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शिक्षा विमर्शः हर स्कूल की अपनी कहानी है!

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हर सरकारी स्कूल की अपनी राजनीति, इतिहास, भूगोल और मनोविज्ञान होता है। इसकी जानकारी स्कूल में नियमित रूप से आने के बाद ही होती है। मिशाल के तौर पर एक स्कूल में एक शिक्षिका पढ़ाना चाहती हैं, लेकिन संस्था प्रमुख चाहते हैं कि वे स्कूल की बाकी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाएं, इसके लिए वे बड़ी फुर्ती से स्कूल रजिस्टर में आदेश निकालते हैं।

वहीं इस स्कूल की अन्य शिक्षिका किसी तरह के दबाव से मुक्त रहती हैं। यानी काम करने की इच्छा रखने वाले काम नहीं कर पा रहे हैं, संस्था प्रमुख अपनी नेतृत्व क्षमता का बखूबी प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका एक ही नारा है। भौतिक संसाधन दे दो, शिक्षक दे दो बाकी हम संभाल लेंगे। इसके साथ ही वे स्कूल में आने वालों को अपनी समस्याओं का दुखड़ा बड़े इत्मिनान से सुनाते हैं। कभी-कभी कहते हैं कि मुझे राजनीति में आना है..ताकि बाकी चीज़ों को मैं सुधार सकूं।

शिक्षा से जो काम नहीं हो सका, वह राजनीति से कैसे संभव है? इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं है। हो सकता है कि भविष्य में कभी इस सवाल का जवाब मिले। राजनीति में तो स्कूल की समस्या में नंबर वन प्राथमिकता पर अभी शौचालय है,लंबे समय से एमडीएम था, इस साल से सीसीई नाम का एक नया शब्द जुड़ा है। कुछ समय पहले रीडिंग कैंपेन शब्द जुड़ा था।

अभियानों के बोझ तले सिसकती पढ़ाई को देखकर  लगता है कि शिक्षा के क्षेत्र में शब्दों के उछाले जाने, गढ़ने और बनाने का सिलसिला ऐसी ही जारी रहेगा। तमाम योजनाएं आएंगी और नक्कार खाने में गूंजने वाले आवाज़ की तरह हवा में बिला जाएंगी।

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