मैंने साथी शिक्षकों को गणित शिक्षण की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए या तो अंको का सहारा लेते देखा है या फिर यह कहते हुए सुना है कि आपको हायर एजुकेशन में मदद करेगा। मुझे हमेशा से ही दोनों तर्क हजम नहीं होते। अंको के लिए पढ़ना तो पढ़ना नहीं होता और अगर गणित हायर एजुकेशन में मददगार है तो अधिकतर छात्र इस विषय को डर के कारण हायर एजुकेशन में लेना ही पसंद नहीं करते। तो कब तक हम नन्हे नन्हे छात्रों को बहलाते रहेंगे।
गणित विषय में बच्चों की रूचि का सवाल
गणित पढ़ने की वजह ढूंढने का मुख्य कारण होता है कि इस विषय में छात्रों की रुचि ना बन पाना तभी वे इस विषय को बोझ समझते हैं और उन्हें इस विषय की सार्थकता भी दैनिक जीवन में नहीं प्रतीत होती। वैसे तो गणित जन्म से मरण तक हम सब के साथ रहता है परंतु जब गणित शिक्षण की बात करें तो यह दैनिक जीवन में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाता ?
गणित शिक्षण को अरुचिकर बनाने में इन सभी कारणों के साथ एक और बहुत बड़ा कारण है जो इस समाज को घुन की तरह खाए जा रहा है वह है- ट्यूशन इंडस्ट्री। बहुत सारे अभिभावकों को उनके बच्चों के गणित में कम अंक आने पर यह कहते हुए सुना है , “मैडम जी बच्चे की ट्यूशन भी लगा रखी है फिर भी नंबर नहीं लाता। इसका दिमाग ही नहीं चलता। मैं दिन भर मेहनत करके 300 या ₹400 ही कमा पाता हूं और उसमें से इसकी ट्यूशन की फीस भी देता हूं और बाकी घर खर्च भी चलाना होता है।”
बस इतना कहते-कहते उनकी आंखें भर जाती है। जब उनकी बेबसी सुनती हूं तो यह सोचने पर और भी मजबूर हो जाती हूं कि क्यों गणित को इतना मुश्किल बना दिया गया है? क्यों गणित में सफलता केवल अंकों से ही मापी जाती है? क्यों गणित छात्रों के मन में अपनी जगह नहीं बना पा रहा? क्या पेपर में प्राप्त अंक विश्वसनीय भी है या नहीं? और इससे अधिक दुख तब होता है जब गणित में छात्रों के अंक कम आने पर ट्यूशन माफिया और भी तेजी से काम करने लगते हैं। इसका डर दिखाकर वे अभिभावकों को ट्युशन के घंटे बढ़ाने और बच्चों के ध्यान न देने की बात कहकर उनके खेलने के समय पर भी कैंची चलाते हैं।
महत्वपूर्ण क्या है : विषय की समझ या अंक?
इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यहां यह उठता है कि क्या ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षक तथा विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक अलग अलग हैं या फिर वही हैं? अगर अलग – अलग हैं तो यह शिक्षक केवल अंकों के लिए ही क्यों काम कर रहे हैं ? क्यों नहीं गणित में रुचि उत्पन्न करवा पा रहे हैं और यदि वही हैं तो स्कूल में ही क्यों नहीं बच्चों के साथ उनकी जरूरत के अनुसार काम किया जाता? क्या ये ट्यूशन शिक्षक पर्याप्त प्रोफेशनल क्वालीफिकेशन लिए हुए हैं? क्या ये शिक्षक दिन-प्रतिदिन बच्चों की रुचि के अनुसार अपने पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों में नवाचार लाने की क्षमता रखते हैं?
