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चर्चाः कुछ नया सीखने के लिए क्या करें?


शिक्षा के क्षेत्र में एक बात खुले मन से स्वीकार की जाती है कि कोई भी बात ‘अंतिम सत्य’ नहीं है। किसी काम को करने का कोई ‘फिक्स फॉर्मूला’ नहीं है। ऐसे में एक टीचर एजुकेटर, शिक्षक व शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए अपने विचारों को एक खुलेपन के साथ देखने, विचार करने और बदलाव करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इससे कुछ नया सीखने में आने वाली बाधा को दूर करने में मदद मिलती है। शिक्षा विमर्श की भाषा में इस प्रक्रिया को लर्निंग की उल्टी प्रक्रिया यानि ‘अनलर्निंग’ कहा जाता है।

जैसे भाषा शिक्षण के क्षेत्र में अक्षर ज्ञान के माध्यम से पढ़ना सिखाने की विधि सैकड़ों साल पुरानी है और इस पद्धति में बहुत से लोगों को अगाध भरोसा भी है। ऐसे में वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते कि बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए किसी अन्य तरीके को काम में लिया जा सकता है, या ऐसा कोई तरीका बच्चों के लिए काम करने में मददगार हो सकता है। इस अडिग विश्वास को हिलाने के लिए थोड़ी चर्चा अगर खुले मन से हो तो बात समझ में आती है कि अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त भी अन्य कई तरीके इस काम को करने में मदद करते हैं।

हर बच्चे के सीखने का तरीका अलग-अलग होता है, ऐसे में एक शिक्षक के काम करने के तरीके में भी विविधता का समावेश होना चाहिए ताकि उसकी बात ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक पहुंच सके। शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान ऐसे तमाम मौके आते हैं जब शिक्षक या प्रशिक्षक अपनी-अपनी मान्यता पर कायम रहते हैं। शिक्षा क्षेत्र में कई सारी समस्याओं की बुनियाद में मान्यताओं को सच के रूप में ज्यों का त्यों स्वीकार करने वाली बात ही है।

उदाहरण के लिए बच्चे या तो होशियार होते हैं या कमज़ोर, चुप रहने वाले बच्चे रचनात्मक नहीं होते, पहली-दूसरी के बच्चे शब्दों के अर्थ तो बता सकते हैं मगर उसे वाक्य में प्रयोग नहीं कर सकते। लायब्रेरी की किताबों को पढ़ने से पाठ्यक्रम की पढ़ाई में ख़ास फ़ायदा नहीं होता। या फिर प्राथमिक स्तर के बच्चे लायब्रेरी नहीं संभाल सकते। बच्चे अनुशासन वाले माहौल में सीखते हैं। बच्चों के सीखने के लिए डर जरूरी है। अच्छा नंबर पाने के लिए रटना जरूरी है, समझना नहीं आदि-आदि। ऐसी मान्यताओं पर बात जरूरी है ताकि हमारे विचार तर्कों की कसौटी पर खरे उतर सकें और सच के करीब रहें।

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