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कहानी कहाँ खो गई

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प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार, तस्वीर साभार इंडियन एक्सप्रेस।

भारत में कहानी सुनाने की लंबी परंपरा रही है। लेकिन औद्योगीकरण के कारण आए सामाजिक संरचना में बदलाव में बदलाव के कारण कहानी कहीं गायब होती जा रही है। कहानी के शैक्षिक महत्व को सभी शिक्षाविद स्वीकारते हैं। इसलिए सभी देशों में कहानी कला को फिर से प्रोत्साहित करने पर ध्यान दिया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में क्या प्रयास किये जा रहे हैं, वह कितने सार्थक हैं? पढ़िए प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार के लिखे इस लेख कहानी कहाँ खो गई में।

 

अब ऐसे लोग बड़ी कठिनाई से मिलते हैं जो अपने बच्चों को रोज एक कहानी सुनाते हों। पंचतंत्र के किसी प्रसंग का जिक्र सुनकर 7-8 वर्ष के बच्चों के चेहरों पर परिचय का भाव प्रकट नहीं होता। बहुत सी कहानियां मुँह-जुबानी सुना सकने वाले व्यक्ति शहरों और कस्बों में दुर्लभ हो गए हैं और गाँवों में भी लगातार कम होते जा रहे हैं। नौजवान माता-पिता अपने बच्चों को किताब या पत्रिका से बांचकर ही रोज़ एक कहानी सुना दें, यह भी ज्यादा देखने को नहीं मिलता है। ऐसी किताबें अब मुश्किल से ही मिलती हैं जिनमें छपी हुई कहानियां मज़े में सुनाई जा सकें।  लोक कथाओं के कई उम्दा संकलन 15-20 वर्ष पहले तक उपलब्ध थे; अब रद्दी संकलन भी ढूंढने से मिलते हैं।

कहानी सुनाने की परंपरा का ह्रास कैसे हुआ?

बच्चों को कहानी सुनाने की एक लंबी परंपरा रही है। हाल के अतीत में इस परंपरा ह्रास हुआ है। और यह ह्रास बिल्कुल स्वाभाविक था। कहानी परंपरागत रूप में जिन परिस्थितियों में सुनाई जाती थी, वे आज के पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उपलब्ध नहीं हैं। संयुक्त परिवार और गाँव-मोहल्ले की पारंपरिक बनावट, जिसमें कहानी सुनाने की कला फली-फूली, अब व्यापक स्तर पर नहीं बची। लेकिन परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में भी बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।

सामाजिक संगठन में बदलाव की जिस प्रक्रिया से हम गुजर रहे हैं, उससे मिलती-जुलती प्रक्रियाओं से दुनिया के कई औद्योगिक समाज पहले गुजर चुके हैं। इन समाजों में बच्चों को कहानी सुनाने की परंपरा का ठीक वैसा ह्रास हुआ जैसा हम अपने यहाँ आज देख रहे हैं। किंतु अब इन समाजों में कहानी सुनाने की कला को नये सिरे से प्रोत्साहन दिया जा रहा है। पाँच वर्ष पूर् अमरीकी मनोविश्लेषक ब्रुनो बैटेलहाइम ने एक पुस्तक ‘मोह के उपयोग’ (यूज़ेज़ ऑफ़ इन्वेंटमेंट) लिखी थी। इस पुस्तक में कही गई मुख्य बात यह है कि छोटे बच्चों के भावनात्मक विकास की कई गहरी जरूरतें नियमित रूप से परीकथाएँ सुनकर पूरी होती हैं। उत्तरी अमरीका में इस पुस्तक की व्यापक चर्चा हुई और इससे कहानी सुनाने की कला को पुनर्जीवित करने में लगे अध्यापकों, माता-पिताओं और शिक्षाविदों को मदद मिली।

बच्चों के लिए परिकथाएं क्यों महत्वपूर्ण हैं?

लोक कथाओं और परीकथाओं की संरचना छोटे बच्चों की सोचने की शैली से मेल खाती है, और यही इन कहानियों के प्रति छोटे बच्चों के आकर्षण का ख़ास आधार है बहुत गम्भीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्याय सम्मत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति व प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है। यह धारा समाज में अपना जीवन एक छोटे से शरीर और तमाम तरह की आशंकाओं के साथ शुरू कर रहे छोटे बच्चों की कई मानसिक माँगें पूरी करती है।

इन कहानियों को सुनते हुए छोटे बच्चे अपनी मातृभाषा की बुनियादी लयों के सम्पर्क में आते हैं। शब्द और वाक्य रचना का एक पूरा भण्डार उनके हाथ लगता है। इस भण्डार से वंचित रह जाने वाले बच्चे कुछ बड़े होकर जब पढ़ना और लिखना सीखते हैं, तो भाषा उनके लिए एक यांत्रिक चुनौती बन जाती है। वह सहज जरूरत या इच्छा नहीं बन पाती है। बाद वे ध्यानपूर्वक सुनने, संयत ढंग से बोलने या संवाद में हिस्सा लेने जैसी क्षमताओं का विकास नहीं कर पाते हैं।

