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इस ‘खतरा स्कूल’ को बदलने का कोई उपाय है?

भारत में स्कूली शिक्षा, स्कूल जाते बच्चे, हम स्कूल क्यों जाते हैं

कोई बच्चा छूटे न वाली नीति की चर्चा तो बहुत होती है। मगर ऐसा माहौल बनाने के लिए क्या वाकई गंभीर प्रयास होते हैं?

एक स्कूल जहां बच्चों की पिटाई होती है। जहां बच्चे आपस में झगड़ते हैं। जहां ऑफिस तो व्यवस्थित होता है। मगर कक्षाओं की स्थिति अस्त-व्यस्त होती है। जहां की तस्वीरें अख़बार में छपती हैं और सैकड़ों-हज़ारों लोगों तक पहुंचती हैं। मगर जिस स्कूल की व्यवस्था अपने स्कूल के 150-200 बच्चों तक ढंग से नहीं पहुंच पाती। इस स्कूल को ‘खतरा स्कूल’ भी कह सकते हैं।

ऐसे स्कूल में अगर आपको सबसे पहले कुछ बेहतर करना हो क्या बेहतर करेंगे? यही सवाल मेरे सामने है। जिसका जवाब खोजने की कोशिश इस पोस्ट में हो रही हैं।

बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार

सबसे पहली प्राथमिकता तो यही होनी चाहिए कि बच्चों के साथ शिक्षकों का अच्छा व्यवहार कैसे हो? उनके ऊपर शिक्षकों का भरोसा कैसे बढ़े? इसे सुनिश्चित करने की जरूरत है। ताकि स्कूल का माहौल बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा का अहसास करा सके कि आप एक ऐसी जगह हैं जहां आपको कोई शारीरिक दण्ड नहीं मिलेगा। आप ऐसी जगह हैं जहां आपको कोई भावनात्मक चोट नहीं पहुंचाएगा।

इसके बाद की प्राथमिकता होगी कि बच्चों के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हो। वे एक-दूसरे के साथ बात करना शुरु करें। इसमें शिक्षकों की मध्यस्थता हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। बच्चों के बीच आपसी संवाद के माध्यम से और उनको जिम्मेदारियां देकर आपस में होने वाले झगड़े का हल खोजा जा सकता है।

इसके साथ ही उन बच्चों को चिन्हित किया जा सकता है जिनका नाम बार-बार बच्चों के साथ झगड़े के सिलसिले में सामने आता है। या फिर बाकी बच्चे जिनसे डरते हैं। यह काम शिक्षक ही कर सकते हैं। एक बात का ख्याल रखना होगा कि बच्चों को केवल शारीरिक दण्ड के माध्यम से शांतिप्रिय हो जाने का संदेश न दिया जाए। बच्चों के साथ नियमित अंतराल पर बातचीत हो और उनके अभिभावकों के साथ भी संपर्क होना चाहिए। अभिभावक को बच्चों के बारे में पता होना चाहिए कि स्कूल में उनका बच्चा क्या कर रहा है? ताकि बच्चों के अभिभावक बाद में यह शिकायत न करें कि स्कूल ने बच्चे के व्यवहार और प्रगति के बारे में कभी कोई जानकारी नहीं दी।

प्रधानाध्यापक का नेतृत्व

अब स्कूल में कक्षाओं की स्थिति वाले मसले की तरफ लौटते हैं। प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास कार्यक्रम वाले दिनों में अपने एक प्रधानाध्यापक के साथ बात हो रही है कि क्लासरूम के संदर्भ में तीन चीज़ें बहुत मायने रखती हैं कंटेंट, कम्युनिकेशन और साइकॉलजी। यानि विषयवस्तु की तैयारी कैसी है, उसे किस तरीके से बच्चों तक पहुंचाया जा रहा है (ताकि उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके) और साइकॉलजी यानि क्लासरूम में शिक्षक शिक्षण की पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चों के मनोविज्ञान का पूरा ख्याल रखते हुए इन सारी चीज़ों को बहुत अच्छे से करें।

गणित का डर. बच्चा कैसे बने निडर ?उस समय उच्च प्राथमिक विद्यालय के उन प्रधानाध्यापक जी ने हँसते हुए कहा था कि यह बड़ी-बड़ी बातें तो विश्वविद्यालय और कॉलेज के स्तर पर लागू होती हैं। छोटे बच्चों के साथ काम करने के दौरान इतनी सारी चीज़ों का ख्याल रख पाना तो बहुत मुश्किल है।

यही प्रधानाध्यापक अभी राजस्थान के एक उच्च माध्यमिक विद्यालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्होंने अपने पुराने स्कूल में नए सत्र की शुरुआत में स्टाफ की बैठक की। जो शिक्षक छोटे बच्चों को पढ़ाने में रुचि रखते हैं। उनको छोटे बच्चों की कक्षा की कक्षाएं दीं।

