डिजिटल माध्यमों के कारण किसी सामग्री को सरसरी निगाह से देखने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। इसके कारण पढ़ने वाले को बहुत सटीक-सटीक पता नहीं होता है कि क्या पढ़ा है। प्रिंट जैसा भरोसा इस माध्यम में नहीं है। त्वरित प्रतिक्रिया वाला दौरा भी आया है, डिजिटल कंटेट का विस्तार होने के कारण। हर विचार पर प्रतिक्रिया आने लगी है। विचार को पकने का जो समय मिलता था और एक पाठक किसी किताब से पढ़ते समय जो ठहरने, सोचने का स्पेश पाता था, वह खत्म हो गया है। पढ़ने वालों का रिस्पांस तेज़ी से मिल जाता है।
उदाहरण के तौर पर ट्वीट आया नहीं कि लोगों की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, सब तरह की टिप्पणी व प्रतिक्रिया आने लगती है। कोई रोक-टोक नहीं है। यह ठीक है एक तरीके से लेकिन जिन लोगों के पास इस तकनीक की पहुंच नहीं है, उनकी आवाज़ दब जाती है। उनके विचार इस चर्चा में शामिल नहीं होते और उनको प्रमुखता मिलती है। एक आम नागरिक कमज़ोर हो रहा है लोकतंत्र में। यह बात भी कही जा सकती है।

