मेरे विचार में भविष्य के शिक्षा-तंत्र में न शिक्षक केंद्र में होना चाहिए, न बच्चा, बल्कि दोनों अपनी-अपनी जगह बराबर महत्व के होंगे। कहें, तो कोई केंद्र नहीं होगा।
हाँ, आज हम बाल-केन्द्रित शिक्षा में जिन बिन्दुओं को छू रहे हैं, उसका महत्व अपनी जगह वैसे ही बरकरार होगा। पर वैसे ही हमें शिक्षकों की ओर भी ध्यान देना होगा। जिस प्रकार बच्चे के सीखने के लिए अनुकूल माहौल की बात होती है, वैसे ही शिक्षक के कार्य के लिए भी एक अनुकूल माहौल की ज़रूरत होती है।
बच्चे और शिक्षक
शिक्षक को भी मनुष्य और उसकी ताकत व कमजोरियों के दायरे में रखकर देखना होगा, जैसा कि बच्चे को देखने की शुरुआत हुई है। शिक्षा की प्रक्रिया में बच्चे और शिक्षक दोनों की बराबर महत्ता है। किसी भी एक को ज़्यादा महत्व देना शायद शैक्षणिक प्रक्रिया के असंतुलन का कारण बनेगी। बच्चे और शिक्षक दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। किसी भी शैक्षणिक प्रक्रिया के दौरान वो एक इकाई हैं। अगर एक की उपेक्षा होगी, तो नुकसान दूसरे का भी होगा। इसलिए शिक्षा में ऐसी दृष्टि की आवश्यकता है, जो बच्चे और शिक्षक दोनों को मनुष्य, उसकी प्रकृति और उसके मनोविज्ञान के संदर्भ में गहराई से देख सके।
बच्चों के लिए तो कम-से-कम वैचारिक और सिद्धांतगत तल पर इसकी शुरुआत हुई है, पर शिक्षक के लिए ऐसी सोच अब तक नहीं बन सकी है। शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों और शिक्षकों (वयस्कों) दोनों की प्रकृति और परिस्थितियों के संदर्भ में व्यावहारिक हो। जिस तरह बच्चे के लिए भय और असुरक्षा की भावना उसके समुचित विकास में बाधक है, वैसे ही शिक्षक के लिए डर, असुरक्षा और तनाव का माहौल उसकी कार्यक्षमता को घटा सकता है।
शिक्षकों की स्वायत्तता है महत्वपूर्ण
बुझे-बुझे, शिकायतों की पेटी बांधे शिक्षकों से खास आशा नहीं की जा सकती है। जैसे बच्चों पर भरोसा करने की बात होती है, शिक्षकों के लिए भी ज़रूरत कुछ अलग नहीं है। जिस प्रकार बच्चों की स्वायत्तता अपना महत्व रखती है, अपने काम में, उसके तरीकों में शिक्षक की स्वायत्तता भी उतने ही महत्व की है। हम उनके ऊपर कई बाध्यताएँ लादकर उनसे सही काम नहीं निकलवा सकते। फिर बस सारा ध्यान औपचारिकताओं को पूरा करने में चला जाता है और काम बस दिखावा बनकर रह जाता है, जिसमें फर्जीवाड़े की भी पूरी गुंजाइश होती है। सीसीई का अभी ऐसा ही हाल है।
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एक अच्छा कार्यस्थल बने स्कूल
तो विकल्प यही बचता है कि प्रशासन शिक्षकों को शिक्षण-कार्य के लिए अनुकूल माहौल मुहैया कराए, स्कूल में हर तरह के संसाधन पूरे हों, अतिरिक्त कामों से उन्हें उन्हें मुक्त रखा जाए। प्रशासन उनपर विश्वास दिखाए, उन्हें अच्छा काम करने के लिए वैचारिक रूप से प्रोत्साहित करे। शिक्षकों के पास बहानों की गुंजाइश कम-से-कम बचे। स्कूल केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी खुशी की जगह बने।
एक खुश शिक्षक के लिए इस बात की संभावना ज़्यादा है कि वह अपनी खुशी बच्चों में बाँटे और इसका जरिया होगा अपनी-अपनी क्षमतानुसार शिक्षण कार्य। खुशी हमें संवेदनशील बनाती है, हमारी दृष्टि और नीयत साफ करती है। बाकी बात रही क्षमता की, तो जैसा हम कहते हैं, उसके लिए निरंतर प्रशिक्षण की ज़रूरत है। जो कि हमारे काम से जुड़ा मसला भी है।
आखिर में
एक बात और- यह सच है कि शिक्षकों ने कालांतर में खुद ही अपने रवैये से समाज में अपना सम्मान खोया है। ठीक भी है, शिक्षक हो जाने से कोई सम्मान का हकदार नहीं हो जाता। सम्मान तो आपके अच्छे व्यवहार और काम से स्वतः मिलेगा। फिर भी अगर मनोवैज्ञानिक रूप से देखें, तो एक विचार मन में आता है कि यदि समाज अपने बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षक को सम्मान देने लगे, तो शिक्षक कैसा भी हो, बच्चों के लिए कुछ करने का भाव उसमें थोड़ा तो जगेगा। जब कोई हमपर भरोसा जताता है, सम्मान की नज़र से देखता है, तो हम उस भरोसे और सम्मान का लिहाज करने लगते हैं और उसे सही साबित करने की कोशिश भी करते हैं, केवल उनकी नज़रों में नहीं बल्कि अपनी भी।
इस पोस्ट के लेखक नितेश वर्मा पूर्व पत्रकार हैं और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत हैं।

