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बालगीतों के जरिये कक्षा-कक्ष के माहौल को रोचक कैसे बनाएं?

शिक्षा के क्षेत्र में अपनी रुचि के बुलावे पर आने वाले कौशलेंद्र सिंह ने राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी विद्यालयों के साथ काम करते हुए लोगों को सुना है, खुद भी सीखा है, अपने अनुभवों को शिक्षक समुदाय के बीच साझा भी किया। शिक्षा क्षेत्र में बदलाव की यह हसरत उन्हें निरंतर नये सवालों के बारे में सोचने और सवालों का जवाब तलाशने के लिए प्रयासरत रहने के लिए प्रेरित करती है। इस पोस्ट में वे बालगीत के प्रभाव, उपयोगिता और असर को रेखांकित कर रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में विस्तार से पढ़िए पूरी पोस्ट।

delhi-school-2आज के दौर का एक जरूरी सवाल है कि हम कक्षा-कक्ष का माहौल कैसा बनाएं कि जिसमें ऊर्जा से भरे बच्चे कुछ अर्थपूर्ण गढ़ सकें। इसके साथ ही साथ उनकी रचनात्मक सोच को एक नयी उड़ान मिल सकें। विभिन्न राज्यों में शिक्षा क्षेत्र को समझने की यात्राओं के दौरान ये सीखने एवं अनुभव करने  को मिला कि “बाल गीत” एक ऐसा सशक्त माध्यम है, जो बच्चों से जुड़ने के लिए कारगर है। इसके साथ ही साथ कठिन से कठिन विषय वस्तु सिखाने के लिए भी बालगीत का उपयोग किया जा सकता है।

क्या हम बच्चों के जुड़ने को लेकर भी गंभीर हैं?

आमतौर पर विषय वस्तु सिखाने के बारे में तो हम सभी सोचते हैं, लेकिन क्या बच्चों से जुड़ने की दिशा में हम उतनी ही गंभीरता से विचार करते हैं? एक ग़ौर करने वाली बात है कि वह विषय वस्तु मैं कभी नहीं भूलूंगा जो उस शख्स के द्वारा पढाई जायेगी जो मुझसे जुड़ा  होगा। यहाँ जुड़ा होने का अर्थ है कि वो मेरी दुनिया जानता हो मैं उसकी और हम लोगों के बीच में कुछ अनदेखे से तार हों, जिनका हम सम्मान करते हों।

बच्चों की भाषा, बच्चों से बातचीत, ज्ञान का निर्माणबच्चों से जुड़ने के माध्यम की बात हो रही हो और बाल गीत का जिक्र न हो तो वो बात अधूरी एवं निर्जीव सी लगती है। बाल गीतों के लय और सुर के कारण उन्हें याद रखना सरल होता है और इससे विषय वस्तु के साथ-साथ भाषा व बोली के विकास में मदद भी मिलती है। उदाहरण के लिए

धम्मक धम्मक आता हाथी, धम्मक धम्मक जाता हाथी

कितना पानी पीता हाथी,भर-भर सूंढ़ नहाता हाथी   

या

मैं तो सो रही थी- मैं तो सो रही थी मुझे कुत्ते ने जगाया बोला भौं भौं भौं,

मैं तो सो रही थी- मैं तो सो रही थी मुझे बिल्ली ने जगाया बोला म्याऊं,म्याऊं,म्याऊं

मैं तो सो रही थी- मैं तो सो रही थी मुझे कौवे ने जगाया बोला कांव, कांव, कांव

मैं तो सो रही थी- मैं तो सो रही थी मुझे मोटर ने जगाया बोला पों,पों,पों

एक सरकारी स्कूल की कहानीउपरोक्त दोनों बालगीतों को हम और भी आगे बढ़ा सकते हैं एवं कुछ अन्य ध्वनियों को भी इसमें शामिल कर सकते हैं I इसके माध्यम से हम बच्चों को विभिन्न-विभिन्न ध्वनियों से परिचित करवा सकते हैं ,और  शायद हमें यहाँ ये बात साझा करने की आवश्यकता नहीं है कि ध्वनियाँ भाषा सीखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये तो सिर्फ एक आयाम है अगर हम बाल गीत का संसार खंगालने बैठेंगे तो इसकी सहायता से गणित, पर्यावरण, विज्ञान और कई विषयों के अनेकोनेक चीज़ें सिखा सकते हैं, बस परिप्रेक्ष्य की बात है।

