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मुद्दाः बच्चों को रटने की बजाय समझने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत क्यों है?

primary-school-up-1आज के दौर में पढ़ने की आदत की सबसे ज्यादा जरूरत है। मगर विरोधाभाष यही है कि आजकल हर जरूरी चीज़ से लोगों का ध्यान बटाने के लिए एक ऐसी व्यवस्था निर्मित की जा रही है जो जीवन को आनंद और बेफिक्री के साथ बिताने का जीवन दर्शन गढ़ रही है। उदाहरण के तौर पर जब आर्थिक नीतियों और क़ानूनी संसोधनों का आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर पड़ रहा हो और कोई आपसे कहे कि इनको समझने के लिए क्यों मुफ्त में माथापच्ची कर रहे हैं, तो आपका हैरान होकर सामने वाले को देखना बड़ी स्वाभाविक सी बात हो जाती है।

पढ़ाई के महत्व को रेखांकित करती फिल्मों का दौर

एक दौर था, जब फ़िल्मों में पढ़ाई के महत्व को दवाइयों के इस्तेमाल को समझने से जोड़कर पेश किया जाता था। ताकि लोग समझ सकें कि पढ़ने वाला इंसान ऐसी कई दुर्घटनाओं से बच सकता है, जिनके लिए शिक्षित होना जरूरी है। मगर आज की शिक्षा, साक्षरता के साथ होड़ लेने पर तुली हुई है। हम लोग पढ़ना तो सीख लेते हैं, मगर परीक्षा और पढ़ाई वाले जंजाल से मुक्त होते ही हम पढ़ना छोड़ देते हैं। किसी को पढ़ता हुआ देखते हैं तो पलटकर पूछ लेते हैं कि अरे! क्या पढ़ रहे हो।

आसपास के लोग तो पूछते ही रहते हैं कि अरे! जब किसी नौकरी की तैयारी नहीं कर रहे हो, तब काहें को पढ़ रहे हो। घर में पढ़ने का माहौल न होने के कारण एक समय के बाद ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले लोग भी पढ़ने से कतराने लगते हैं। यहीं से पढ़ाई के नेपथ्य में जाने और व्यावहारिक सच्चाइयों को देखकर हक्का-बक्का होने और अनिर्णय की स्थिति की शुरूआत हो जाती है। पढ़ना और खुद को समय के साथ अपडेट करना हमारी जिम्मेदारी है ताकि हम खुद की राह तलाशने के साथ-साथ भावी पीढ़ी को भी राह दिखा सकें।

आज के ‘रट्टा मार प्रतियोगिता‘ वाले दौर में ऐसी सलाह को मुश्किल ही कोई मानेगा कि विषय के कांसेप्ट को समझने की कोशिश करो। ऐसा कहते ही जवाब मिलेगा, ऐसा करने की कोशिश करेंगे तो पाठ्यक्रम बाकी रह जायेगा। ऐसे में तो कोई प्रतियोगी परीक्षा पास कर ही नहीं पाएंगे। रटने की राह के तलबगार कई हैं, मगर समझने के फायदे क्या हैं, आप पढ़िए इस पोस्ट में।

रटना जरूरी है या समझना, आपकी राय क्या है?

अब मूल सवाल की तरफ लौटते हैं, जो बड़ों की बजाय बच्चों के जीवन से जुड़ा है। आमतौर पर नर्सरी  से ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,  राजस्थान और दिल्ली समेत अन्य राज्यों में बच्चों को रटाने और चीज़ों के नाम याद करवाने की कवायद शुरू हो जाती है।  पहली-दूसरी कक्षा में दाखिले के बाद यह कोशिश एक परंपरा का रूप ले लेती है। जब बच्चे हिंदी में वर्णमाला और अंग्रेजी में A, B, C, D और गणित में 1, 2, 3, 4 को रटना शुरू करते हैं।

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एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

हिंदी वर्णमाला के माध्यम से रटने की त्रासदी को अगर समझने की कोशिश करें तो हमारे सामने कई दृश्य नज़र आते हैं। जैसे बारहखड़ी रटते हुए बच्चे, जो इसे पहाड़े की तरह बड़ी मेहनत से याद करते हैं। फिर किसी अक्षर के साथ लगी हुई मात्रा को देखकर एक क्रम से पढ़कर या गिनकर उस मात्रा लगे शब्दांश को पढ़ने का प्रयास करते हैं। इस कोशिश में बच्चों को काफी थकावट भरी मानसिक प्रक्रिया से गुजरना होता है। इस तरीके से पढ़ने की कोशिश करने वाले बच्चे, हर अक्षर के साथ मात्रा को देखकर बारहखड़ी के सहारे धीरे-धीरे अनुमान लगाते हुए पूरा शब्द पढ़ते हैं।

समझने की ख़ास बात क्या है, आप भी समझ सकते हैं?

वहीं जो बच्चे अक्षरों को पहचानते हैं, मात्रा के लगने से अक्षरों की आवाज़ में होने वाले बदलाव को समझते हैं। उनके लिए यह कोशिश डिकोडिंग वाली कठिनता के विपरीत ज्यादा आसान होती है। वे पहली परिस्थिति वाले बच्चे की तुलना में तेज़ी से अक्षरों को पहचानते हैं, शब्दों को पढ़ते हैं और पूरे वाक्य को पढ़ने व उससे अर्थ निकालने की तरफ बढ़ जाते हैं। अब आपके लिए उपरोक्त दोनों परिस्थितियों में अंतर करना आसान है कि रटने और समझने वाली रणनीति में कौन सी बेहतर है?

स्कूली शिक्षाहर किसी की क्षमता अलग-अलग होती है, ऐसे में हो सकता है कि किसी छात्र को रट्टा मारकर परीक्षा में ज्यादा नंबर मिल जाएं, मगर जब सीखी गई बात को जीवन में व्यावहारिक रूप देने की बात आती है तो रटने वाले पीछे छूट जाते हैं और समझने वाले अर्थपूर्ण तरीके से हिंदी, गणित, अंग्रेजी व सीखने की प्रक्रिया के साथ जुड़ पाते हैं। जो उनके भावी जीवन में उनको जीवन में समस्या समाधान के कौशल का उपयोग करने और अपनी मुश्किलों को आसान बनाने का रास्ता देता है।

इसलिए बच्चों में बचपन से चीज़ों को समझने के लिए प्रोत्साहित करें ताकि बड़े होकर अपने अनुभवों को ज्ञान में परिवर्तित कर सकें।

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