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शिक्षा के माध्यम से लोगों की सोच पर नियंत्रण संभव है?



जॉन डिवी का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो स्कूल छोड़ने के बाद भी काम आए।

शिक्षा के माध्यम से लोगों की सोच को नियंत्रित किया जा सकता है। बहुत से लोग अभी भी इस बात में गहरा विश्वास रखते हैं।

ऐसे विचार में विश्वास करने वाले ऐसी पाठ्यपुस्तकें बनाते हैं, जिससे किसी ख़ास सोच को बढ़ावा दिया जा सके।

पर सही मायने में शिक्षा तो हमें दायरों को तोड़ना और उससे निकलकर आगे बढ़ाना सिखाती है।

वह लोगों के विचारों को ख़ास सोच में क़ैद करने की पैरोकार नहीं होती।

किताबों का उद्देश्य

बच्चों की किताबों का उद्देश्य उनको पढ़ना-लिखना और अपने विचारों को मौलिक ढंग से व्यक्त करने में समर्थ बनाना होना चाहिए।

हमें उनको ‘रेडीमेड विचार’ देने की बजाय सोचने-विचारने का अवसर देना चाहिए ताकि वे अपनी क्षमताओं का विकास कर सकें।

स्कूलों को ‘रेडीमेड विचारों’ की फैक्ट्री में तब्दील करना, एक ऐसी पीढ़ी को तैयार करना है जो समस्याओं के समाधान का खुद प्रयास करने की बजाय, किसी अन्य से समाधान की अपेक्षा रखेगी।

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