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राजस्थानः पहली कक्षा में हिंदी की किताब में क्या बदला?



रिकॉर्ड दो महीनों में पहली से आठवीं तक की किताबों को बदलने की तैयारी पूरी कर ली गयी थी।

20 जुलाई 2015 को राजस्थान सरकार द्वारा सारी पाठ्यपुस्तकों को बदलने का निर्णय लिया गया था।

इसके बाद राजस्थान की पाठ्यपुस्तक समिति ने पहली से आठवीं तक की नई किताबों का फाइनल ड्रॉफ्ट रिकॉर्ड दो महीने में तैयार कर लिया गया था। इतने कम समय में किताबें बदलने का कवायद को लेकर काफी विवाद हुआ था। नई किताबें छप चुकी हैं। इनके स्कूलों में पहुंचने का सिलसिला जारी है।

कुछ जगहों पर किताबें पहुंच गई हैं। कुछ जगहों पर पहुंचने वाली हैं। इसके लिए अलग-अलग स्कूलों के नोडल को किताबें लाने और अपने नोडल में बाँटने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’

नई किताबों को देखने के बाद एक शिक्षक की पहली प्रतिक्रिया यही थी, “नया नौ दिन, पुराना सौ दिन।” उन्होंने कहा कि वैदिक गणित की फिर से वापसी हुई है। देशभक्ति पर काफी जोर दिया जा रहा है। मगर किताबों को कितनी हड़बड़ी में बनाया गया है, यह किताबों पर एक सरसरी निगाह दौड़ाने से समझ में आता है। एक पाठ में मोहल्ले का अर्थ गली बताया गया है। यह बात कोई बच्चा भी बता सकता है कि मोहल्ले में फलां गली कौन सी है? मोहल्ले में गली होती है, मगर गलियों में मोहल्ला खोज के दिखाओ तो कोई बात बनें, वाली बात इस तरह के उदाहरणों में दिखाई देती है।

इन किताबों को सरसरी निगाह से देखने पर जो बातें साफ-साफ समझ में आती हैं, वे इस प्रकार हैंः

ये कैसा गाँव है?

पढ़ाने के पुराने तरीके की वापसी

इसके बारे में शिक्षकों की पहली प्रतिक्रिया थी कि हमने भी इसी तरीके से पढ़ना सीखा था। साल 2000 और इससे पहले छपी किताबों का पैटर्न करीब-करीब एक जैसा है।

अगले पोस्ट में चर्चा शिक्षकों “शिक्षकों से….” वाले कॉलम की। इसे जिस हड़बड़ी में लिखा गया है, उसे समझने की जरूरत है।

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