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एजुकेशन मिरर: नई सीरीज़ में पढ़िए ‘लिट्रेसी हीरोज़’ की प्रेरित करने वाली कहानियां

पठन कौशल, पढ़ने की आदत, रीडिंग स्किल, रीडिंग हैबिट, रीडिंग रिसर्च,

एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

हममें से अधिकांश लोगों को पढ़ना पसंद है और हम पढ़ने के फ़ायदों से भी परिचित हैं। मगर क्या हम भारत के उन लोगों को जानते हैं जो छोटे बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के मिशन में दिल से जुड़े हुए हैं।

एजुकेशन मिरर की नई सीरीज़ ‘लिट्रेसी हीरोज़’ ऐसे ही किरदारों की तलाश की कहानी कहती है जो स्थानीय स्तर पर परिचित हैं। मगर एक राष्ट्रीय पहचान के हकदार है। जो सही अर्थों में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की ज़मीनी कहानियां लिख रहे हैं, जिनकी चर्चा बहुत से कारणों से नहीं हो पाती है।

लिट्रेसी के ‘असली नायक’

EARLY-LITERACYहम ‘लिट्रेसी हीरोज़’ की नज़र से बच्चों की दुनिया को समझने की कोशिश करेंगे, बच्चों के लिए लायब्रेरी में पहली बार जाने की खुशी क्या होती है, पहली बार जब कोई बच्चा किसी अक्षर को पहचानना सीखता है तो उनको कैसा लगता है?

क्लासरूम में कुछ बच्चों को पढ़ता देखकर बाकी साथियों पर क्या असर होता है, क्लासरूम में पियर लर्निंग से क्या मदद मिलती है, बच्चों का कहानियों से कैसा रिश्ता होता है।

छोटे बच्चों के लिए बालगीतों का पढ़ना सीखने की यात्रा में क्या योगदान है, बालवाड़ी के स्तर पर कौन सी बातों का ध्यान रखने की जरूरत है, पहली-दूसरी कक्षा में भाषा शिक्षण की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं, उनके समाधान क्या हैं, समस्या और समाधान के इस खेल में निराशा और उम्मीद की तलाश कहाँ होती है।

लिट्रेसी के मायने क्या हैं?

लिट्रेसी या साक्षरता का पारंपरिक अर्थ पढ़ने और लिखने की क्षमता है। आधुनिक संदर्भों में इसके अर्थ को विस्तार मिला है, जिसमें भाषा के इस्तेमाल की योग्यता, अंकों, चित्रों, कंप्यूटर और चीज़ों को को समझने, संवाद करने, ज्ञान हासिल करने, गणितीय समस्याओं को हल करने जैसी बातों को भी शामिल किया गया है। समय के साथ टेक्नोलॉजी के माध्यम से ज्ञान हासिल करने को भी डिजिटल लिट्रेसी का नाम दिया गया और इसे 21वीं सदी के बुनियादी कौशलों में शामिल किया गया, जिसका विकास करने की अपेक्षा माध्यमिक स्तर की शिक्षा से की गई है।

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बच्चों को किताब पढ़ने की कोशिश करते देखकर इस बच्ची को भी पढ़ने की प्रेरणा मिली।

भारत मूलतः एक बहुभाषी देश हैं, जहाँ हर व्यक्ति दो या दो से अधिक भाषाओं को बोलता, समझता और रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल करता है। इसी संदर्भ में हर क्षेत्र की अपनी बोलियां या भाषाएं हैं, जिनको शिक्षा के माध्यम की मुख्य भाषा (अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, तेलगू, कन्नड़ या उर्दू) के साथ-साथ विद्यालय स्तर पर उपयोग करने की अपेक्षा प्रारंभिक साक्षरता या अर्ली लिट्रेसी के संदर्भ में होती है। वैश्विक साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयास साल 1946 से ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये जा रहे हैं। यानि यह सवाल और उसके समाधान के लिए होने वाले प्रयासों का एक लंबा इतिहास है। उसकी अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि है। इसमें बीतें कुछ दशकों में बड़ी तेज़ी से बदलाव हुआ है।

‘लिट्रेसी हीरोज़’ की प्रेरित करने वाली कहानियां

भारत में प्रारंभिक साक्षरता या अर्ली लिट्रेसी के संदर्भ में बहुत से प्रयोग और प्रयास हो रहे हैं। इन प्रयासों को ज़मीनी स्तर पर पहुंचाने और उसके क्रियान्वयन की अहम जिम्मेदारी निभाने का कार्य विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले शिक्षक-प्रशिक्षकों द्वारा किया जा रहा है। जो पुस्तकालय, भाषा-शिक्षण, भाषा शिक्षकों के प्रशिक्षण, भाषा शिक्षण के प्रशिक्षण की सामग्री बनाने जैसे अहम क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। भारत की अग्रणी संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवम प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा भी इस संदर्भ में कापी प्रयास किये गये हैं, जो प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमारे के नेतृत्व में रीडिंग सेल के गठन और पढ़ना है समझना जैसे स्लोगन की खोज जैसे नवाचारों और अभिनव प्रयासों के माध्यम से आगे बढ़ी।

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अगर आप भी शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं तो बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने के अनुभव लिखें।

इस कड़ी में एजुकेशन मिरर की कोशिश है कि भारत में लिट्रेसी के काम के जरिये ग्रामीण, आदिवासी और शहरी क्षेत्रों में पढ़ने-लिखने की स्थिति को बदलने में जो साथी सक्रियता से अपना योगदान दे रहे हैं, उनकी कहानी को ‘लिट्रेसी हीरोज़’ नाम की एक सीरीज़ में प्रकाशित किया जाये। ताकि हम ऐसे लोगों से परिचित हो सकें जो सच में असर जैसे आँकड़ों को पलटने का माद्दा रखते हैं। जो बच्चों के पढ़ना-लिखना सीखने की प्रक्रिया को ज्यादा रोचक, सार्थक और आनंददायी बनाने के प्रयासों को सफलता तक पहुंचा रहे हैं। मगर उनकी कहानियां, उनकी अपनी डायरी या चर्चाओं में बाहर आने वाली कहानियों में मौखिक रूप से दर्ज़ है।

ऐसी कहानियों में हमारे लिए निश्चित तौर बहुत कुछ सीखने के लिए होगा। हम एक ऐसे समूह से परिचित हो सकेंगे, जो सवालों का ज़मीन पर उतरकर सामना कर रहा है, उनके जवाब देने की कोशिश कर रहा है। एजुकेशन मिरर के इस प्लेटफार्म के जरिये हम चाहते हैं कि शिक्षकों व शिक्षक-प्रशिक्षकों के अच्छे प्रयासों को प्रोत्साहन मिले, उनके प्रयासों से अन्य लोगों को सीखने का मौका मिले। जो साथी ऐसे प्रयास कर रहे हैं उनको भी अपनी कहानी कहने का आत्म-विश्वास मिले।

 

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