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लोकसभा चुनावः शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च होने की बात पर हो रही है चर्चा

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2019 के लोकसभा चुनाव शुरू होने में 3 दिन शेष हैं। 11 अप्रैल को पहले चरण में मतदान होगा। शिक्षा के मुद्दे की चर्चा कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र के साथ शुरू हुई। इसमें वादा किया गया कि शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च किया जायेगा। इस आशय का सुझाव कोठारी आयोग से समय से ही दिया जा रहा है, जिसे बार-बार दोहराया भी गया है। समाजवादी पार्टी ने भी शिक्षा पर 6 प्रतिशत व्यय करने को अपने घोषणापत्र का हिस्सा बनाया है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा इस तरह की किसी सीमा को अपने घोषणापत्र का हिस्सा नहीं बनाया गया है। हाल ही में जारी घोषणापत्र में उच्च शिक्षा के लिए होने वाले खर्च को बढ़ाने की बात कही गई है। सबसे ख़ास बात है कि प्राथमिक शिक्षा पर कितना खर्च किया जाएगा और इसे बेहतर बनाने के लिए क्या किया जाएगा? यह बात विभिन्न घोषणापत्रों से ग़ायब है।

लोकसभा चुनाव में शिक्षा का मुद्दा

राहुल गांधी ने तेलंगाना में शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने का वादा दोहराया। इससे शिक्षा का बजट लगभग दोगुना हो जाएगा। उन्होंने कहा, “अगर यूपीए सरकार आती है तो जीडीपी का 6 प्रतिशत पैसा शिक्षा में लगाया जाएगा. नए कॉलेज, नए इंस्टीट्यूट, नई यूनिवर्सिटीज बनाई जाएंगी।”

इसी संदर्भ में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, “हमारी प्राथमिकता है कि शिक्षा को जीडीपी का छह प्रतिशत आवंटित हो। साल 2014 में केंद्र और राज्य सरकारों का कुल खर्च जीडीपी का 3.8 फीसदी था। यह अब बढ़कर 4.6 फीसदी हो गया है। यह दिखाता है कि हम 6 फीसदी की ओर बढ़ रहे हैं।” हालांकि ऐसा कोई वादा भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में नहीं किया गया है। यह बयान इस बात को दर्शाता है कि शिक्षा पर होने वाला खर्च इन चुनावों में चर्चा के माध्यम से ही शामिल हो रहा है।

शिक्षा पर होने वाले सबसे ज्यादा व्यय के सिलसिले में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार अपने कार्यकाल के दौरान सुर्खियों में रही है। वहां शिक्षा पर होने वाले व्यय को काफी प्राथमिकता के साथ शामिल किया गया है। वर्तमान में दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षा पर लगभग 25 प्रतिशत व्यय किया जा रहा है। इस संदर्भ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, “दिल्ली सरकार के लिए साल 2018- 19 में शिक्षा का बजट 13997 करोड़ है जो कुल बजट का 26 % है.। पिछले साल शिक्षा बजट कुल बजट का 23% था।”

जीडीपी का कितना प्रतिशत खर्च होना चाहिए?

शिक्षा पर जीडीपी (यानि सकल घरेलू उत्पाद) का कितना प्रतिशत खर्च होना चाहिए? इस सवाल का जवाब देते हुए मनोज कुमार लिखते हैं, “बहुत पहले 1966 में कोठारी कमीशन ने कम से कम जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करने की अनुशंसा की थी। अबतक किसी सरकार ने इसे पूरा नहीं किया| इस बार कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने पहली बार 6% खर्च करने का वादा किया। 6% न्यूनतम है जिसे कोठारी कमीशन ने कैलकुलेट किया। इससे अधिक हो सकता है, लेकिन इससे कम में सारे वाडे घरे के धरे रह जाएँगे या जैसे-तैसे पूरे होंगे। इस समय जीडीपी का कितना प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होता है? केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर लगभग 3.5% तक खर्च करती है।”

क्या इस 3.5% में टीचर्स को दी जाने वाली तनख्वाह भी शामिल होती है? या मात्र शैक्षिक कार्यों पर किया जाने वाला खर्च ही? इन सवालों के जवाब में मनोज कुमार कहते हैं, “यह कुल खर्च है इसलिए वेतन भत्ते भी शामिल हैं। यह tentative figure है। किसी साल और किसी राज्य के लिए यह 3.4 या 3.6 हो सकता है।”

भाजपा के घोषणापत्र में शिक्षा की प्राथमिकता पर एक विश्लेषण

भाजपा के घोषणा पत्र में माध्यमिक स्कूलों में ‘डिजिटल बोर्ड’ की व्यवस्था करने की बात कही गई है। जबकि इन विद्यालयों की सबसे बड़ी समस्या विषयवार शिक्षकों का अभाव और निजी विद्यालयों पर अभिभावकों की निर्भरता है। इसके कारण अभिभावकों को बच्चों की स्कूल फीस के साथ-साथ ट्युशन फीस का भी बोझ उठाना पड़ता है। उच्च शिक्षा में 1 लाख करोड़ आधारभूत संरचना के लिए देने की बात कही गई है, लेकिन इस घोषणापत्र में प्राथमिक शिक्षा के लिए क्या नीति है और कितना खर्च किया जायेगा, इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा गया है।

भारत में लोन मुक्त शिक्षा की बात होनी चाहिए

इसके अलावा प्रबंधन, विधि व इंजीनियरिंग में सीटों की संख्या बढ़ाने की बात कही गई है। यह अवसर बढ़ाने की दिशा में अच्छा कदम कहा जा सकता है, लेकिन असली समस्या भारी फीस और लोन लेकर पढ़ाई करने का दबाव है। उच्च शिक्षा को लोन मुक्त बनाने के सपने को साकार करने की जरूरत है, यानि उच्च शिक्षा के आकांक्षी युवाओं के लिए यह घोषणापत्र महज एक आकर्षण है, जबकि वास्तव में उसके रोज़मर्रा के संघर्ष के समाधान का कोई स्पष्ट रोडमैप इस घोषणापत्र में नहीं है। अटल टिंकरिंग लैब हर ब्लॉक में स्थापित करने की योजना तो ठीक है। लेकिन जब 6 से 14 साल तक के बच्चों को मु्फ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार मिला हुआ है तो फिर 6 से 8वीं तक विज्ञान शिक्षा में आमूल बदलाव की योजना क्यों नहीं रखी गई है।

विज्ञान शिक्षण के लिए सभी उच्च प्राथमिक विद्यालयों में लैब की व्यवस्था करने। विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए लाइब्रेरी में विज्ञान से जुड़े साहित्य को शामिल करने का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन यह घोषणापत्र उस विज़न के अभाव को दर्शाता है जो भारत के भविष्य की राह है और वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत।

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