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सरकारी स्कूल की लाइब्रेरी में नई किताबों के लिए मिलेगा बजट

पठन कौशल का विकास, पढ़ने की आदत, भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति, अर्ली लिट्रेसी

राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की बरखा सीरीज़ की किताबें पढ़ते हुए बच्चे।

राजस्थान सरकार द्वारा प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों लाइब्रेरी की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए एक अच्छी पहल की गई है। इसके तहत राज्य के 66,641 प्रत्येक विद्यालय को पुस्तकालय के लिए 3 हज़ार से लेकर 20 हज़ार रूपये तक का बजट आवंटित किया गया है। प्राथमिक स्तर के स्कूलों के लिए तीन हजार की राशि का प्रावधान किया गया है, उच्च प्राथमिक स्तर के लिए 10 हज़ार, पहली से आठवीं तक के स्कूल के लिए 15 हज़ार और पहली से 12वीं तक के स्कूलों के लिए 20,000 रूपये का बजट आवंटित किया गया।

इससे पूरे प्रदेश में पुस्तकालय की स्थिति को बेहतर बनाने का रास्ता खुलेगा, ऐसी उम्मीद जताई जा रही है। राजस्थान देश के उन राज्यों में शामिल है, जहाँ इस आशय का आदेश जारी किया गया है कि किताबों के इस्तेमाल के दौरान फटने की स्थिति में शिक्षकों से किताबों की राशि नहीं वसूली जायेगी। इस आदेश के कारण बहुत से स्कूलों में आलमारी में बंद किताबों को बच्चों के हाथों तक पहुंचने का रास्ता मिला।

पुस्तकालय को प्रभावशाली बनाने के लिए क्या करना होगा?

यहाँ सबसे ग़ौर करने वाली बात है कि पुस्तकालय को जीवंत बनाना सिर्फ बजट आवंटित करने और किताबें खरीद देना का मुद्दा भर नहीं है। कई सारे सवाल हैं, जो पुस्तकालय के प्रभावशाली इस्तेमाल में दीवार की तरह खड़े हो जाते हैं, क्योंकि पुस्तकालय की किताबों को पाठ्यपुस्तकों के विरोध में देखा जाता है। जहाँ पाठ्यपुस्तकों के बारे में माना जाता है कि उन किताबों के इस्तेमाल से परीक्षा में अच्छे नंबर मिलते हैं, वहीं लाइब्रेरी की किताबों के बारे में माना जाता है कि इन किताबों को पढ़ने से बच्चों का समय खराब होता है और कहानी, कविता व जीवनी या यात्रा वृत्तांत पढ़ने से क्या फ़ायदा है?

लायब्रेरी में अपने साथ के बच्चों को किताबें इश्यू करते छात्र।

राजस्थान में अपने सहपाठियों को किताब इश्यू करती एक सरकारी स्कूल की छात्रा, रूम टू रीड द्वारा संचालित पुस्तकालय।

हालांकि राजस्थान के जिन ज़िलों में पुस्तकालय का प्रभावशाली इस्तेमाल हुआ है, वहां इसकी वज़ह से बच्चों ने पढ़ना सीखा, उनको समझ के साथ पढ़ने की क्षमता हासिल हुई। पूरे स्कूल में लाइब्रेरी वाले कमरे को विद्यालय के सबसे जीवंत कक्ष के रूप में एक नई पहचान मिली।

पुस्तकालय का जीवंत होना शिक्षकों व समुदाय की सोच में तब्दीली या बदलाव की भी माँग करता है, जिसके लिए सतत प्रयास करने होंगे ताकि कुछ ठोस परिणाम हासिल किया जा सके।

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