जब हमारे दोस्त वृजेश ने अपना लेख, ‘’जोड़ के सवाल: ‘गलतियों के पैटर्न’ का प्रभावी शिक्षण में कैसे इस्तेमाल करें?’’ को पढ़ कर अपनी राय बताने के लिए कहा, तब मैंने पहले से पढ़े लेख को फिर से दो-तीन बार पढ़ा। पहली बार पढ़ते वक़्त भी मुझे उसमें कई बातें खटकी थीं, लेकिन मैंने उन पर ज़्यादा सोचा नहीं। उसे पढ़ा और पढ़ कर छोड़ दिया, जैसा कि हम इंटरनेट पर आई ढेर सारी सामग्री को पढ़ते वक़्त करते हैं और ना ही मैंने बृजेश से इस लेख के बारे में बात की।
पढ़ने की रणनीति
स्टेफनी हार्वे व एने गुडविज़, 2007 ने अपनी किताब – ‘’स्ट्रेटेजीज दैट वर्क’’ में परकिन्स व स्वार्टज, 1992 के सोचने के बारे में (अधिसंज्ञानात्मक समझ) के चार पहलुओं के आधार पर, चार तरह के पाठकों की पहचान की है। पहला, सहज पाठक, जो पढ़ लेते हैं लेकिन उसके बारे में सोचना नहीं जानते। दूसरा, सजग पाठक, जो पढ़ कर यह तो समझ जाते हैं कि बात समझ में नहीं आ रही है या इसमें कोई उलझन है, लेकिन उसे दुरस्त करने का तरीका नहीं जानते हैं। तीसरा, रणनीतिक पाठक, जो सोचने व समझने की रणनीति की मदद से अपनी समझ व ज्ञान को दुरस्त व बेहतर कर लेते हैं। चौथा, पुनर्चिंतनात्मक (रिफ्लेक्टिव) पाठक, जो अपने सोचने को लेकर रणनीतिक होते हैं और पढ़ने के उद्देश्यों या लक्ष्यों के मुताबिक सोचने व समझने की रणनीतियों का लचीले ढंग से इस्तेमाल करने में कुशल होते हैं।
आप समझ सकते हैं कि अब तक मैंने इस लेख का सजग पाठक की तरह ही पढ़ा था, लेकिन वृजेश के अनुरोध की वजह से, इसे चौथे स्तर यानी पुनर्चिंतनात्मक पाठक की तरह पढ़ने की ज़रूरत थी। मैंने वृजेश को चेताया कि इस तरह से पढ़ने पर इस लेख में आए विचारों की समालोचना होने का पूरा पूरा ख़तरा है। उसने आश्वस्त किया कि उसे अपने विचारों की आलोचना से कोई एतराज नहीं है। इससे इस लेख को बेहतर होने में ही मदद मिलेगी। अब हमारे सामने काम यह है कि इस लेख का आलोचनात्मक पठन कैसे करें? शुरुआत हम लेख की रूपरेखा को समझने से कर सकते हैं। लेख को हम मोटे तौर पर पांच हिस्सों में बांट सकते हैं।
- गणित शिक्षण के प्रति नज़रिया
- जोड़ के सवालों को हल करने में की जाने वाली ग़लतियां व उनका निराकरण
- ग़लतियों का वर्गीकरण
- गणित शिक्षण की एक एप्रोच या तरीका
- शिक्षक को कुछ सामान्य सुझाव देना
लेखक ने अपने कक्षा अवलोकनों के दौरान कई बच्चों को कुछ ख़ास तरीकों से हल करते देखा तो उन्होंने उसे ग़लतियों का नाम देकर संग्रहित किया और उनका वर्गीकरण किया तो पाया कि उनके मुताबिक बच्चे चार-पांच तरह की ही ग़लतियां करते हैं। मुझे लगता है कि यह एक करने लायक काम है, जिसे साल-दर-साल राष्ट्रीय पैमाने पर किया जाना चाहिए, और जिसे हमारा शैक्षिक तंत्र आम तौर पर नहीं करता है। और इसे सिर्फ जोड़-घटाने के मामले में ही नहीं गणित की सभी बुनियादी अवधारणाओं के मामलों में किया जाना चाहिए। यहां बुनियादी से मतलब कक्षा दो या तीन तक की गणितीय अवधारणाओं से नहीं है, बल्कि गणित की बुनियादी अवधारणाओं से है जो भले ही कक्षा एक में सिखाई जाएं या कक्षा दस में।
