‘खतरा स्कूल’ किताब की कहानी ब्राजील के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट क्लॉडियस के बनाये कार्टूनों के माध्यम से स्कूली दुनिया की सच्चाइयों को हमारे सामने खोलती है। इसका भारतीय संदर्भ में प्रस्तुतिकरण भारत के प्रख्यात शिक्षाविदों में गिने जाने वाले विनोद रायना द्वारा किया गया।
इस किताब में नवोदय शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उन स्कूलों के लिए जो सबके लिए होने का दावा करते हैं। लेकिन वास्तव में वे भी एक विशिष्ट तबके लिए सिमट कर रह जाते हैं, बाकी हासियाकृत लोगों के बच्चों के लिए उनके पास पाबंदियों का पिटारा है और निर्देशों की अनगिनत शृंखला है जो छात्रों के लिए बोरियत, परेशानी, खीज और गुस्से का सबब बन जाती है। इस माहौल में अभिभावक भी परेशान हैं जो शिक्षकों से सख्ती की गुजारिश करते हैं और अंततः बच्चों पर अतिरिक्त दबाव बनाने को ही बढ़ावा देते हैं।
एक कार्टून में दिखाया गया है कि कुछ लोग एक लड़की पर टिप्पणी कर रहे हैं कि अच्छे नंबर नहीं मिले तो चूल्हा फूंकेगी। टीवी के सामने क्यों बैठी है, चल होमवर्क पूरा कर। फिर खराब अंक, बाबू जी इस बार खबर लेंगे तुम्हारी। शिक्षकों में भी बेचैनी है, तो कई संतुष्ट हैं। कई शिक्षकों को लगता है कि सारी परिस्थिति के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। शिक्षकों के ऊपर काम का बोझ बढ़ता जाता है। उनके ऊपर पाठ्यक्रम के साथ-साथ प्रशासनिक और ग़ैर-शैक्षणिक कामों का बोझ बढ़ता चला जाता है। यह स्थिति वर्तमान समय में शिक्षकों की स्थिति को बहुत सहजता से बयान करती है। इस यथास्थिति में बदलाव की कोशिश करने वाले शिक्षकों का चौतरफा विरोध होता है। उनके लिए परेशानी खड़ी की जाती है।
इस किताब में बच्चों के ड्रॉप आउट होने और ऐसे बच्चों के भारी संख्या में होने की बात है जिन्होंने स्कूल जैसी कोई चीज़ देखी ही नहीं। उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही वे चीज़ों को करते हुए देखते हैं और सीखते हैं। इस समाज को आदिवासी और पिछड़ा होने की लेबलिंग से नवाजा जाता है। इसके बाद स्कूलों के बँटवारे की कहानी शुरू होती है, जिसमें अमीरों और गरीबों के स्कूल अलग-अलग होते हैं। निजी व सरकारी स्कूलों के बीच सुविधाओं की भारी खाई की कहानी आज भी लगातार जारी है, उस विरोधाभाष की तरफ हमारा ध्यान यह किताब बड़ी सहजता से खींच लेती है। इसमें सामाजिक ग़ैर-बराबरी को कायम करने वाले हथियार के रूप में शिक्षा का एक दूसरा ही चेहरा सामने आता है, जहाँ सारे बच्चे दौड़ते हुए दिखाई देते हैं लेकिन कुछ बच्चों की सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। बस बाहरी तौर पर ऐसा दिखाई देता है कि सारी चीज़ें व्यवस्थित हैं।
एक-तरफा निर्देशों से संचालित बच्चों की जिंदगी, पहले से निर्धारित नियम और शिक्षक ही सबकुछ तय करने वाला (आदेश, फैसला, सज़ा) व्यक्ति होता है। बच्चे से स्कूल में आते ही उसकी बोली, सपने, आकांक्षाएं, बालपन, मासूमियत, जिज्ञासा, सपने, निजी अनुभव और नेतृत्व सबकुछ छीन लिया जाता है। यहां से औपचारिक शिक्षा की डगर शुरू होती है जो लगातार टेस्ट की बाधा दौड़ से गुजरती है औऱ साल के आखिर में छंटनी के अंजाम पर जाकर समाप्त होती है। जो बहुत से बच्चों का आत्मविश्वास छीन लेती है, उनके भीतर निराशा के भाव भरती है और फेल होने के ठप्पे से समाज में अपमानित होने के लिए विवश करती है।
वास्तव में कई बार बच्चों को पढ़ाये जाने वाले विषय वास्तविक दुनिया से कटे हुए होते हैं और विषयों को पढ़ने में बच्चों की रूचि हो या न हो, आपको वही पढ़ना होता है जो पहले से पाठ्यक्रम में तय है। इस किताब में कही गई कुछ पंक्तियां एक सटीक टिप्पणी की तरह प्रतीत होती हैं, “स्कूल शिक्षा से निर्भरता व ग़ैर-बराबरी का तजुर्बा हासिल करके हम अपनी काम करने की शक्ति खो देते हैं। साथ मिलकर कुछ नया बनाने की क्षमता व साथ रहने का तरीका। हम खो देते हैं वास्तविकता, आलोचनात्मक तरीके से देखने की क्षमता और पक्ष लेने की ताकत! इस तरह हम खो देते हैं एक विकल्प खोजने का नजरिया!”
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