बदलाव का असर
मगर इतना जरूर है कि लोगों का ध्यान पूर्व में मानव संसाधन विकास मंत्री रहीं स्मृति ईरानी की तरफ से हटेगा। वे लंबे समय से वे विपक्ष के साथ-साथ छात्र नेताओं के निशाने पर थीं। मगर असली मुद्दे तो वही रहने वाले मसलन नई शिक्षा नीति (New Education Policy) का मामला, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या -2005 के प्रावधानों पर अमल करने का मसला, शिक्षा के भगवाकरण का मुद्दा, इतिहास को ख़ास एंगल से पेश करने का मुद्दा, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान देने और बच्चों को पास-फेल करने वाली नीति को क़ानूनी रूप देने का मुद्दा। इन मुद्दों पर सरकार की तरफ से क्या फैसले लिए जाते हैं? ज़मीनी स्तर पर उसको कैसे क्रियान्वित किया जाता है, यह देखने वाली बात होगी।
निकट भविष्य मेंसरकार की तरफ से पीपीपी मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं इस मुद्दे पर लोगों ध्यान रहेगा। सरकार अभी निजी स्कूलों में पढ़ने वाले 25 फीसदी बच्चों के लिए उनको वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है। जिस दिन यह प्रतिशत 50-50 का हो जाएगा। यानि पीपीपी मॉडल को पूरे देश में लागू होने का रास्ता खुल जाएगा। इसकी नींव कांग्रेस के कार्यकाल में लागू शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत पड़ी थी। जिसे वर्तमान केंद्र सरकार अपने एजेंडे के हिसाब से आगे बढ़ाएगी। शिक्षा के अधिकार क़ानून में भी निकट भविष्य में कुछ संसोधन होने हैं, ऐसे में यह बदलाव बेहद अहम है।