इसके साथ ही मन की बात कार्यक्रम में (यह बात साल 2011 की है) बच्चों को स्कूल से जुड़ी अच्छी बातें और शिकायतें साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के द्वारा साझा की जाने वाली बातों को सार्वजनिक रूप से सबके सामने रखा। शिक्षकों से जुड़े मसलों को भी असेंबली में रखा। उनके ऊपर सबके सामने बातचीत की और समाधान देने का प्रयास किया। क्लासरूम में बच्चों को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहन मिला ताकि वे चीज़ों को समझने की दिशा में प्रयास करने की आदत डाल सकें।

बच्चों के साथ बातचीत

इसके साथ ही स्कूल की बाल संसद का चुनाव के माध्यम से गठन करने वाली प्रक्रिया को पूरी तन्मयता से संपन्न किया। स्कूल की असेंबली में ज्यादातर बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ छोटे बच्चों को शामिल करने के लिए बालगीत को असेंबली का हिस्सा बनाया। स्कूल के विकास से जुड़े नए विचारों का स्वागत किया। जब आठवीं के बच्चे पास होकर जाने वाले थे तो उन्होंने हर बच्चे को बुलाकर उससे बात की कि आगे कहां एडमीशन लेना है। इस दौरान बाकी शिक्षक भी आठवीं कक्षा में मौजूद थे। उन्होंने बच्चों के प्रयासों को प्रोत्साहित भी किया।

इस पूरी यात्रा का जिक्र इसलिए हो रहा है ताकि आपका इस बात में भरोसा हो सके कि एक कुशल नेतृत्व चीज़ों को सही दिशा देता है। इस बात के प्रति सजग शिक्षक बच्चों की ऊर्जा और जिज्ञासा को अपनी सहूलियत के लिए कुर्बान नहीं होने देता। क्योंकि उसे इस बात का अहसास होता है कि हम अपने हिस्से का किरदार तो अदा कर रहे हैं, मगर शिक्षा का कार्य तो भविष्य के ज्यादा जटिल सवालों से जूझने वाले व्यक्तित्व के निर्माण का है। जो परिस्थितियों के साथ समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ उसके बदलाव के लिए भी सतत प्रयत्नशील होगा।

स्कूल की व्यवस्था सभी बच्चों तक कैसे पहुंचे?

ऊपर वाले स्कूल के माहौल में 150-200 बच्चों तक पहुंचने वाली व्यवस्था के निर्माण का रास्ता मिलता है। जो लोकतांत्रित तरीके से बच्चे, शिक्षकों व समुदाय की सहभागिता से गतिशील बनी रहती है। क्योंकि स्कूल की असेंबली में बच्चों की आवाज़ आती रहती है। स्कूल में होने वाली घटनाओं पर चर्चा होती रहती है। मसला चाहें किसी बच्चे के स्कूल से भाग जाने का हो, या फिर गाली देने का हो या फिर किसी के आपस में झगड़ा करने का या फिर किसी शिक्षक के कालांश के दौरान उपस्थित न होने का, या फिर किसी शिक्षक के अच्छा पढ़ाने का हो या फिर कंप्यूटर और अंग्रेजी विषय में ज्यादा फोकस करने की अपेक्षा का हो या फिर बच्चों के पिकनिक पर जाने की बात हो सबका जिक्र असेंबली में होता रहता है।

इससे बच्चों के बीच एक भरोसा पैदा होता कि उनकी बात सुनी जाएगी और शिक्षकों को भी अपनी जिम्मेदारी का अहसास होता है कि ऐसे माहौल में हमें भी अपना शत-प्रतिशत देना होगा। ऐसे माहौल में बच्चों की विभिन्न रचनात्मक क्षमताओं का भी विकास होता है। जो उनको मुखर बनाती हैं। अपनी बात को आत्मविश्वास के साथ रखना सिखाती हैं और स्वतंत्र रूप से सोचने को प्रोत्साहित करती हैं। आपसी विचार-विमर्श से रास्ता खोजने वाले तरीके में विश्वास करना सिखाती हैं। जाहिर सी बात है कि इतनी सारी चीज़ें एक दिन में तो होती नहीं। इसके लिए धीरे-धीरे प्रयास करने होते हैं। शिक्षकों में पढ़ने की आदत का विकास करने का मसला भी स्टाफ मीटिंग के दौरान इस स्कूल में उठा था।

बच्चों को उनकी पसंद से किताबे देने की शुरुआत भी इस स्कूल में हुई थी। शिक्षक बच्चों को किताबों के बीच छोड़ देते थे कि अपने पसंद की किताब चुनकर लाओ। तो जहाँ जरूरत होती थी वहां सपोर्ट भी करते थे। यानि इस स्कूल का शायद ही कोई ऐसा पहलू होगा जो इस तरह के बहुआयामी प्रयास में अछूता रहा हो। स्कूल में ऐसा माहौल बनाने के लिए बड़े धैर्य की जरूरत होती है। हर चीज़ बहुत सोच-समझकर और लोगों से विचार-विमर्श के बाद करनी होती है ताकि किसी स्टाफ को यह न लगे कि उसे उपेक्षित किया जा रहा है। उसके विचारों को महत्व नहीं दिया जा रहा है।

आखिर में कह सकते हैं कि ऐसे स्कूलों को एक बेहतर लीडरशिप की जरूरत है जो बच्चों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो। उनके विकास के लिए प्रतिबद्ध हो।

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