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अपने लेख ‘कहानी कहाँ खो गई’ में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार लिखते हैं, “छोटे बच्चों को कहानी सुनाने की वकालत कई आधुनिक शिक्षाविदों ने की है, और इसी वकालत के फलस्वरूप पश्चिमी देशों में स्कूलों और पुस्तकालयों में कहानी सुनाने को अपने नियमित कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है।” इसके आगे वह कहते हैं कि भारत में तो जल्दी से जल्दी अक्षर ज्ञान कराने और गिनती सिखाने पर काफी जोर दिया जा रहा है, ऐसे माहौल में जब लोग जल्दी से जल्दी परिणाम चाहते हैं कहानी सुनाने जैसा धीमा और नियमित काम कौन करे?
इसी लेख में वे कहानी सुनाने के महत्व को फिर से स्थापित करने पर जोर देते हैं। वे लिखते हैं, “हिंदी में अबतक लोककथाओं और परिकथाओं को लेकर यह बहस हो लेती है कि कहानियां बच्चों के लिए आज भी उपयोगी हैं या नहीं। जो लोग इन कहानियों को नुकसानदेह बताकर विज्ञान और यथार्थबोधक साहित्य की वकालत करते हैं, उनका मुख्य तर्क यह होता है कि ये कहानियां बच्चों को एक काल्पनिक दुनिया में रहने की प्रेरणा देती हैं।”
आखिर में वे लिखते हैं, “कहानी के जरिए नैतिकता, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास और संस्कृति बच्चों को देने की बात बहुत हो चुकी और इस बातके परिणाम कोई खास नहीं निकले।क्यों न अब इस बात पर ज़ोर दिया जाए कि कहानी सुनने लायक हो?”