इन ग़लतियों का संग्रह करते हुए लेखक के मन में कई सवाल उठे होंगे। जैसे, कई बच्चे एक ही तरह की ग़लती क्यों करते नज़र आते हैं? इन ग़लतियों को करने की वज़ह क्या हो सकती है? क्या वह गणित सिखाने के नज़रिए में छुपी है? क्या वह गणित सिखाने के तरीके में छुपी है? इन ग़लतियों को दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है? आदि। लेखक ने अपने लेख में इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की है।
गणित शिक्षण के प्रति नज़रिया
सबसे पहले हम गणित विषय के शिक्षण के बारे में लेखक के नज़रिए को समझने की कोशिश करते हैं। वैसे तो यह नज़रिया पूरे ही लेख में समाया हुआ है लेकिन खुले तौर पर यह लेख में तीन जगहों पर दिखाई देता है – शुरूआत में और गणित शिक्षण की एक एप्रोच में और अंत में ग़लतियों पर टिप्पणी लिखते वक़्त।
लेखक के नज़रिए की प्रमुख बातें
- ‘’गणित विषय पढ़ाने का उद्देश्य केवल सवालों को हल करवाना और बच्चों को सही जवाब तक पहुंचाना भर नहीं है, इसका वास्तविक उद्देश्य गणितीय चिंतन का विकास करना है।‘’
- ‘’आप बच्चे की कॉपी चेक करते समय उससे पूछिए कि तुमने यह सवाल कैसे हल किया? यह एक छोटा-सा सवाल है, जो बच्चे के चिंतन को समझने की खिड़की खोल देता है।
- जैसे जब कोई बच्चा 28 + 15 लिखता है और जवाब 313 देता है, तो इसका मतलब है कि उसने 8 + 5 = 13 तो सही किया, लेकिन 13 में हासिल नहीं लिया। यानि उसकी प्रक्रिया आधी ही सही थी। इसे समझे बिना अगर हम उसके जवाब को “गलत” बोल दें, तो हम उसकी वास्तविक चुनौती (या ब्रेक डाउन) को कभी नहीं पहचान पाएंगे। ऐसी स्थिति में उसकी गलतियों की बार-बार पुनरावृत्ति होती रहेगी।‘’
- ‘’गणित विषय में गलतियाँ दुश्मन नहीं हैं — वे एक ऐसा रोडमैप हैं, जो बताती हैं कि किसी बच्चे को वास्तविक सहयोग की जरूरत कहाँ पर है। इसके आधार पर कक्षा-कक्ष के शिक्षण और बच्चों के साथ होने वाले रेमेडियल को ज्यादा योजनाबद्ध और बच्चों की जरूरत के अनुरूप बनाया जा सकता है।‘’
अब मुश्किल यह है कि गणित विषय के शिक्षण का यह व्यापक उद्देश्य तो ठीक है, यही बात राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 में भी कही गई थी। लेकिन एक बड़ी चुनौती यह होती है कि इसे हासिल कैसे किया जाए। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए जो एकमात्र तरीका लेखक बताते हैं, वह यह है कि बच्चे से पूछा जाए कि उसने किसी/अमुक सवाल को कैसे हल किया है।
