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रवींद्रनाथ टैगोरः ‘प्रकृति और सामाजिक संदर्भ से दूर न हो शिक्षा’

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रवींद्रनाथ टैगोरः तस्वीर साभार ‘द हिंदू’

विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर शिक्षा को ‘जीवन के अपूर्व अनुभव के स्थाई हिस्से’ के बतौर देखते थे। उनका कहना था, “शिक्षा छात्रों की संज्ञानात्मक अनभिज्ञता के रोग का उपचार करने वाले तकलीफ़देह अस्पताल की तरह नहीं है, बल्कि यह उनके स्वास्थ्य की एक क्रिया है, उनके मस्तिष्क के चेतना की एक सहज अभिव्यक्ति है।”

उन्होंने पाया कि अधिकतर वयस्क बच्चों को इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियां समझते हैं। ऐसी प्रक्रिया से उन्होंने बच्चों को बचपन से महरूम कर दिया है। बच्चों को अपने पाठों के लिए केवल स्कूल की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनको एक ऐसी दुनिया चाहिए जिसकी मार्गदर्शक चेतना व्यक्तिगत प्रेम हो।

टैगोर का शिक्षा दर्शन

उनका मानना था कि ‘प्रेम और कर्म’ के माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। टैगोर के शिक्षा दर्शन को रेखांकित करने वाले तीन सिद्धांत हैं-

  1. स्वतंत्रता
  2. सृजनात्मक स्व-अभिव्यक्ति
  3. प्रकृति और इंसानों के साथ सक्रिय सहभागित

उनका कहना था कि स्वतंत्रता की मौजूदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य मिलता है। उन्होंने तत्कालीन स्कूलों को ‘शिक्षा की फ़ैक्ट्री, बनावटी, रंगहीन, दुनिया के संदर्भ से कटा हुआ और सफेद दीवालों के बीच से झांकती मृतक के आँखों की पुतली’ कहा था।

प्रकृति का महत्व

वे मानते थे कि हमारी शिक्षा ने हमें प्रकृति और सामाजिक संदर्भ दोनों से दूर कर दिया है। यह निर्जीव और मूल्यविहीन हो गई है। उन्होंने पाया कि शिक्षा को बच्चों के लिए और ज़्यादा अर्थपूर्ण बनाने के लिए पहला क़दम बच्चे को प्रकृति के संपर्क में लाना होगा।

यह शिक्षा को मात्रा और गुणवत्ता में नैसर्गिक बनाकर हासिल किया जा सकता है। प्रकृति के साथ संपर्क से बच्चा विशाल दुनिया की वास्तविकता, निरंतरता और ख़ुशी से परिचित होगा।

हालांकि टैगोर ख़ास अर्थ में शिक्षाविद् नहीं है क्योंकि उन्होंने शिक्षा के बारे में नहीं लिखा, लेकिन शिक्षा के प्रति उनके दृष्टिकोण की झलक उनकी कविताओं, गद्य और निबंधों में मिलती है।

किताबों की गुलामी

बच्चों के संदर्भ में वह स्वतंत्र, मुक्त गतिविधि और उनके स्वास्थ्य व शारीरिक विकास के लिए खेल के हिमायती थे।

उन्होंने पाया, “अगर बच्चे कुछ नहीं सीखते हैं तो भी उनको खेलने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। पेड़ों पर चढ़ना, तालाब में तैरना, फूल तोड़ना और छिलना, प्रकृति के साथ हज़ार शरारतें जारी रखने से उनके शरीर को पोषण, मन को ख़ुशी और बचपन की नैसर्गिक प्रेरणाओं को संतुष्टि मिलेगी।”

टैगोर ने इस सच्चाई पर अफसोस जताया था कि तात्कालिक शिक्षा व्यवस्था किताबों की गुलामी को प्रोत्साहन देती थी। भारत और दुनिया के तमाम देशों में यह स्थिति आज भी बरकरार है।

उन्होंने कहा, “हमारी शिक्षा स्वार्थ पर आधारित, परीक्षा पास करने के संकीर्ण मक़सद से प्रेरित, यथाशीघ्र नौकरी पाने का जरिया बनकर रह गई है जो एक कठिन और विदेशी भाषा में साझा की जा रही है। इसके कारण हमें नियमों, परिभाषाओं, तथ्यों और विचारों को बचपन से रटना की दिशा में धकेल दिया है। यह न तो हमें वक़्त देती है और न ही प्रेरित करती है ताकि हम ठहरकर सोच सकें और सीखे हुए को आत्मसात कर सकें।”

