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RTE के पाँच सालः 60 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित

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राजस्थान के एक स्कूल में खेलते बच्चे

भारत में 6 से 14 साल तक बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने के लिए शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 लाया गया। इसे लागू हुए पाँच साल से ज्यादा समय हो गया है लेकिन अफसोस की बात है कि अभी भी 60 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित है।

लोकसभा में होने वाली बहस में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों में प्राथमिक शिक्षा और एमडीएम के बजट में कटौती को गलत ठहराते हुए कहा कि प्राथमिक शिक्षा को सरकार को सर्वोच्च प्राथमिक देनी चाहिए।

कुछ सांसदों ने ग्रामीण स्कूलों का जिक्र करते हुए कहा कि वहां सुविधाओं का घोर अभाव है और शिक्षकों की कमी है ऐसे में बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित रूप से कैसे हो पाएगी?

शिक्षा में समानता एक दिवास्वपन

भारत में शिक्षा में समानता की बात सालों पहले कही गई थी। लेकिन सारी कोशिश शिक्षा की तमाम पर्तें बनाने वाली ही रही। हम अभी प्राथमिक शिक्षा के शैशव काल से गुजर रहे हैं। हम बच्चों के 100 फीसदी नामांकन का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक़ अभी भी 60 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा से महरूम है।

इन 60 लाख बच्चों का भविष्य कैसा होगा? इसके बारे में तमाम कयास लगाए जा सकते हैं। अभी तो हमने स्टूडेंट लर्निंग आउटकम (एसएलओ) या शिक्षा में गुणवत्ता के लिए प्रयास शुरू किया है। ताकि सही आँकड़ें जुटाए जा सकें। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि अगर कोई बच्चा स्कूल आ रहा है तो वह सीख रहा है। सबको समान शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में विशेष उपलब्धि हासिल नहीं हुई है, यह बात भी ग़ौर करने लायक है।

अब बात शिक्षा में गुणवत्ता की

शिक्षा में गुणवत्ता का दूसरा दौर बहुत से आयामों पर फोकस कर रहा है। इसमें बच्चे के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और सृजनात्मक क्षमताओं के विकास पर काफी ध्यान देेने की बात कही जा रही है। ताकि बच्चों को शुरू से कौशल विकास (स्किल डेवेलपमेंट) का अवसर दिया जा सके। अभी बच्चों की बहुमुखी प्रतिभा का आकलन करने की कोशिश हो रही है। ताकि बच्चों के मूल्यांकन का जरिया सिर्फ़ निश्चित अंतराल पर होने वाली परीक्षाएं ही न हों, इस बात की पूरी कोशिश की जा रही है। इससे क्वालिटी एज्यूकेशन का लक्ष्य की दिशा में होने वाले प्रयासों को मदद मिलेगी।

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लेकिन सालों-साल परीक्षा के माहौल में रहने-जीने-सोचने के आदती हो सुके हमारे शिक्षकों, अभिभावकों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को बाहर निकलने में थोड़ा समय लगेगा ताकि बच्चों की पढ़ाई को आनंद से वंचित न किया जाए। उनके बस्ते का बोझ न बढ़े। और बच्चे परीक्षा के तनाव और दबाव से मुक्त हो सकें।

सरकारी स्कूलों के इतर निजी स्कूलों की अलग कहानी है। वहां के शिक्षकों का कहना है कि सीसीई का मतलब मोर एक्टिविटी है और मूल्यांकन के कारण शिक्षकों की व्यस्तता पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गई है।

सीसीई से बढ़ेगा शिक्षा का स्तर

लेकिन सीसीई के विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की कोशिशों से बच्चों के लिखने, पढ़ने, सोचने, आसपास के परिवेश को समझते हुए फ़ैसला करने की क्षमताओं में वृद्धि होगी। उसकी विशेष योग्यताओं और कमज़ोर क्षेत्रों का पता चल सकेगा ताकि उसको सपोर्ट किया जा सके। बच्चों का समूह बनाकर उनमें एक-दूसरे से सीखने (पियर लर्निंग) की प्रवृत्ति का विकास किया जा सकता है तो दीर्घकाल में उनके लिए काफी उपयोगी सिद्ध होगी।

सीसीई के बारे में अलग-अलग राय

इसके विपरीत परीक्षाओं के कारण छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना का विकास होता है। वहां एक-दूसरे को मदद न करने की हिदायत दी जाती है। एक-दूसरे से आगे निकलने का दबाव घर वालों की तरफ़ से बनाया जाता है। स्कूलों में एडमीशन का आधार भी इन्हीं नंबरों को बनाया जाता है। ऐसे में यह सवाल बना रहता है कि इस दोहरी दुविधा से बच्चे और अभिभावक कैसे बाहर निकलेंगे?