बच्चों को कहानी सुनाने का समर्थन

छोटे बच्चों को कहानी सुनाने की वकालत कई आधुनिक शिक्षाविदों ने  की है, और इसी वकालत के फलस्वरूप पश्चिमी देशों में स्कूलों और पुस्तकालयों में कहानी सुनाने को अपने नियमित कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है।इधर भारत में ठीक वही स्थिति दोहराई जा रही है जो अमरीका और यूरोप में तीस वर्ष पहले तक रही है। हमारे स्कूलों में आजकल जल्दी से जल्दी पढ़ना सिखाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। ऐसे बच्चों की कमी नहीं है जिन्हें तीन-चार वर्ष की आयु में ही अक्षरज्ञान करा दिया गया हो। ध्वनि और लय के संस्कारों के अभाव में प्राप्त किया गया अक्षरज्ञान न केवल अनुपयोगी होता है, बल्कि अभिव्यक्ति की क्षमताओं के विकास में बाधा भी उत्पन्न करता है। देश में हवा आजकल ऐसी है कि हर क्षेत्र में लोग तुरंत फल चाहते हैं। दवा लेते ही बीमारी दूर हो जाए और दौड़ना सीखने तक बच्चे को गिनती गिनना और अक्षर पहचानना आ जाए, ये आजकल के फ़ैशन हैं। इस वातावरण में कहानी सुनाने जैसा धीमा और नियमित काम कौन करें?

बच्चों को कहानी सुनाने के लिए बच्चा बनना जरूरी है क्या?

कहानी सुनाने की संस्थायी शुरूआत हमारे यहाँ रेडियो ने की थी और कभी-कभी दूरदर्शन भी यह रस्म निभा लेता है। हमारे यहाँ इन प्रसार माध्यमों का बच्चों के लिए उपयोग ठीक उसी तरह हुआ है जिस तरह बाल पत्रिकाओं के सम्पादकों ने अपनी विक्रय क्षमता का उपयोग किया है। रेडियो पर बच्चों से बतियाने वाले दादा और दादियाँ तथा बच्चों की पत्रिकाओं के सम्पादक बच्चों से संवाद नहीं करते, उन पर झुककर उन्हें तोड़ी-मरोड़ी हुई भाषा में पगी उपदेश-मूलक कहानियाँ और कविताएं सुनाते हैं। बच्चों पर झुकने की यह मुद्रा अब इतनी आम हो गई है कि कई बाल साहित्यकार इस मुद्रा की वकालत करते हुए मिल जाते हैं।

वे भी यह मानकर चलते हैं कि बच्चों को कहानी सुनाने के लिए उन्हें स्वयं बच्चा बनना पड़ेगा। इस कोशिश में वे अपनी भाषा की वह स्वाभाविकता और अपने व्यक्तित्व की वह सहजता खो देते हैं जो बचपन में मुझे कहानी सुनाने वाले सिरवैय्या बब्बा की शैली में थी। वह झुककर नहीं आराम से बैठकर कहानी सुनाते थे, और उनसे कहानियां सुनते हुए मुझे यह भूलने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई कि वे मुझ से 50 वर्ष बड़े थे। बड़े और छोटे के बीच का फासला कहानी स्वयं तय करती है। इस फासले को किसी कृत्रिम मुद्रा, मुस्कान  या संबोधन से ढंकने की जरूरत नहीं।

कहानियां बच्चों के लिए कितनी उपयोगी हैं?

हिंदी में अबतक लोककथाओं और परिकथाओं को लेकर यह बहस हो लेती है कि कहानियां बच्चों के लिए आज भी उपयोगी हैं या नहीं। जो लोग इन कहानियों को नुकसानदेह बताकर विज्ञान और यथार्थबोधक साहित्य की वकालत करते हैं, उनका मुख्य तर्क यह होता है कि ये कहानियां बच्चों को एक काल्पनिक दुनिया में रहने की प्रेरणा देती हैं।

क्रांति के बाद रूस में भी ठीक यही बहस जोरों से चली थी और वहां के महान शिक्षाविद और बाल साहित्यकार कोर्नेई चुकोव्यकी ने परीकथाओं और लोककथाओं का तगड़ा समर्थन किया था। उनका कहना था कि इन कहानियों का विरोध करने वाले लोग पोंगा क्रांतिकारी हैं जो न बच्चों को समझते हैं,न लोक साहित्य को। ऐसे लोगों की हमारे यहां कमी नहीं है। हमारी प्रसारण व्यवस्थाओं और शिक्षा से जुड़े अनेक लोग यह कहते मिल जाएंगे कि कहानी सुनाने का मुख्य फायदा यह है कि कहानी के जरिए कोई अच्छी सीख बच्चोंको दी जा सकती है। इस मान्यता के बल पर वे सब सीख को ध्यान में रखकर उसके इर्द-गिर्द कहानी बुन सकते हैं। उनके लिए यह समझना कठिन है कि कहानी कहने की उपयोगिता कहानी की सीख नहीं कहानी कहने के धीरज और ढंग में है।

कहानी के जरिए नैतिकता, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास और संस्कृति बच्चों को देने की बात बहुत हो चुकी और इस बातके परिणाम कोई खास नहीं निकले।क्यों न अब इस बात पर ज़ोर दिया जाए कि कहानी सुनने लायक हो?

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