सीखने-सिखाने के माहौल बनाने में सहायक हैं बालगीत

बाल गीत के माध्यम से जो एक सीखने-सिखाने का माहौल बनता है, वो अपने आपमें बहुत ही रोचक होता है। अगर आप कक्षा-कक्ष में इसे रोज़ाना करें तो बच्चे स्कूल में आपकी राह देखना शुरू कर देंगे। वो विभिन्न कविताएं गा-गाकर बातायेंगे कि ये वाली नहीं, अमुक वाली कविता सुनाइए। इतना ही नहीं बच्चे बालगीत में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के अर्थ जानने के लिए आपकी जान खा जायेंगे। यानि यह एक छोटा सा प्रयास भाषा के आनंद के साथ-साथ बच्चों के शब्द भण्डार में बढ़ोत्तरी का जरिया भी बन जाता है।

primary-school-up-3कक्षा कक्ष में आप बने रहें, बच्चे इसके लिए नए-नए जुगत लगायेंगे, कई बार तो आप तंग हो जायेंगे। लेकिन हाँ अगर हम विचार करें तो हम स्कूल में  ऐसा ही माहौल बनाने के लिए जूझ रहे हैं और आप यकीन माने एक बार अगर हम ऐसा माहौल बनाने में सफल हो गए तो बच्चों को कुछ भी सिखाना कठिन नहीं रह जाएगा। चाहें वो मूर्त हो या अमूर्त। इस प्रक्रिया के माध्यम से आप जाने अनजाने ‘भयमुक्त वातावरण’ बनाने में भी सफल हो जायेंगे जिसकी बात NCF, RTE एवं बड़े-बड़े शिक्षाविद करते नहीं थकते।

सवालों से सीखने की प्रक्रिया को गति मिलेगी

एक बार अगर आपने भयमुक्त वातावरण बना दिया तो बच्चों के प्रश्न करने की जिजीविषा बढ़ जायेगी क्योंकि वो नैसर्गिक प्रक्रिया है। और हाँ अगर उन्होंने प्रश्न करना शुरू कर दिया और हमने ठान लिया कि हम इन प्रश्नों का उत्तर देंगे, तो आप जान लें और मान भी लें कि हम शिक्षक भी बहुत कुछ सीख जायेंगे। क्योंकि शिक्षकों की तरफ से आने वाले सभी प्रश्नों के उत्तर हमारे पास नहीं होंगे और उनके सीखने की भूख को शांत करने के लिए हमारे सीखने के दायरे को बढ़ाना पड़ेगा और जब हम उनको बढ़ाना शुरू करेंगे तो हमें ज्ञान अर्जन के नए-नए रास्ते मिलेंगे और हम इनको तलाशते-तलाशते बहुत कुछ नया सीख जायेंगे। यही तो मनुष्य का जीवन है सीखना,सीखना और सीखना क्योंकि किसी ने कहा भी है कि सीखना एक आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है।

(इस पोस्ट के लेखक कौशलेंद्र सिंह हैं। उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं के साथ काम किया है। शिक्षकों और बच्चों के साथ उनका ख़ास जुड़ाव है। साहित्य के प्रति उनका लगाव उनको सतत लिखने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। शिक्षकों के बीच चर्चाओं का माहौल बनाना और सवालों के जवाब खोजने के लिए प्रेरित करना उनको विशेष रूप से पसंद है।

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Anonymous

बहुत ही सुंदर लेख है बच्चों को अपने ओर बाल गीतों के माध्यम से खीचने का …

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