कलियुग में मनुष्यता
नए युग के प्रारंभ मे,
मानवजाति का महाप्रकोप ।
अभिमान की सीमा देखो,
स्वयं समझे खुद को तोप।
अहंकार की कमी नहीं,
न जपता कभी हरि का नाम।
परंतु लालच जब हो पैसों की,
नास्तिक को भी याद आयें राम ।
ज्वाला जब हो ईर्ष्या की,
रिश्ते नातों का अर्थ नहीं।
भाई-भाई का श्रेष्ठ शत्रु,
प्रेम भावना न रही कहीं।
कलयुग की मनुष्यता अब है,
बेईमान सबसे सुखी यहाँ।
ईमानदार सबसे बड़ा मूर्ख है,
धूर्तों को पूजे सारा जहाँ।