शिक्षा का उद्देश्य

उन्होंने लिखा कि ‘सोचने की शक्ति और कल्पनाशक्ति निःसंदेह वयस्क जीवन के लिए दो महत्वपूर्ण क्षमताएं हैं।’ इसलिए उन्होंने महसूस किया कि इनके विकास को बचपन से प्रारंभ होना चाहिए।

उनके मुताबिक़ शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को वास्तविक जीवन की सच्चाइयों, परिस्थितियों और परिवेश के साथ परिचय और समायोजन था.

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा था कि अवास्तविक शिक्षा ही हमारे लोगों में बौद्धिक बेईमानी, नैतिक पाखंड और मातृभूमि के प्रति अज्ञानता के लिए जिम्मेदार है।

इसलिए उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि शिक्षा और हमारी ज़िंदगी के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास होना चाहिए।

इस तरह से टैगोर ने शिक्षा की उपयोगिता के बारे में अपने विचारों को सामने रखा, वे मानते थे कि शैक्षिक संस्थाओं का आर्थिक जीवन के साथ गहरा जुड़ाव होना चाहिए।

जीवन की सहजता में विश्वास

टैगोर आत्म-अनुशासन और अनावश्यक पदार्थों से मुक्त सहज तरीके से जीवन जीने के आदर्श में विश्वास करते थे।

उन्होंने कहा, “हमें इस विचार को मूर्त रूप देना चाहिए। उन्होंने हमारे स्कूलों के संदर्भ में अनावश्यक चीज़ों को कम करने का विचार रखा।

उन्होंने पाया कि सहजता और स्वाभाविकता वास्तविक सभ्यता में शामिल होती हैं। इसलिए हमारे बच्चों को इसके लिए बहुत प्रारंभ से इसके लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

वे मानते थे कि वस्तुओं की विलासिता से मुक्त होकर बच्चा अपने हाथों और पैरों के वृहत्तर उपयोग करने के साथ-साथ ज़मीन और धरती से परिचित हो सकेगा।

शिक्षण विधि के संदर्भ में सुझाव

शिक्षण विधि के संदर्भ में उनका सुझाव था कि “प्रकृति के तथ्यों का अध्ययन प्रकृति की वास्तविक परिघटनाओं और प्रकृति में वन्य जीवन के माध्यम से होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि इतिहास, भूगोल और अन्य सामाजिक विज्ञान के तथ्यों का अध्ययन जहाँ तक संभव हो प्रत्यक्ष स्रोतों के माध्यम से होना चाहिए।

विद्यार्थियों के अपने सामने मौजूद वास्तविक वस्तुओं के संपर्क में आने से उनके अवलोकन की क्षमता और तार्किक शक्ति का विकास होगा।”

समाधान केंद्रित विमर्श की जरूरत

इसके आगे उन्होंने लिखा, “छात्रों को सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए। किताबों में उन्होंने जो कुछ पढ़ा है उसके ऊपर कई तरह के सवाल और जवाब होना चाहिए।

अगर वे किताबों की सामग्री की आलोचना करते हैं तो हमें वास्तव में मानना चाहिए कि उनको सच्ची शिक्षा मिली है।

रोज़मर्रा के जीवन की विभिन्न समस्याओं को उनके सामने पेश किया जाना चाहिए और उनके समाधान पर केंद्रित विमर्श होना चाहिए। शिक्षा, कक्षा में पढ़ाने की तुलना में बड़ी चीज़ हैं।

गतिविधि का सिद्धांत

टैगोर की शैक्षणिक विधियों का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत ‘गतिविधि का सिद्धांत’ था। यह उनके इस दर्शन पर आधारित था कि शरीर और मन को विभाजित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि शारीरिक गतिविधि से केवल शरीर को स्फूर्ति नहीं मिलती, इससे मन भी ऊर्जावान होता है। इसी सिद्धांत के आधार पर उन्होंने चलते-फिरते स्कूलों को आदर्श स्कूल की संज्ञा दी।

