गिनती सिखाने के लिए ठोस–वस्तुओं और टीएलएम के साथ–साथ कविताओं के माध्यम से भी बच्चों को गिनती सिखाती हैं। इन प्रयासों के कारण उनकी कक्षा में बच्चों की सक्रिय भागीदारी होती है। कक्षा का माहौल जीवंत रहता है। बच्चे भी उत्साहित रहते हैं। वे हाथ उठाकर सवालों का जवाब देते हैं, ब्लैकबोर्ड पर सवालों को हल करते हैं, छोटे–छोटे समूह में चर्चा करते हैं। टीना मैडम समय से अपना पाठ्यक्रम पूरा करने पर विशेष जोर देती हैं।
इतनी कोशिशों के बावजूद एक समस्या स्थायी रूप से बनी रहती है। जब भी आकलन होता है तो कक्षा के अधिकांश बच्चे अपेक्षित अधिगम स्तर तक नहीं पहुंच पाते हैं। जैसे हिन्दी भाषा में अधिकांश बच्चे शब्दों को अटक–अटक कर पढ़ रहे होते हैं, शब्दों व वाक्यों को प्रवाहपूर्ण तरीके से पढ़ने और उस पर आधारित सवालों का जवाब देने में चुनौती महसूस करते हैं। जबकि कुछ बच्चे धाराप्रवाह पठन और समझ आधारित सवालों का जवाब देने में निपुणता हासिल कर लेते हैं।
ठीक यही स्थिति गणित विषय में भी होती है अधिकांश बच्चे 100 तक की गिनती तो बोल लेते हैं। लेकिन संख्या पहचान में जूझते हैं। संख्या पहचान और जोड़‑घटाव जानने वाले बच्चे भी इबारती सवाल हल करते समय पूछते हैं कि मैडम, इस सवाल में हमें जोड़ना है या घटाना?
टीना मैडम कहती हैं, “मैं तो पूरी मेहनत से पढ़ाती हूँ, बच्चे कक्षा में सक्रियता से हर गतिविधि में भाग लेते हैं, फिर भी सभी बच्चे क्यों नहीं सीख रहे हैं?”
एक दिन उनकी कक्षा अवलोकन के बाद मैंने बातचीत की।
“टीना जी, आज आपने बच्चों को क्या सिखाया?”
“मैंने बच्चों को जोड़ करना सिखाया।”
“दिन के अंत तक आप क्या चाहती थीं, कि बच्चे क्या कर पाएं?”
“जोड़ कर सकें?”
क्या आप चाहती थीं कि बच्चा जोड़ करना रट लें या फिर जोड़ की समझ और विभिन्न संदर्भ में उपयोग कर सकें?
इस बातचीत के बाद टीना जी कुछ देर शांत रहीं और कुछ समय सोचने का बाद उन्होंने कहा, “जब आप अगली बार मेरी कक्षा में आएंगे तबतक मैं जरूर इस समस्या का कोई समाधान खोज लूंगी।”
सीखने का लक्ष्य बनी ‘पहली प्राथमिकता‘
इस बार टीना जी ने बच्चों से केवल जोड़ के सवाल हल नहीं करवाए। बल्कि बच्चों से यह भी पूछा कि अगर तुम्हारे पास 12 आम हैं और तुम्हारे दोस्त के पास 8 तो कुल कितने आम होंगे? बच्चे सोचने लगे और उन्होंने जवाब दिया 20। इस बार बच्चों ने जोड़ भी किया और यह भी समझा कि जोड़ का एक पहलु दो समूहों की मात्राओं को आपस में मिलाना होता है।
कुछ ही हफ्तों के बाद कक्षा–कक्ष का माहौल बदलने लगा। बच्चे अब सिर्फ सवालों के जवाब नहीं दे रहे थे, बल्कि सोच भी रहे थे। वे सवालों का अर्थ समझ रहे थे और उन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन अनुभवों से जोड़ भी पा रहे थे। इससे बच्चे के सीखने की प्रगति में बदलाव साफ–साफ दिखने लगा।
‘सीखने का लक्ष्य‘ क्यों जरूरी?