यह तरीका भी काम का हो सकता है अगर इसे ठीक से किया जाए, और इससे जुड़े आगे व पीछे के सवाल भी पूछे जाएं। यह अकेला सवाल समस्या को समझने के लिहाज़ से नाकाफ़ी है। लेकिन लेखक भी अपने लेख में कहीं भी इस सवाल को भी पूछते हुए नज़र नहीं आते। पूरे लेख में वे ऐसा कोई उदाहरण नहीं देते जिसमें बच्चे से पूछा गया हो कि उसने किसी एक सवाल को कैसे हल किया है। ऊपर जो उदाहरण दिया है उसमें लेखक ने दो अंकों की जोड़ के सवाल को सिर्फ आधा हल करने का, ख़ुद ही तर्काधारित अनुमान लगाया है, जो कि एकदम सही है और उसके बाद वे यह बताने में लग जाते हैं कि बच्चे ने कहां तक सही किया है और कहां से ग़लती शुरू कर दी है। इसमें कोई नई बात नहीं है। जहां तक मैं समझता हूं क़रीब-क़रीब हर शिक्षक इस बात को जानता है कि हासिल का सवाल ठीक से न हल कर पाने वाला बच्चा किस जगह पर व क्या करता है, जो कि उसकी निगाह में ग़लती का दर्जा रखता है।
बच्चों के हलों को ग़लती मानने की ग़लती
रोचक बात यह है कि इस लेख में लेखक बच्चों की ग़लती को ग़लती मानने की आलोचना करते हैं लेकिन लेख के ज़्यादातर हिस्से में खुद भी बच्चों के हलों को ग़लती ही मानते रहते हैं। जिन ग्यारह हलों को उन्होंने इकट्ठा किया है उसका शीर्षक भी उन्होंने ‘’जोड़ में बच्चों की सामान्य ग़लतियां’’ रखा है। उनका तर्क यह है कि बच्चे तो ग़लतियां करते हैं, बस सिर्फ उनके पीछे का कारण जानने की ज़रूरत है, लेकिन है तो वह ग़लती ही।
लेकिन क्या हलों को ग़लती कहना इतनी बड़ी गलती है कि इसी बात को शीर्षक बना दिया जाए। इस बात को समझने के लिए, हम देखते हैं कि आखिर ज़्यादातर गणित की कक्षाओं में क्या होता है? अभी होता यह है कि शिक्षक बच्चों को किसी खास अवधारणा के एक दो सवाल हल करने का तरीका समझाता है। जो इस संदर्भ में हासिल के जोड़ की अवधारणा है। और सिखाने का तरीका मानक गणनविधि से हासिल के जोड़ के सवालों को हल करना सिखाना है, जिसमें सवाल को हल करने के सभी कदमों को एक ख़ास क्रम में उठाना होता है। कोई भी कदम चूकते ही या आगे पीछे करते ही सवाल हल करने वाले को, जमीन सूंघने की नौबत आ जाती है। सही हल मिलने की संभावनाएं ख़त्म हो जाती हैं।
‘मानक गणनविधि का चश्मा’
शिक्षक व शिक्षा तंत्र के पास चश्मा भी एक ही है – मानक गणनविधि वाला। उस चश्मे से देख कर शिक्षक या अवलोकनकर्ता बच्चों के हलों पर ग़लती का ठप्पा लगा देते हैं। सबसे पहले वे घोषणा करते हैं कि उनके हल ग़लत है। वे फिर से बच्चों को गणनविधि के कदम याद दिलाते हैं। दो तीन-बार बताने के बाद भी अगर बच्चा उन कदमों को सही तरीके से न उठा पाए तो उसे कोसने/गरियाने/थपड़ियाने/संटियाने के विकल्प शिक्षक व शिक्षा तंत्र के पास हमेशा मौजूद रहते ही हैं। इन्हें इस्तेमाल करना या न करना शिक्षक पर निर्भर करता है। जैसे ही शिक्षक व शिक्षा तंत्र बच्चों के हलों पर ग़लती का ठप्पा लगा देता है तो इसके साथ ही साथ वे यह भी बिना कहे ही मान लेते हैं कि उन्होंने अब तक जो किया है वह तो एकदम सही है, सारी की सारी ग़लती बच्चे की है। कुछ तो इस ग़लती का जिम्मा उसके माता-पिता व उसके समुदाय पर डालने का मौका भी नहीं चूकते और बहुत जल्द घोषणा कर देते हैं कि ये तो कभी सीख नहीं सकता।
जोड़ में बच्चों की सामान्य ग़लतियां
