किताब बच्चे फाड़ देंगे, यह डर कितना काल्पनिक और कितना वास्तविक है?
अगर ऊपर लिखे सवालों का जवाब है कि बच्चों से सुरक्षित रखने और उनके द्वारा उपयोग की प्रक्रिया में फाड़ देने का डर है तो फिर सवाल होगा कि क्या बच्चों का व्यवहार डरावना है? क्या आप उनसे डरते हैं। जबकि वास्तविक परिस्थिति में ऐसा कहा जाता है कि स्कूल में बच्चे डरते हैं और उनके लिए स्कूलों में भयमुक्त माहौल बनाने की बात करते हैं। या फिर बच्चों पर आपको भरोसा नहीं है।
अगर ऐसी स्थिति है तो फिर सवाल होगा कि बच्चों के ऊपर शिक्षकों का भरोसा कैसे बने? इस भरोसे के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? क्या शिक्षक व बच्चों के बीच होने वाले संवाद और अंतर्क्रिया की कोई भूमिका इस भरोसे को फिर से बनाने के लिए मददगार साबित हो सकती है।
हम बच्चों पर भरोसा क्यों नहीं करते?
बच्चों पर भरोसा न करने वाली बात हमारी शिक्षा व्यवस्था और समाज में बहुत गहरे धंसी हुई है, हम इस बात के लिए कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों के ऊपर भरोसा एक सहज-सामान्य सी बात हो। ताकि स्कूल की चारदीवारी में बच्चों को अपनापन महसूस हो। उनको लगे कि उनके शिक्षक उनकी परवाह करते हैं। उनकी बात सुनते हैं। उनके ऊपर भरोसा करते हैं। लाइब्रेरी में रखी किताबें उनके लिए हैं। इससे बच्चों में एक भरोसे का भाव जागृत होगा, जो उनको नियमित रूप से बाल साहित्य (कविता, कहानी, नाटक, यात्रा वृत्तांत, डायरी इत्यादि) पढ़ने के लिए उनको प्रेरित करेगा।