टीना मैडम की यह कहानी, किसी एक शिक्षक की नहीं है। यह हमारे देश के हज़ारों शिक्षकों का अनुभव है। वे मेहनती हैं, शिक्षण के प्रति समर्पित हैं, पढ़ाने के अलग–अलग तरीके अपनाते हैं। लेकिन अक्सर परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आता। इसकी एक बड़ी वजह है – सीखने के लक्ष्य की अस्पष्टता। अगर शिक्षक को यह नहीं पता कि दिन के अंत में बच्चों में कौन–सा कौशल (या समझ) विकसित करना है, तो बच्चे सीखने के अपेक्षित अधिगम स्तर तक नहीं पहुंच पाते हैं।
सीखने के लक्ष्य (लर्निंग आउटकम) की स्पष्टता के बिना पढ़ाना, ठीक वैसा ही है जैसे बिना नक्शे के किसी नए शहर में निकल जाना। यानि सीखने का लक्ष्य वह नक्शा है जो शिक्षक के काम और उनकी मेहनत को हर दिन एक सटीक दिशा देता है।
उदाहरण के लिए:
– आज बच्चों को कविता सुनानी है, यह एक गतिविधि है।
– आज बच्चे कविता सुनने के बाद तुकांत शब्दों की पहचान सकेंगे। यह एक सीखने का लक्ष्य है।
– आज जोड़ करवाना है, यह एक गतिविधि है।
– आज बच्चे दो अंकों की संख्याओं का जोड़, बिना गिनती को क्रम से बोले हुए कर सकेंगे। यह एक सीखने का लक्ष्य है।
– आज घटाव करवाना है। यह एक गतिविधि है।
–आज बच्चे किसी दी हुई वस्तुओं से समूह से कुछ चीजों को हटाकर घटाव का अर्थ समझ सकेंगे, यह सीखने का एक लक्ष्य है।
एक गतिविधि बताती है कि क्या करना है (शिक्षक के संदर्भ में)। जबकि सीखने का लक्ष्य बताता है कि बच्चे को क्या सीखना है/बच्चे में कौन से कौशल विकसित करने हैं (बच्चे के संदर्भ में)। यही स्पष्टता शिक्षण को एक दिशा देती है।
इस बारे में शोध क्या कहते हैं?
शिक्षाशास्त्री जॉन हैटी ने अपने प्रसिद्ध शोध ‘विजिबल लर्निंग’ में पाया कि “स्पष्ट सीखने के उद्देश्य” (Clear Learning Objective) बच्चों के सीखने पर अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसके प्रभाव का आकार (effect size) लगभग 0.75 है – यानी जब शिक्षक और बच्चे दोनों जानते हैं कि सीखने का लक्ष्य क्या है, तो परिणाम कहीं अधिक बेहतर होते हैं।
बिना किसी खास रणनीति के बच्चों के सीखने में “सामान्य प्रगति” होती है। लेकिन अगर उस बच्चे को ऐसी कक्षा मिले जहाँ हर दिन के सीखने के लक्ष्य स्पष्ट रूप से बताए जाते हैं। इसी के अनुरूप गतिविधियाँ होती हैं और बच्चों के सीखने का आकलन होता है तो वही बच्चा लगभग डेढ़ से दो साल की प्रगति एक ही साल में कर सकता है।
शिक्षक की भूमिका
जब शिक्षक अपने हर दिन के शिक्षण का लक्ष्य तय करते हैं तो वे केवल ‘पाठ पूरा करने वाले’ व्यक्ति से एक ‘मार्गदर्शक’ में बदल जाते हैं। अब वे खुद से सवाल पूछने लगते हैं:
- आज के दिन बच्चों में कौन सा कौशल विकसित करना है?
- इस कौशल को सीखने में किन–किन बच्चों को अतिरिक्त सहयोग चाहिए?
- कौन–सी गतिविधि बच्चों को आज के ‘अधिगम लक्ष्य‘ तक पहुँचने में मदद करेगी?
- दिन के अंत तक मैं कैसे जान सकूंगा कि मेरा लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं?
