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कविता: ‘कलियुग की मनुष्यता’

कलियुग में मनुष्यता
नए युग के प्रारंभ मे,
मानवजाति का महाप्रकोप ।
अभिमान की सीमा देखो,
स्वयं समझे खुद को तोप।

अहंकार की कमी नहीं,
न जपता कभी हरि का नाम।
परंतु लालच जब हो पैसों की,
नास्तिक को भी याद आयें राम ।

ज्वाला जब हो ईर्ष्या की,
रिश्ते नातों का अर्थ नहीं।
भाई-भाई का श्रेष्ठ शत्रु,
प्रेम भावना न रही कहीं।

कलयुग की मनुष्यता अब है,
बेईमान सबसे सुखी यहाँ।
ईमानदार सबसे बड़ा मूर्ख है,
धूर्तों को पूजे सारा जहाँ।

 

(इस कविता के लेखक नीलाभ ठाकुर हैं। कक्षा 10वीं के छात्र हैं और दिल्ली के सनातन धर्म पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। यह उनकी पहली कविता है जो यहाँ प्रकाशित हो रही है। प्रथम प्रयास को प्रोत्साहित करने के लिए आपकी सकारात्मक टिप्पणी और रचनात्मक सुझावों का हार्दिक स्वागत है।)

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Aditya

Bohot sundar kavita bachche……….Lage raho🔥

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