कुछ अभिभावकों का कहना है कि सीसीई के कारण 10वीं में बच्चों के परीक्षा परिणाम काफी बेहतर आए, इसके कारण उन्होंने 11वीं-12वीं में बहुत ज़्यादा मेहनत नहीं करी, इसके कारण उनके परिणाम खराब हो जाए। यानी उनका कहना है कि सीसीई बच्चों को लापरवाह बना रहा है।

सीसीई को यूनिसेफ का सपोर्ट

तो वहीं विशेषज्ञों का दावा है कि यह बच्चों को सिखी रहा है। शिक्षक कहते हैं कि उनको व्यस्त बना रहा है। इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ ने भरोसा जताया है और इस कार्यक्रम को राजस्थान के सभी ज़िलों में लागू करने की रूपरेखा बनाई जा रहा है।

सतत और व्यापक मूल्यांकन से शिक्षा के स्तर को बढ़ाने में कैसे मदद मिलेगी? इस सवाल का जवाब पाने के लिए अगले सत्र तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में कोई भी बदलाव अल्पकालिक न होकर दीर्घकालिक होता है। इसलिए थोड़ा समय तो लगेगा और इंतज़ार के लिए धैर्य का परिचय देना होगा।

बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन

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भारत में बालिका शिक्षा के प्रोत्साहन पर जोर दिया जा रहा है

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए चुनिंदा ज़िलों की एसएमसी को पाँच लाख रूपए तक का पुरस्कार देने वाली योजना का जिक्र किया, अगर उस क्षेत्र की बालिकाओं का नामांकन प्राथमिक, उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर में निरंतर बना रहता है और ग्रेज्यूएशन में उनके नामांकन का प्रतिशत बढ़ता है।

इससे पता चलता है कि स्कूलों के सफल संचालन में एसएमसी की भूमिका को सरकार काफी महत्व दे रही है। इसकी भूमिका को शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 में भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्होंने बजट में कटौती के बारे में कहा कि राज्य सरकारों द्वारा आवंटित बजट का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है, इसलिए यह कटौती की गई है।

प्राथमिक शिक्षा के बजट में कटौती

साल 2015-16 के आम बजट में सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के बजट में 22 फीसदी की कटौती की गई। वहीं एमडीएम में 16 प्रतिशत की कटौती हुई तो राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा आयोग के बजट में 28 फीसदी की बड़ी कटौती हुई। इसकी कटौती पर विपक्ष की आपत्ति की जवाब देते हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकासमंत्री ने बजट का पूरा इस्तेमाल न होने की बात कही थी। यहां पर सवाल यह है कि आखिर राज्य सरकारें शिक्षा के मद में आवंटित बजट का इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाती हैं इसकी ग्राउंड स्टोरी जानने की जरूरत है।

एक स्कूल की कहानी संक्षेप में साझा की जा सकती है। एक गाँव के सबसे पुराने स्कूल को कमरे और ऑफिस बनाने के लिए बजट आवंटित किया गया। लेकिन उस स्कूल के प्रधानाध्यापक द्वारा इसका इस्तेमाल नहीं किया गया। वह पैसा खाते में ज्यों का त्यों पड़ा रहा। इस बारे में एक अन्य स्कूल के शिक्षक ने बताया कि उनकी रिटायरमेंट की उम्र काफी नजदीक है और वे कोई सर दर्द नहीं लेना चाहते।

जबकि प्रधनाध्यापक का खुद कहना था कि इस काम में इतना भ्रष्टाचार है कि हाथ डालने की इच्छा नहीं होती। हर किसी को कमीशन चाहिए। कोई आरोप लगे। इससे बेहतर कि अपनी सेवा से अच्छी तरह से बेदाग विदाई ली जाए। यानी गाँव के स्तर पर इस तरह की तमाम छोटी-छोटी कहानियां हैं जो बड़े स्तर पर एक समस्या के रूप में नज़र आती हैं। वहीं कुछ स्कूलों में बाउंड्री वाल के लिए बजट आया, लेकिन पड़ोस के लोग ज़मीन देने को तैयार नहीं हैं। इसलिए चाहते हुए भी कोई काम नहीं हो पा रहा है।

निष्कर्ष

आख़िर में कह सकते हैं कि भारत में प्राथमिक शिक्षा अभी अपने शैशव काल से गुजर रही है। नामांकन के लक्ष्य के करीब पहुंचने के बाद अब शिक्षा में गुणवत्ता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन साथ ही यह ध्यान रखना है कि 60 लाख बच्चों को अभी भी स्कूलों में लाना है। जो स्कूल आ रहे हैं, उनकी पढ़ाई सुनिश्चित करनी है। उनको आगे भी स्कूल आने के लिए प्रेरित करना है। ताकि वे बीच में ड्राप आउट न हों। उनकी निरंतरता बनी रहे और गुणवत्ता की दिशा में होने वाले प्रयास भी निरंतर जारी रहें।

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