्रिक पास करने वाले छात्रों के प्रदर्शन से सबक लेना चाहिए। ऐसी ही शिक्षा सबको मुहैया करानी चाहिए, हालांकि इसका आर्थिक पहलू भी है।

संस्था का कहना है कि द इंडिपेंडेंट एक्जामिनेशन बोर्ड (आईईबी) के परिणाम बताते हैं कि अगर हम पूरे बोर्ड के लिए स्वतंत्र शिक्षा व्यवस्था अपना सकें तो देश तरक्की करेगा।

द फोरम फॉर सर्विस डिलीवरी नामक संस्था ने सरकार से टीचर ट्रेनिंग कॉलेजों को फिर से खोलने की अपील की है ताकि उच्च कुशलता वाले शिक्षकों की माँग पूरी की जा सके, जो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर को सुधारने में मदद करेंगे।

दक्षिण अफ्रीका के क्लासरूम में बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा होती है। इस कारण से एक शिक्षक के लिए बच्चों को संभालना काफी मुश्किल होता है। यह बात वहां एक ग़ैर-सरकारी संस्था में काम करने वाले शिक्षक प्रशिक्षक ने बताई।

दक्षिण अफ्रीका में सरकारी स्कूलों की स्थिति क्या है? उसका अंदाजा इस खबर से भी लगाया जा सकता है कि शिक्षकों को प्रशिक्षण देने वाले कॉलेज बंद पड़े हैं, लोग उनको खोलने की मांग कर रहे हैं। ताकि शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण मिल सके, उनका कौशल बेहतर हो जिससे अंततः सरकारी स्कूलों की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

भारत के संदर्भ में क्या है महत्व?

भारत में भी शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने और लागत कम करने के लिए पीपीपी मॉडल की बात पिछले कई सालों से हो रही है। यानि निजीकरण का विमर्श यहां भी किसी न किसी रूप में बना हुआ है। बहुत से शिक्षकों को अक्सर लगता है कि सरकारी स्कूलों के साथ काम करने वाली ग़ैर-सरकारी संस्थाओं का मकसद है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को आधार बनाकर कैसे उनके बारे में नकारात्मक प्रचार किया जाए और अंततः सरकारी स्कूलों के निजीकरण की राह को आसान बनाया जाए। हालांकि पूरी बात इतनी सीधी है नहीं, जितनी कही जा रही है।

भारत में शिक्षा

शिक्षा जीवन भर चलती रहती है।

निजी स्कूल जिनके लिए पैसा कमाने का जरिया हैं, वे ऐसे इलाक़ों या क्षेत्रों में स्कूल क्यों खोलेंगे जहाँ लोग ज्यादा महंगी फीस नहीं भर सकते। बहुत सी सुविधाओं के लिए पैसे नहीं दे सकते। यानि आदिवासी अंचल, गाँव और कस्बों में लोगों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया करवाने की जिम्मेदारी मूल रूप से सरकार की है। शिक्षक प्रशिक्षण के ऊपर भारत में विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एसटीसी, बीटीसी या बीएसटीसी के नाम से प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए कोर्स विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे हैं, इसके अलावा नर्सरी टीचर ट्रेनिंग कोर्स भी करवाया जा रहा है हालांकि ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति नाम मात्र के लिए या बेहद कम संख्या में हुई है ताकि बालवाड़ी पर ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति की जा सके, जो पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने में अपना योगदान देंगे।

पढ़िएः भारत की शिक्षा व्यवस्था निजी स्कूलों के भरोसे है?

इसके अलावा बीएड और बीएलएड का कोर्स विभिन्न राज्यों में चल रहा है जहाँ से शिक्षकों की आपूर्ति वाली जरूरतें पूरी हो रही हैं। शिक्षा के अधिकार कानून में दो वर्षीय प्रशिक्षण के प्रावधान को पूरे देश में लागू किया जा रहा है। ताकि भावी शिक्षकों को स्कूल के साथ काम करने का व्यावहारिक अनुभव सेवा-पूर्व प्रशिक्षण के बतौर मिल सके। अभी ऐसे छात्र विभिन्न स्कूलों में 4 महीने के लिए पढ़ाने का अनुभव हासिल कर रहे हैं।

कुल मिलाकर भारत की स्थिति दक्षिण अफ्रीका से कई मामलों में काफी बेहतर दिखाई देती है। पर सरकारी स्कूलों के बारे में नकारात्मक छवि और विचार लोगों के मन में काफी गहरे धंसे हुए हैं, लोगों को लगता है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक काम नहीं करते हैं। प्रशिक्षण के प्रति गंभीरता का घोर अभाव है। प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं ताकि चीज़ों को और बेहतर किया जा सके। आखिर में यही कहा जा सकता है कि भारत में भरोसे का संकट तो है मगर अभी हाल दक्षिण अफ्रीका जैसा नहीं है कि सभी के लिए निजी शिक्षा मुहैया कराने जैसी माँग होने लगे।

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