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‘कहानी की उपयोगिता कहने के धीरज और ढंग में है’ – प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार



यह तस्वीर एक ब्लॉग के एक पोस्ट से ली गई, जो आप यहां पढ़ सकते हैं।

अपने लेख ‘कहानी कहाँ खो गई’ में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार लिखते हैं, “छोटे बच्चों को कहानी सुनाने की वकालत कई आधुनिक शिक्षाविदों ने  की है, और इसी वकालत के फलस्वरूप पश्चिमी देशों में स्कूलों और पुस्तकालयों में कहानी सुनाने को अपने नियमित कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है।” इसके आगे वह कहते हैं कि भारत में तो जल्दी से जल्दी अक्षर ज्ञान कराने और गिनती सिखाने पर काफी जोर दिया जा रहा है, ऐसे माहौल में जब लोग जल्दी से जल्दी परिणाम चाहते हैं कहानी सुनाने जैसा धीमा और नियमित काम कौन करे?

इसी लेख में वे कहानी सुनाने के महत्व को फिर से स्थापित करने पर जोर देते हैं। वे लिखते हैं, “हिंदी में अबतक लोककथाओं और परिकथाओं को लेकर यह बहस हो लेती है कि कहानियां बच्चों के लिए आज भी उपयोगी हैं या नहीं। जो लोग इन कहानियों को नुकसानदेह बताकर विज्ञान और यथार्थबोधक साहित्य की वकालत करते हैं, उनका मुख्य तर्क यह होता है कि ये कहानियां बच्चों को एक काल्पनिक दुनिया में रहने की प्रेरणा देती हैं।”

वे आगे कहते हैं, “क्रांति के बाद रूस में भी ठीक यही बहस जोरों से चली थी और वहां के महान शिक्षाविद और बाल साहित्यकार कोर्नेई चुकोव्यकी ने परीकथाओं और लोककथाओं का तगड़ा समर्थन किया था। उनका कहना था कि इन कहानियों का विरोध करने वाले लोग पोंगा क्रांतिकारी हैं जो न बच्चों को समझते हैं,न लोक साहित्य को। ऐसे लोगों की हमारे यहां कमी नहीं है। हमारी प्रसारण व्यवस्थाओं और शिक्षा से जुड़े अनेक लोग यह कहते मिल जाएंगे कि कहानी सुनाने का मुख्य फायदा यह है कि कहानी के जरिए कोई अच्छी सीख बच्चोंको दी जा सकती है। इस मान्यता के बल पर वे सब सीख को ध्यान में रखकर उसके इर्द-गिर्द कहानी बुन सकते हैं। उनके लिए यह समझना कठिन है कि कहानी कहने की उपयोगिता कहानी की सीख नहीं कहानी कहने के धीरज और ढंग में है।”

आखिर में वे लिखते हैं, “कहानी के जरिए नैतिकता, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास और संस्कृति बच्चों को देने की बात बहुत हो चुकी और इस बातके परिणाम कोई खास नहीं निकले।क्यों न अब इस बात पर ज़ोर दिया जाए कि कहानी सुनने लायक हो?”

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