विश्व विजया सिंह मैम ने लखनऊ के आईटी कॉलेज से पढ़ाई की है और विद्या भवन सोसायटी के जूनियर स्कूल की पूर्व प्रधानाध्यापिका हैं।
विश्व विजया सिंह मैम विद्या भवन सोसायटी के जूनियर स्कूल की पूर्व प्रधानाध्यापिका रह चुकी हैं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में प्रकाशित होने वाली विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखने और संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया है। यह आलेख उनके प्रयोगों पर आधारित है।
वे लिखती हैं कि विद्यार्थी स्वयं पढ़ने में रूचि लें और पाठ्यपुस्तकों के अलावा अन्य पुस्तकें भी ज्यादा से ज्यादा पढ़ें, ऐसा करना उनके लिए कई दृष्टियों से उपयोगी होता है।
आजीवन काम आती है पढ़ने की आदत
पढ़ने से सामान्य ज्ञान में वृद्धि के साथ-साथ छात्र-छात्राओं का शब्द भण्डार बढ़ता है, उनकी लेखन क्षमता का विकास होता है और एक ऐसी बनती है जो जीवन पर्यन्त उनके लिए लाभप्रद होती है।
कक्षा तीन और पाँच के लिए समय सारिणी में पुस्तकालय के लिए कोई भी कालांश निर्धारित नहीं था। इसके लिए स्टाफ मीटिंग में निर्णय लेकर हम लोगों ने समय चक्र (टाइम टेबल) में सप्ताह में एक कालांश बढ़ा दिया जिसे शनिवार को आयोजित किया जाता था।
धीरे-धीरे बढ़ने लगी किताबों में रूचि
पुस्तकालय कालांश में एक कक्षा के सभी बच्चे पुस्तकालय जाने लगे। आलमारियां खुली होतीं, बच्चे किताबों को देखते और अपनी मर्जी से एक पुस्तक इश्यू करवाते। अध्यापिका एक बच्चे द्वारा ली गई पुस्तक का नाम, बच्चे का नाम आदि लिखतीं, उस दौरान बाकी बच्चे बैठकर पत्रिकाएं पढ़ते।
पुस्तकालय के संदर्भ में एक लायब्रेरी एजुकेटर का विज़न, जो ग़ौर करने लायक है।
अब आवश्यकता महसूस हुई कि बाल पत्रिकाओं की संख्या बढ़ाई जाए। इनकी संख्या कम से कम 30-35 हो जिससे प्रत्येक बच्चे को एक समय में एक पत्रिका मिल सके। पत्रिकाओं के अतिरिक्त चित्रकथाएं भी रखी गईं जिनको पढ़ने में बच्चे विशेष रुचि लेते। बच्चों को एक सप्ताह के लिए एक किताब इश्यू होती। पत्रिकाएं और चित्र कथाएं इश्यू नहीं की जाती थीं, उन्हें वहीं बैठकर पढ़ना होता था।
कैसे हुई कक्षा पुस्तकालय की व्यवस्था?
इसके अगले चरण में कक्षा पुस्तकालय की व्यवस्था की गई। प्रत्येक कक्षा-कक्ष में एक डेस्क का इस्तेमाल इसके लिए किया गया। 40-50 पत्रिकाएं (जिनमें पुराने अंक भी शामिल थे) व चित्र कथाएं रखी गई।
प्रत्येक कक्षा में एक बच्चे को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह खाली समय में बच्चों को पत्रिकाएं व चित्र कथाएं बाँट दे और अगले कालांश की घंटी बजने पर सब बच्चे अपने आप आकर पत्रिताएं व चित्र कथाएं जमा कराएं जिससे यह काम जल्दी हो जाए। प्रत्येक कक्षा के लीडर को एक ताला भी दिलवाया गया।
धीरे-धीरे बच्चों की रूचि बढ़ने लगी। कोई 2-4 बच्चे, पढ़ने में रूचि ने लेकर शरारत करते तो बाकी बच्चों को नागवार गुज़रता। जल्दी ही ऐसी स्थिति भी आई कि लीडर के अनुपस्थित रहने पर बच्चे प्रधानाध्यापिका के पास पहुंच गए कि आज हमें पत्रिकाएं नहीं मिल पाई। स्टाफ से चर्चा करके इस समस्या का हल ऐसे निकाला गया कि एक के बजाय दो लीडर बना दिये गए और ताले की दूसरी चाबी उसके पास रहती जिससे इस व्यवस्था में व्यवधान न आए।
क्या आप भी अपने विद्यालय में पुस्तकालय को सक्रिय बनाना चाहते हैं?
विश्व विजया सिंह मैम की यह कहानी वास्तव में शिक्षक साथियों को प्रेरित करने वाली है। इस वास्तविक कहानी का मर्म यही है कि अगर हम बच्चों के शैक्षिक और सर्वांगीण विकास की परवाह करते हैं तो समस्याओं के समाधान बनते देर नहीं लगती। स्टाफ के साथ होने वाली मीटिंग और परिचर्चा नई-नई समस्याओं के समाधान की राह देती है।
ताकि शिक्षक साथियों, विभिन्न ज़िलों की डाइट में काम करने वाले शिक्षक प्रशिक्षकों और राज्य व राष्ट्रीय स्तर शैक्षिक प्रशासन के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों तक भी संदेश पहुंचे कि ज़मीनी स्तर के अनुभवों को बदलने में इस तरह के लेखन का क्या योगदान हो सकता है। आपके विचारों और सुझावों का इंतज़ार है।
