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सरकारी स्कूलों के ‘निजीकरण की कहानी’ लिखने का काम शुरू हो गया है?

education-mirrorभारत में सरकारी स्कूलों का भविष्य क्या होगा? यह एक अहम सवाल है।  शिक्षकों को ग़ैर-शैक्षणिक कामों में लगाने और शिक्षा की गिरती हुए स्तर के लिए उनको ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिशें साथ-साथ जारी हैं।

बहुत से सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहाँ पर्याप्त शिक्षक नहीं है। एक या दो शिक्षकों के ऊपर 100 से ज़्यादा बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी है। वर्तमान में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की बात हो रही है, लेकिन लंबे-लंबे प्रशिक्षण सत्रों के बीच सतत पढ़ाई के सिलसिले की सांस उखड़ रही है, शिक्षक करीब एक महीने तक विभिन्न ट्रेनिंग सत्रों का हिस्सा होने के कारण स्कूल से बाहर थे।

अभी जनगणना से जुड़े काम के कारण स्कूलों से शिक्षक फिर एक महीने के लिए ग़ायब होने वाले हैं, ऐसे में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी, यह बात बिल्कुल निश्चित है। शिक्षकों की स्थिति ‘आदेश’ से बंधे हुए उस गुलाम की तरह है, जिसके मन में कहने के लिए बहुत कुछ है मगर वह ख़ामोश है। क्योंकि उसके पास आदेश की प्रति है। ऐसी ज़मीनी स्थिति को देखते हुए लगता है मानो सरकारी स्कूलों के निजीकरण की कहानी का ‘प्रारंभिक अध्याय’ लिखने का काम शुरू हो गया है। केंद्रीय स्तर पर शिक्षा के बजट में होने वाली कटौती को भी एक संकेत के बतौर देखा जा रहा है।

‘पीपीपी मॉडल’

राजस्थान में सरकारी स्कूलों को पीपीपी मॉडल पहला प्रयोग प्रतीत होता है। भारत में एक दौर था, जब बहुत से निजी स्कूलों को आरटीई का डर था और उनके ऊपर दबाव था कि इस कानून के आने के बाद उनको अपनी स्थिति बेहतर करनी होगी। या फिर स्कूल बंद करने होंगे। मगर अभी तो पूरी परिस्थिति पर सिस्टम यू-टर्न लेता हुआ दिख रहा है। स्थितियां निजी स्कूलों के पक्ष में जाती हुई नज़र आती हैं।

एज्युकेशन रिसर्च के क्षेत्र में काम करने वाले एक साथ कहते हैं, “आने वाले समय में हो सकता है कि सरकारी स्कूलों में केवल वही बच्चे शेष रहें, जिनको वास्तव में सरकारी सहायता और मदद की जरूरत है। इससे सरकार का काम आसान हो जाएगा। नह अपने लक्षित समूह पर ज़्यादा फ़ोकस के साथ काम कर पाएगी।” मगर उनकी बात कुछ क्षेत्रों के लिए सही हो सकती है, बहुत से क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहाँ लोग बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। ऐसे क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति व साख निजी स्कूलों की तुलना में ज़्यादा बेहतर है। लेकिन बदली हुई परिस्थिति में सरकारी स्कूल के शिक्षकों के लिए पढ़ाने का काम करना मुश्किल हो रहा है क्योंकि शिक्षक की व्यस्तता ग़ैर-शैक्षणिक कार्यों में तेज़ी से बढ़ रही है।

पिछले कुछ सालों में सरकारी स्कूलों में जिस तेज़ी के साथ कागजी काम बढ़ रहा है, उससे स्कूल एक ‘डेटा कलेक्शन एजेंसी’ के रूप में काम करते नज़र आते हैं। अभी बहुत से शिक्षकों का शिक्षण कार्य कराने वाला वक़्त आँकड़े जुटाने में इस्तेमाल हो रहा है। स्कूलों का हाल ये है कि शिक्षक योजनाओं की डायरी भर रहे हैं। बच्चे कक्षाओं में खाली बैठे हैं। उनके झोले बंद है। वे शिक्षकों का इंतज़ार कर रहे हैं कि वे क्लासरूम आएं और पढ़ाएं। उनको कोई काम दें। उनको कुछ बताएं। पिछली पाठ जहाँ पर छूटा था, वहां से आगे पढ़ाएं।