अगर शिक्षक के पास शिक्षक संदर्शिका जैसी मार्गदर्शिका हो, तो वे उस संदर्शिका में भी ऊपर दिए सवालों पर केंद्रित कर सकतें है। यह प्रक्रिया किसी शिक्षक को आज “क्या पढ़ाना है” से हटकर “बच्चे आज क्या सीखेंगे” की तरफ ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है। यही बदलाव शिक्षण और बच्चों के सीखने की गुणवत्ता तय करता है।
‘जब लक्ष्य बदला, तो बच्चों का सीखना भी बदला‘
पहले टीना मैडम अपनी कक्षा में बच्चों को जोड़–घटाव के सवाल हल करने के लिए प्रेरित करती थीं। बच्चे “12 + 8 = 20” या “15 – 7 = 8” जैसे सवालों का उत्तर देते थे। लेकिन अब उन्होंने इबारती सवालों पर काम को अपनी तैयारी में शामिल किया। ताकि बच्चे जोड़ की संक्रिया को समझ पाएं और रोजमर्रा की जिंदगी वाले सवालों को हल कर सकें। जैसे अगर तुम्हारे पास 12 आम हैं और तुम्हारा दोस्त 8 आम और लाता है, तो अब तुम्हारे पास कुल कितने आम होंगे?”
उन्होंने अपने पढ़ाने के तरीके में बदलाव किया और हर दिन का एक स्पष्ट सीखने का उद्देश्य तय किया।
पहले दिन: बच्चे दो संख्याओं का जोड़ बिना गिनती के कर सकेंगे।
दूसरे दिन:बच्चे जोड़ को ‘दो समूह की मात्राओं के आपस में मिलाने’ के रूप में समझ सकेंगे।
तीसरे दिन: “बच्चे वास्तविक जीवन से संबंधित जोड़ की समस्याएँ हल कर सकेंगे।“
टीना मैडम कहती हैं, “मैं वही पढ़ा रही थी जो पहले पढ़ाती थी। लेकिन मुझे अब यह पता था कि हर दिन कहाँ पहुँचना है। अब मेरा उद्देश्य सिर्फ सवाल हल करवाना नहीं, बल्कि बच्चों को जोड़ का असल मतलब और इसके उपयोग को समझाना था।”
बच्चों के लिए भी लक्ष्य जानना है ज़रूरी
स्पष्ट लक्ष्य केवल शिक्षक के लिए नहीं, बच्चों के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं। जब बच्चे जानते हैं कि आज उन्हें क्या सीखना है, तो उनका ध्यान केंद्रित रहता है और वे सक्रिय भागीदारी करते हैं।
मान लीजिए आप कहते हैं – “आज हम कहानी सुनेंगे।” तो बच्चा केवल सुनने तक सीमित रहेगा।
लेकिन अगर आप कहते हैं – “आज हम कहानी में मुख्य पात्र की पहचान करना सीखेंगे,” तो बच्चा पढ़ते समय कहानी के पात्रों पर भी ध्यान देगा।
“राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF FS -2022) दोनों ही “सीखने के परिणाम आधारित शिक्षण” पर ज़ोर देती हैं। इसका मतलब यही है कि पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि और आकलन – सब कुछ बच्चे के सीखने को केंद्र में रखकर निर्धारित किया जाना चाहिए।
तीन जरूरी सवाल
कक्षा में जाने से पहले हर शिक्षक को खुद से ये तीन सवाल ज़रूर पूछने चाहिए:
- आज मैं बच्चों को कौन–सा नया कौशल/अवधारणा सिखाना चाहता हूँ?
- मैं कैसे जानूँगा कि बच्चों ने इस नई अवधारणा को सीख लिया है?
- अगर बच्चे पढ़ाने के बाद भी नहीं सीख पाए, तो अगली बार मैं क्या अलग करूँगा?
जब टीना मैडम ने ‘वास्तविक जीवन की समस्या हल करने’ का स्पष्ट उद्देश्य तय करके पढ़ाया तो बच्चों ने जोड़ने का वास्तविक अर्थ समझा। अब वे सवालों को अपने जीवन से जोड़ पा रहे थे। इसलिए, कक्षा में हर दिन का सीखने का एक स्पष्ट उद्देश्य तय करें और देखें कि कैसे आपकी कक्षा में हर बच्चा एक नई दिशा में बढ़ता है।
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