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‘बुक टॉक’ की शुरुआत क्यों हुई?


बुक टॉक क्या है? इस सवाल का एक जवाब जो हमें गूगल सर्च से मिलता है, “व्यापक अर्थ में बुक टॉक किसी पाठक या रीडर द्वारा पढ़ी गई किताब के बारे में बताई जाने वाली वह ख़ास बात है जो किसी को वह किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करने के इरादे से कही जाती है।

पारंपरिक तौर पर बुक टॉक का इस्तेमाल क्लासरूम में स्टूडेंट्स के साथ किया जाता है। हालांकि बुक टॉक का प्रदर्शन या उपयोग एक स्कूली माहौल के बाहर भी किया जा सकता है। क्लासरूम के भीतर बुक टॉक के हमको बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। जहाँ पर शिक्षक बच्चों को किसी स्टोरी बुक या किसी कविता की किताब या फिर किसी रिफरेंस बुक के बारे में संक्षेप में बताते हैं ताकि बच्चे उस किताब को खुद से ढूंढने और पढ़ने की दिशा में खुद आगे बढ़ें।

‘बुक टॉक’ शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल कब हुआ?

उदाहरण के तौर पर 2019 के चुनावों पर होने वाली एक चर्चा में ‘द हिन्दू’ के फोरम पर चुनाव विश्लेषक और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योगेन्द्र यादवों ने पाठकों को एक बुक का मुख्य पृष्ठ दिखाते हुए कहा कि अगर आप 2019 के चुनाव में प्रमुख मुद्दे क्या हैं, इस बात को समझना चाहते हैं तो जस्टिस शाह की अध्यक्षता वाली कमेटी में बनी एक बुकलेट पढ़ सकते हैं जिसका नाम है, “रिक्लेमिंग द रिपल्बिलक…..” यह क्लासरूम के बाहर बुक टॉक जैसी गतिविधि का एक छोटा सा उदाहरण है। किताबों के ऊपर केंद्रित फेस टू फेस होने वाले संवाद को ऐसी श्रेणी में रखा जा सकता है, जहाँ पर किसी किताब की चर्चा उसे पाठकों तक पहुंचाने और उसके बारे में एक रुचि जागृत करने के मकसद से की जाती है।

‘बुक टॉक’ शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल वर्ष 1985 में बाल साहित्यकार और साहित्य के शिक्षक रहे ऐडन चैंम्बर्स (Aidan Chambers) ने किया। उन्होंने अपनी एक किताब को यही शीर्षक दिया ‘Book Talk: Occasional writing on Literature and Children. वर्ष 1950 में ‘बुक टॉक’ का इस्तेमाल युवा पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने हेतु किया जाता था क्योंकि उनको पढ़ने की स्वतंत्रता तो थी, लेकिन उनका रूझान पढ़ने की तरफ नहीं था।

बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए बुक टॉक की व्यवस्थित ढंग से शुरूआत एक रणनीति के रूप में इस चुनौती का समाधान करने के लिए किया। यह गतिविधि भारत में भी लोकप्रिय हो रही है।

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