अब हम लेख के दूसरे प्रमुख हिस्से को देखते हैं जिसमें बच्चों के हलों का संग्रह किया गया है, हर हल में मौजूद समस्या का नामकरण किया है, शिक्षक की निगाह से ग़लत व सही हल दिया गया है और बच्चों को ग़लत हल से सही हल तक पहुंचाने के लिए, शिक्षक के करने के लिए सुझाव दिए गए हैं।
| क्र. | समस्या | शिक्षक करें |
| 1 | जोड़ के निशान को गुणा समझ लेना | रोज चिन्ह पहचान कराएं, जैसे + का अर्थ ‘’जोड़ो’’। |
| 2 | दहाई से जोड़ना शुरू करना | ‘’इकाई से शुरू, फिर दहाई’’ – दायें से बायें। |
| 3 | योग 9 से अधिक – हासिल न करना | 10 इकाई = 1 दहाई। इकाई में केवल एक अंक। |
| 4 | हासिल भूल जाना(इकाई ग़लत) | पूछें – ‘’दस से अधिक है?’’ तो हासिल (1) ऊपर लिखें। |
| 5 | हासिल लिखा पर जोड़ना भूले | जोर से बोलें: ‘’1 हासिल + 2 + 1 = 4’’। |
| 6 | दो संख्याओं को जोड़ने के बाद मिली संख्या नहीं पढ़ पाते | स्थानीय मान कार्ड से अभ्यास। उत्तर पढ़वाएं। |
| 7 | उत्तर के अंक उलट देना | ‘’इकाई यहां, दहाई वहां’’ – कॉलम पर उंगली रखें। |
| 8 | शब्द प्रश्न – जोड़ें या घटाएं? | कीवर्ड – ‘’और मिलकर’’ – जोड़; ‘’बचीं, कम’’ – घटाव। |
| 9 | शब्द प्रश्न को समीकरण में बदलना | चार चरण – मालूम ? पूछा ? चिन्ह ? समीकरण ? |
| 10 | एक अंक को दोनों स्थानों पर जोड़ देना | इकाई व दहाई की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए तीली-बंडल पर काम करें। |
| 11 | घटाव (-) के प्रश्न को जोड़ देना | चिन्ह पर उंगली रख कर बुलवाएं – ‘’जोड़’’/’’घटाव’’ |
मानक गणनविधि के ‘’धोवणे’’ से बच्चों की धुलाई
आप शिक्षक के लिए दिए गए सुझावों को ग़ौर से पढ़ें तो पाएंगे कि उनमें से ज़्यादातर सुझाव मानक गणनविधि के कदमों की नींव मजबूत करने से जुड़े हुए हैं। अगर आपने शिक्षकों को कक्षाओं में काम करते हुए देखा हो तो आप यह भी पाएंगे कि इनमें से ज़्यादातर को शिक्षक पारंपरिक तरीके में इस्तेमाल भी करते हैं। चाहे वो दायें से बायें जोड़ने का काम हो, या जोड़फल में मिली दो अंकीय संख्या में से एक अंक को हासिल बोल कर पास के अंकों के ऊपर ले जाने का काम हो, कीवर्ड बताने का काम हो या उंगली रख कर चिन्हों के नाम रटवाने का काम हो।
इन सभी को बरसों से नियमित तौर पर करने के बावजूद बच्चे शिक्षकों व शिक्षातंत्र के मनचाहे हल के बजाए अपने बहुविध हलों को लेकर शिक्षक के पास आते हैं तो या तो वो मानक गणनविधि के धोवणे से उनकी धुलाई शुरू कर देते हैं या उनकी कॉपी को लाल पेन से लालम-लाल करना शुरू कर देते हैं। असल में इस तरह के सुझावों पर काम करने वाले शिक्षकों व शिक्षा तंत्रों का बहुत गहरे में यह मानना होता है कि किसी संक्रिया को ठीक से इस्तेमाल करना सीखने का एक और सिर्फ एक तरीका है – मानक गणनविधि की मदद से उस संक्रिया के सवालों को हल करना। गणनविधि में महारत हासिल करने के लिए बिना समझे सवालों का अभ्यास किया जाना चाहिए।
किस सवाल के हल!!!!
