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राजस्थानः पहली से आठवीं तक बदलेंगी किताबें

20 जुलाई को राजस्थान सरकार द्वारा सारी पाठ्यपुस्तकों को बदलने का निर्णय लिया गया था। 20 अगस्त को पाठ्यपुस्तक समिति का गठन किया गया। 24 अगस्त से पाठ्यपुस्तक समिति ने अपना काम शुरू किया। 31 अक्टूबर को किताबों का ड्राफ़्ट जमा करने की आख़िरी तारीख थी। यानी रिकॉर्ड दो महीनों में पहली से आठवीं तक की किताबों को बदलने की तैयारी पूरी कर ली गयी।

किताब पढ़ते बच्चे

राजस्थान में सरकार पहली से आठवीं तक की किताबों को बदलने की तैयारी कर रही है।

राजस्थान की सरकार ने पहली से आठवीं कक्षा तक के पूरे पाठ्यक्रम को बदलने की तैयारी कर ली है। किताबों का फ़ाइनल ड्राफ़्ट रिकॉर्ड दो महीने में पूरा कर लिया गया।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ 31 अक्टूबर को राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (एसआईईआरटी) उदयपुर शिक्षा विभाग को किताबों का अंतिम ड्राफ्ट सौंपने की तैयारी कर ली थी।

क्या है पूरा मामला

पाठ्यपुस्तकों में बदलाव का फ़ैसला 24 अगस्त को लिया गया था। यानी मात्र दो महीने में सारी तैयारी कर ली गई। रिपोर्ट बताती है कि पाठ्यपुस्तकों के ऊपर विचार करते समय एनसीईआरटी के किसी सदस्य को शामिल नहीं किया गया। इसके पहले होने वाले बदलाव में एनसीईआरटी की किताबों को आधार बनाते हुए राजस्थान के स्कूलों के लिए किताब तैयार की गयी थी। इस पैनल में किसी मनोवैज्ञानिक को भी पैनल में शामिल करने की जरूरत नहीं समझी गयी। विशेषज्ञ आनन-फानन में पाठ्यक्रम बदलने की पूरी प्रक्रिया पर हैरानी जता रहे हैं।

बार-बार किताब बदलना कितना सही

बार-बार किताबें लिखने और बदलने की बात सुनकर लगता है कि क्या हो गया है? लगता है शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने के लिए बजट खूब आया है। राजस्थान में अभी तो कुछ साल पहले ही तो बदली थी किताबें। कुछ दिन पहले ही स्कूलों में शिक्षक बता रहे थे कि अंग्रेजी की किताबें तो इतनी कठिन हैं कि बच्चों क्या उसे तो शिक्षक भी न समझ पाएं।

लेकिन हिंदी की किताब को लेकर किसी शिक्षक की तरफ़ से ऐसी शिकायत नहीं सुनने को मिली। एक स्कूल में तो मैंने दूसरी कक्षा के बच्चों को फर्राटे के साथ हिंदी की किताब को पढ़ते हुए देखा था। अभी दलील दी जा रही है कि कुछ पाठों में उर्दू का इस्तेमाल किया गया है, जिसे बच्चे नहीं समझ पाते। ऐसा कहने वाले विशेषज्ञों को कौन समझाए कि सर जी! राजस्थान के बहुत से स्कूलों में तो बच्चे हिंदी भी समझने में दिक्कत महसूस करते हैं।

स्थानीय भाषा को तवज्जो मिलेगी?

ऐसे में तो आपको उनके लिए बागड़ी, मारवाड़ी, गरासिया में भी किताबें लिखनी चाहिए ताकि बच्चे आसानी से किताबों को समझ पाएं। आदिवासी अंचल के बहुत से स्कूलों में तो बच्चों को घर बोली जाने वाली भाषा बोलने तक की इज़ाज़त नहीं होती। उनकी भाषा को स्कूल में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यहां आठवीं कक्षा के बच्चों को ‘मतलब’ का मतलब समझने में दिक्कत आती है।

पाठ्यपुस्तक लेखन, पाठ्यपुस्तक लेखन समिति

एक सरकारी स्कूल में किताबों को धूप दिखाते बच्चे। राजस्थान की सरकार पहली से आठवीं तक की इन किताबों को बदलने जा रही है।

अगर किताबों को बदलने का मुख्य उद्देश्य बच्चों को होनी वाली परेशानी के ऊपर विचार करना और उसे आसान बनाना है तो इस सिलसिले में किस भाषा विशेषज्ञ की राय ली गयी। सरकारी स्कूल के किन-किन शिक्षकों से इस बारे में परामर्श किया गया।

एक बात और सामने आयी कि  इस बार किताब का ड्राफ्ट तैयार करने में निजी स्कूलों के लोग ज्यादा संख्या में शामिल थे। ये सदस्य आदर्श विद्या भारती स्कूलों के थे, इनका संचालन आरएसएस द्वारा किया जाता है।

मध्य प्रदेश और गुजरात की किताबों का संदर्भ इसके लिए लिया गया। यानी इतिहास भी बदलेगा। भूगोल भी। संस्कृति का हवाला देकर कौन से पाठों को हटा दिया जाएगा, इसे लेकर भी कयास लगाये जा रहे हैं। इस संदर्भ में एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया, “राज्य सरकार का इरादा हिंदी पाठ्यक्रम की किताबों से इस्मत चुगताई और सफदर हाशमी जैसे जाने माने उर्दू लेखकों की कहानियों और कविताओं को हटाने का है।”

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