उन्होंने कहा कि चलते-चलते पढ़ाना शिक्षा की सबसे अच्छा तरीका है। ऐसा मात्र इस कारण से नहीं है क्योंकि चलना प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से बहुत सारी चीज़ों को सीखने में मदद करता है।

ऐसा इसलिए भी क्योंकि चलते समय हमारा मानसिक संकाय ज़्यादा जाग्रत और चीज़ों को ग्रहण करने वाली स्थिति में होता है।

सक्रिय रूप से सीखने की उपयोगिता

इस तरह सक्रिय रूप से सीखना हम जीवित इंसानों के लिए हर तरह से उपयोगी है। दूसरी तरफ़ क्लॉसरूम में होने वाली स्थिर शिक्षा जो पढ़ाया जा रहा है उससे और छात्रों की अपनी पहल के बीच एक अलगाव का कारण बनती है।

इस सिद्धांत को ‘शांति निकेतन’ में अपनाया गया है। यहाँ तक कि क्लॉसरूम में टैगोर ने गति के इस सिद्धांत को लागू किया।

उन्होंने लिखा, “मैं कक्षा के दौरान सभी लड़के-लड़कियों को कूदने, यहाँ तक कि पेड़ पर चढ़ने, किसी कुत्ते या बिल्ली के पीछे भागने या किसी पेड़ की डाली से कोई फल तोड़ने की अनुमति दूँगा….मैं अपने दिमाग़ में यह बात ध्यान रखने का प्रयास किया कि बच्चा शब्दों को सीखने और एक पूरे वाक्य को सीखने के लिए अपने पूरे शरीर का इस्तेमाल करे।हमारे अधिकांश अध्यापक नाराज हो जाते जब वे मेरी कक्षा के बच्चों को हँसते, शोर मचाते और अपने हाथों से ताली बजाते हुए सुनते थे।

ऐसी होनी चाहिए कक्षा

अगर एक लड़का मुझसे कहेगा, “क्या मैं दौड़ने के लिए जा सकता हूँ? हाँ, जरूर’, मैं ऐसा कहुँगा क्योंकि इससे उसकी कुछ बोरियत दूर होगी और दोबारा वह सक्रिया महसूस करेगा, अब उसके लिए चीज़ों को ग्रहण करना और समझना आसान होगा।

ऐसा उस समय होता है जब बच्चे बोरियत महसूस करते हैं, उनके मन की निष्क्रियता और ग्रहण करने की उनकी आंतरिक इच्छा बिना किसी शारीरिक गति के अभाव में ठहर जाती है और वे निर्जीव पाठों को आत्मसात करना बंद कर देते हैं।

टैगोर ने बच्चों के पाठ्यक्रम में नाटक और संगीत को शामिल करने पर काफ़ी ज़ोर दिया क्योंकि वह मानते थे कि यह बच्चों की आत्म-अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा माध्यम हैं।

बच्चों की किताबें कैसी हों?

जहाँ तक बच्चों के किताबों की बात है उनका मानना था कि किताबे आसान और आकर्षक होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि शुरुआत में पाठों को आसान रखना चाहिए और बाद में बच्चों के भीतर स्वतः इसके लिए लगाव पैदा हो जाएगा। ­वह यह भी मानते थे कि विदेशी भाषा शुरू करने की बजाय सारी शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए।

टैगोर के विचारों में प्रकृतिवाद और मानवतावाद के प्रति काफ़ी विश्वास दिखाई देता है। बचपन के बारे में उनके विचारों और उसका महत्व ‘बाल-केंद्रित शिक्षण’ की बुनियाद रखते हैं जिसका हाल के दिनों में फिर से बढ़ा है।

टैगोर सृजनात्मक स्व-अभिव्यक्ति के पैरोकार थे जिसे आधुनिक शिक्षा में काफ़ी महत्व दिया जाता है।

(दिल्ली विश्वविद्यालय के एज्यूकेशन डिपार्टमेंट में प्रोफ़ेसर नमिता रंगनाथ की किताब ‘द प्राइमरी स्कूल चाइल्ड’ का हिंदी अनुवाद।)

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Anonymous

Very great thoughts

डॉ रूपेन्द्र कवि।

बहुत सुंदर जानकारी ।आज प्रासंगिकता बरकरार।

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