अगर शिक्षक व शिक्षा तंत्र के पास सिर्फ मानक गणनविधि का ही चश्मा नहीं होता व उन्होंने उसे धोवणे की तरह इस्तेमाल नहीं किया होता और वे खुले दिमाग से बच्चों से बात करते तो बहुत जल्द ही यह समझ पाते कि ये बच्चे उनके दिए गए सवाल को हल नहीं कर रहे हैं, वे तो किन्हीं दूसरे ही सवालों को हल कर रहे हैं। जैसे, जो बच्चा जोड़ के निशान वाले सवाल को पढ़ कर गुणा कर रहा है या हासिल के घटाव के सवाल को पढ़ कर हासिल का जोड़ कर रहा है और दोनों ही एकदम सही कर रहा है, वह तो वहाँ पर जोड़ या घटाव कर ही नहीं रहा है। या जो बच्चे हासिल के जोड़ को करते वक़्त संख्याओं को दोबारा समूहीकरण ठीक से नहीं कर रहे, वे उस सवाल को दो अंकीय जोड़ के सवाल की तरह कर ही नहीं रहे, वे तो उसे एक अंकीय जोड़ के सवाल की तरह कर रहे हैं और उनका वो जोड़ एकदम सही है।
जो बच्चे सवाल का हल करते वक़्त दहाई से जोड़ने की शुरूआत कर रहे हैं वो तो वो काम कर रहे हैं जिसे करवाने का सपना राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 भी देखती है और 2022 भी – स्कूल के बाहर के ज्ञान को स्कूली ज्ञान से जोड़ना। असली जिंदगी में खरीदारी करते वक़्त आम तौर पर हम बड़े नोटों को पहले जोड़ते हैं और छोटे नोटों को बाद में। वही काम बच्चे कक्षा में जोड़ के सवालों को हल करते वक्त कर रहे हैं जब वे पहले दहाइयों को जोड़ रहे हैं। अब चूंकि तंत्र व शिक्षक के पास एक ही धोवणा है तो वो उसे घुमाते हुए इस तरीके पर ग़लती का ठप्पा लगा कर यह रटवाने पर तुल जाते हैं – ‘’इकाई से शुरू, फिर दहाई’’, दायें से बायें।
तो इन 11 हलों पर अपने आंख, कान व दिमाग को खुला रख कर और गहराई से सोचने की ज़रूरत है, ताकि हम बच्चों द्वारा सवालों के इस तरह से किए जाने वाले हलों के कारणों को समझ सकें और हासिल के जोड़ को सिखाने के तरीकों की छानबीन करके बच्चों को हासिल की जोड़ सिखा सकें।
बच्चों के हलों(ग़लतियों) का वर्गीकरण
इस लेख में बच्चों के हलों का ठीक-ठाक ही वर्गीकरण किया गया है। उनके नामकरण पर थोड़ा और विचार किया जा सकता है। जैसे, हासिल न लेना की जगह हम हासिल की समझ न होना कह सकते हैं। हासिल न लेना की शब्दावली हमें मानक गणनविधि के सुझावों की तरफ धकेल सकती है और समझ न होने की शब्दावली हमें समझ बनाने के उपायों को आज़माने की तरफ ले जा सकती है।
एक दूसरे वर्ग – ‘’दहाई की तरफ से जोड़ने की शुरुआत करना’’ में मामला हलों के वर्गीकरण से आगे बढ़ कर, हल के इस तरीके पर ग़लत का ठप्पा लगाने की तरफ बढ़ गया है। हम ऊपर बात कर चुके हैं कि जोड़ के सवाल को दोनों तरफ से हल किया जा सकता है, इसके लिए जोड़ की अवधारणा व संख्याओं की समझ होनी ज़रूरी है।
इस वर्गीकरण का लेख में कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। ग्यारह सवालों पर ग्यारह अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। वर्गीकरण के लेख में इस्तेमाल का एक तरीका यह हो सकता था कि वर्गीकृत किए गए हलों का एक साथ विश्लेषण किया जाता और उन पर काम करने के तरीकों के सुझाव दिए जाते। दरअसल इस पर एक अलग से लेख बन सकता है जो ज्यादा गहराई व व्यापकता के साथ बच्चों के विभिन्न किस्म के हलों पर काम करने के रास्ते सुझाए।
गणित शिक्षण में क्या है ‘सीपीए अप्रोच’ क्या है?