शिक्षक व्यवस्था के आदेश की पालना करने में जुटे हैं। वे बच्चों की जरूरत/मर्ज़ी के मुताबिक़ काम नहीं कर पा रहे हैं। वे बच्चों को पढ़ाने वाली योजनाओं के ऐसे पन्ने काले-नीले करने में जुटे हैं जो कक्षाओं में कभी लागू नहीं हो सकतीं। इसके अनेकों कारण हैं, समय की कमी। क्षमताओं का अभाव। कागजी काम का दबाव। ऐसी चीज़ों पर फ़ोकस जो दिखाई देती हों, ऐसे बहुत से कारण हैं जो शिक्षकों को अपने काम से विमुख कर रहे हैं।

‘सरकारी बनाम निजी स्कूल’

निजी स्कूलों में शिक्षकों के पास केवल पढ़ाने से जुड़ा हुआ काम ही होता है। वहां बहुत से ऐसे काम नहीं होते जिसकी जिम्मेदारी सरकारी स्कूल के शिक्षकों को उठानी पड़ती है। अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ऊपर उठाना है तो उसके लिए सबसे पहले उसे ख़ुद शिक्षा के प्रति अपना नज़रिया बदलना चाहिए। इसके बाद शिक्षकों का बदलते दौर के साथ शिक्षा के प्रति अपना नज़रिया दुरुस्त करने की सलाह देनी चाहिए। शिक्षा से संबंधित बड़े फ़ैसलों में शिक्षकों के विचारों को जगह देनी चाहिए, यहां शिक्षकों का मतलब शिक्षकों की राजनीति से जुड़ी इकाइयां बिल्कुल नहीं है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया।

शिक्षा की स्थिति खराब होने का एक कारण शिक्षा में बहुत गहरे तक घुसी हुई राजनीति भी है। हर फ़ैसले में राजनीति होती है। जहां राजनीति नहीं होती, वहां बाकी नीतियां होती हैं। उदाहरण के तौर पर एक उच्च प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक का प्रमोशन सीनियर सेकेंडरी (6ठीं से 12वीं) स्कूल में संस्कृत विषय पढ़ाने के लिए कर दिया गया।

उन्होंने कई सालों से संस्कृत नहीं पढ़ाई है, उनके पढ़ाने का स्तर क्या होगा? क्या वे 10वीं-12वीं के बच्चों को अच्छे से पढ़ा पाएंगे, इस संदर्भ में उनकी राय जानने की कोई जरूरत नहीं समझी गई। बस एक आदेश आया और स्कूल का नया पता मिल गया कि वहां फलां तारीख से ज्वाइन करना है और बच्चों को फलां विषय पढ़ाना है।

बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर होगा?

एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल से चार-पाँच शिक्षकों का तबादला अन्य स्कूलों में हो गया। बच्चे और गाँव के लोग स्कूल की तालाबंदी पर उतर आए कि जब शिक्षक ही नहीं हैं तो स्कूल चलाने का क्या मतलब है? तत्काल प्रभाव से प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक लगाये गये। अभी वहां पर शिक्षकों को भेजने का काम हो रहा है।

ज़मीनी स्तर पर होने वाली ऐसे तबादलों से पता लगता है कि हमें सिस्टम की मशीनरी में बदलाव (केवल यांत्रिक हेर-फेर) की चिंता है। लेकिन ऐसे बदलाव से बच्चों के ऊपर क्या असर पड़ेगा? उनकी पढ़ाई कैसे प्रभावित होगी? ऐसे बहुत से सवालों पर शायद बड़े स्तर पर ग़ौर नहीं किया जाता।

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