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नो डिटेंशन पॉलिसीः बहस के बिंदु क्या हैं?

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैनो डिटेंशन पॉलिसी के साथ ही स्कूल में बच्चों को न पढ़ाने वाले ‘गुप्त समझौते’ पर भी बात होनी चाहिए। जिसके कारण साल दर साल प्रारंभिक शिक्षा पूरी करके ऐसे बच्चे बाहर निकल रहे हैं, जिनको किताब पढ़ना नहीं आता। जो गणित के सवाल हल नहीं कर सकते। जो अंग्रेजी भाषा को किसी दूसरे ग्रह का समझते हैं।

यह सबकुछ किसी पॉलिसी के कारण नहीं। स्कूल में बच्चों के नियमित आने के बावजूद शिक्षकों का पर्याप्त समय न मिलने के कारण भी हो रहा है।हाँ, स्कूल में शिक्षकों की कमी। कम उम्र के बच्चों का प्रवेश इत्यादि मुद्दे भी इससे जुड़े हुए हैं।

क्या है नो डिटेंशन पॉलिसी

शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया है। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”

बच्चों को शिक्षक का समय मिल रहा है?

शिक्षकों के पास अपने तर्क हैं कि डाक का काम है। तमाम प्रपत्र भरने पड़ रहे हैं। मगर उन्होंने बीएड का प्रशिक्षण और शिक्षक की नौकरी प्रपत्र भरने के लिए तो नहीं की थी। उनका मुख्य काम तो पढ़ाना है। अलग-अलग बहाने बनाकर मुख्य काम से जी चुराने वाली परिस्थिति भविष्य में निजीकरण की बुनियाद रख सकती है। इसकी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

नो डिटेंशन पॉलिसी के शोर में यह मुद्दा गुम है। मगर किसी न किसी दिन इस बात पर भी चर्चा होनी ही है। यह बात ग़ौर करने वाली है कि फेल करके हम बच्चों का नुकसान ही करेंगे। बहुत से बच्चे स्कुल से बाहर हो जायेंगे। पहले ही स्कूल ना जाने वाले बच्चों की संख्या 8.4 करोड़ से ज्यादा है। इसलिए बच्चों को फेल करने से ज्यादा जरुरी है की बच्चों की पढाई को बेहतर बनाने वाले मुद्दे पर ध्यान दिया जाए।

फ़ैसला जो भी हो, बच्चों की राय को महत्व मिले

अगर किसी गाँव में सिंगल टीचर स्कूल हैं तो क्या वहाँ के बच्चों की शैक्षिक स्थिति केवल फेल करने वाली व्यवस्था से सुधर जायेगी। कितने साल फेल करोगे बच्चों को। बच्चों का फेल होना शिक्षक का फेल होना भी है। अंततः एक सरकार की विफलता भी साबित होती है।

आठवीं तक पास-फेल के मुद्दे पर फैसला जो भी हो बच्चों की राय जरुर पूछी जानी चाहिए कि वे फेल होना चाहते हैँ या अगली क्लास में जाना चाहते हैं। वैसे भी शिक्षा का अधिकार बच्चों के लिए है। बड़ों के लिए नहीं है, इसलिए भी बच्चों की राय को बड़ों की तमाम तार्किक बातों से ज्यादा महत्व देना चाहिए।

आखिर में जब तक शिक्षक क्लासरूम में नहीं जाते। बच्चों को नहीं पढ़ाते। हर बच्चे को सीखने का मौका नहीं देते। केवल 4-5 बच्चों पर ध्यान देकर आगे बढ़ जाते हैं। तब तक इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की नो डिटेंशन पॉलिसी है या कोई और पॉलिसी है।

मुश्किलें और भी हैं

शिक्षक अपनी टेंशन को ‘नो डिटेंशन’ से जोड़ रहे हैं। मगर मुश्किलें और भी हैं। आज स्कूलों में फर्जीवाड़ा अपने चरम पर है। काम उम्र में बच्चों का एडमिशन करके उनके बाल अधिकारों का हनन कर रहे हैं। फिर एमडीएम में भरपेट खाना न मिलने की एक माँ की शिकायत भी बहुत कुछ कहती है।

फिर बात करते हैं बच्चों की पढाई की। पहली; दूसरी क्लास में पढ़ाने वाले काम से बहुत से शिक्षक बचना चाहते हैं और बड़ी कक्षाओं को पढ़ाने के लिए पासबुक का सहारा लेते हैं। अगर बच्चे सीख नहीं पा रहे हैं। तो ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने का तरीका बदलने की जगह बच्चों के सीखने पर सवाल खड़ा करते हैं। ऐसे माहौल में बदलाव किए बगैर यथास्थिति कायम रहेगी।

स्कूलों को सच में बाल केंद्रित बनाने और शिक्षकों की जवाबदेही तय करने की जरूरत है। हाँ, उनको काम करने की स्वतंत्रता और जरुरी संसाधन दिए बगैर ऐसी अपेक्षा रखना भी शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले बदलाव की राह में बाधा खड़ी करना ही है।

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