यह तरीका मूलत: रटंत आधारित गणितीय शिक्षण पद्धति के विपरीत समझ आधारित गणितीय शिक्षण पद्धति की पैरवी करता है। इस तरीके पर ज़्यादा गहराई से बात करने की ज़रूरत है। इस हिस्से को पढ़ कर यह लगता है कि यह प्रक्रिया सरल रेखीय है, जबकि हम जानते हैं कि यह प्रक्रिया चक्रीय है।
ठोस चीजों के साथ हुए अवधारणात्मक अनुभवों को चित्रों/दृश्यों में बदलना या उनका दृश्यात्मक निरूपण करना और दृश्यात्मक निरूपण के आधार पर प्रतीकात्मक या प्रतीकों की मदद से उस अवधारणा का निरूपण करना। इसी के साथ प्रतीकों में दर्शाई गई अवधारणा के आधार पर दृश्यात्मक निरूपण करना या उसे ठोस चीजों की मदद से करके दिखाना। इस चक्र के पूरा हुए बिना ठोस चीजों के इस्तेमाल से मिले अनुभव अलग-थलग पड़े रहते हैं। चित्रात्मक निरूपण का ठोस चीजों के अनुभवों से कोई तालमेल नहीं होता और इन दोनों का हमारे दिमाग में बनने वाली अमूर्त समझ से कोई ताल्लुक ठीक से नहीं बन पाता। नतीजे में हमारे दिमाग में उस अवधारणा का खाका ठीक से नहीं बन पाता।
इसी तरह हासिल के जोड़ पर केन्द्रित लेख में इसी अवधारणा पर केन्द्रित उदाहरण लिया जाना चाहिए था। इस हिस्से के साथ जो पोस्टर बना है उसमें ना जो ठोस चीजों के चित्रों में ना ही दृश्यात्मक निरूपण में हासिल के जोड़ की अवधारणा का दृश्य नज़र आता है। उसमें सिर्फ खुली तीलियां व दस का एक बंडल दिया गया है। हम इस पोस्टर को देख कर यह बिल्कुल भी नहीं समझ सकते हैं कि हासिल के जोड़ का तीली बंडल के चित्रों की मदद से उपयुक्त दृश्यात्मक निरूपण कैसे होगा।
शाब्दिक सवालों को हल करना सिखाने में आने वाली चुनौतियां, अलग से एक पूरे लेख का विषय है, इसलिए उस पर यहां कुछ कहना ठीक नहीं है।
शिक्षक की भूमिका – अवलोकन करें, समझें और सटीक सहयोग करें
शिक्षकों की भूमिका में अवलोकन करने, बच्चों के हलों को समझने व उनका सहयोग करने से किसी को इंकार नहीं हो सकता। सहयोग पर सटीक होने का दबाव फिर से हमें मानक गणनविधि के इस्तेमाल की तरफ धकेलता है। जो कि सटीक सहयोग में दिए गए उदाहरण में भी नज़र आता है – जिसमें दहाई की तरफ से जोड़ने के बजाय इकाई की तरफ से जोड़ने का सुझाव दिया गया है।
एक और सुझाव इसमें है जिस पर हमें ठहर कर सोचना चाहिए। कक्षा में कठिन सवालों को चुटकियों में हल करने वाले बच्चों की रणनीतियों को ‘’ब्राइट स्पाट’’ की तरह पूरी कक्षा के सामने रखना। हमारा गणित शिक्षण पहले से ही कक्षा के चंद बच्चों को सिखाने व बाकियों को नजरअंदाज़ करने की नीति पर टिका हुआ है और यह मान्यता भी बहुत आम है कि सभी बच्चे गणित नहीं सीख सकते। नतीजे में शिक्षा तंत्र व शिक्षक कुछ बच्चों को ही सिखा कर ख़ुश हो लेते हैं व ज़्यादातर को गणित से विमुख करके या बाहर धकेल कर ही राहत पा लेते हैं। इसके साथ ही यह भी ज़ाहिर है कि जो बच्चा कठिन सवालों को चुटकियों में हल कर लेता है, कक्षा में सर्चलाइट अक्सर उस पर ही पड़ती रहेगी। बाकी बच्चे अक्सर उससे महरूम ही रहेंगे। नतीजे में उसमें उच्चता बोध व बाकी बच्चों में हीन भावना विकसित होने की पूरी संभावना बनी रहेगी।
उम्मीद है, यह आलेख, ‘’जोड़ के सवाल: ‘गलतियों के पैटर्न’ का प्रभावी शिक्षण में कैसे इस्तेमाल करें?’’ वाले लेख के आलोचनात्मक पठन की शुरुआत करने में मददगार हो पाएगा।