अंक और समझ के रिश्ते की गहराई को समझना होगा ? क्या विषय की समझ बनाए बिना अंक लाना संभव है अंक समझ के साथ आते हैं या अंक प्राप्त करने के लिए समझ कम हो या ज्यादा हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता? हम अपने बच्चों को गणित में अंक लाने के लिए क्या केवल अंक दिलाने वाली मशीन के पास मशीनीकरण के लिए भेजते हैं या गणित समझाने वाले अध्यापक के पास गणिती करण के लिए? इन प्रश्नों पर विचार करना आज की जरूरत है।
विषय से दूरी का वास्तविक कारण है ‘गलती हो जाने का डर’
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार गणित शिक्षण का मुख्य उद्देश्य छात्रों का गणिती करण करना है। ज्यादातर छात्र जिन्हें गणित से डर लगता है या उसे बोझिल मानते हैं उनसे मैं बात करके उनके पहलू को समझने की कोशिश की है। बच्चों से बातचीत में यह पाया गया कि उनके मन में गलती हो जाने का डर अर्थात उत्तर गलत आने का डर घर कर गया है। विद्यालय में शिक्षक के पढ़ाने के बाद और फिर घर में किसी और शिक्षक की मदद वास्तव में उस छात्र को कंफ्यूज कर देती है। उसे लगता है कि गणित के प्रश्नों का हल मात्र कुछ प्रक्रियाएं हैं जिन्हें याद करना पड़ेगा।
इसी डर से बच्चा उस विषय से दूर हो जाता है और यह दूरी उस विषय से डर में कब बदल जाती है पता ही नहीं चलता। गणित शिक्षक के तौर पर मेरा आज सभी अभिभावकों से यह प्रश्न है: क्यों हम सब अपने बच्चों के ऊपर केवल शत प्रतिशत अंकों का दबाव बनाते हैं? क्यों नहीं विषय पर बात करते ? क्यों अंक कम आने पर उस छात्र को नालायक समझ लिया जाता है?
रोहन की कहानी (बदला हुआ नाम)
मैंने धैर्य पूर्वक उसकी बात सुनी। इसके बाद बिना प्रतिक्रिया दिए उससे पूछा, “ चलो सोचते हैं कि आप अपने पिताजी के साथ बाइक पर जा रहे हो! आप के पिताजी एक पेट्रोल पंप पर बाइक में पेट्रोल डलवाने के लिए रुकते हैं। पेट्रोल की कीमत ₹72 प्रति लीटर हो तो आप ₹200 में कितने लीटर पेट्रोल डलवा सकते हो?
छात्र एकदम सोचने लगा और इससे पहले वह कुछ बोलता मैंने कहा, “ अच्छा एक शर्त और भी है कि पेट्रोल केवल लीटर में ही डलवाना है। रोहन ने सोचा और तुरंत बोला , “हम 2 लीटर ही पेट्रोल डलवा पाएंगे ज्यादा से ज्यादा। मेरे चेहरे पर खुशी की चमक आई और मैंने उससे कहा, “अच्छा तो यह बताओ कि 3 लीटर क्यों नहीं डलवा सकते ?” तो वह तुरंत बोला , “अरे मैडम जी! कैसी बात करती हो? 3 लीटर कैसे हो सकता है? 3 लीटर तो ₹200 से ज्यादा हो जाएगा।
मैंने रोहन से कहा, ‘आप तो गणित में अच्छा कर सकते हो’
मैंने ना समझ आने का नाटक किया और कहा, “मुझे नहीं लगता कि तुम ठीक हो! मुझे लगता है कि ₹200 के अंदर 3 लीटर पेट्रोल आ सकता है। तो रोहन बोला , “नहीं मैडम जी अगर आप 70 को को तीन बार जोड़ेंगे तो ₹210 आएगा और दो को तीन बार जोड़ेंगे तो ₹6 आएगा। इस तरह कुल मिलाकर हो गया ₹216 और यह ₹200 से अधिक है! इसलिए ₹200 में 3 लीटर पेट्रोल नहीं आ सकता।”
रोहन ने बताया, “ घर में मम्मी पापा भी कहते हैं। ट्यूशन वाले सर जी ने मम्मी पापा को बताया कि मेरा दिमाग गणित में नहीं चलता। मेरे दिमाग में तो गणित घुसेगा ही नहीं। अब वह मुझे एक घंटा ट्यूशन की जगह दो घंटे पढ़ने की सलाह दे रहे हैं। परंतु मेरे पिताजी दो घंटे की फीस नहीं दे पाएंगे।”
रोहन की बात सुनकर मैं बहुत भावुक हो गई और उससे कहा कि आपको ट्यूशन पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। आप ट्यूशन छोड़ दीजिए आप बहुत अच्छा गणित कर सकते हो। अपने ऊपर भरोसा रखो और अपने शिक्षक के ऊपर भरोसा रखो। यदि आपको कुछ समझ में नहीं आता तो आप अपने शिक्षक से संपर्क कीजिए फिर भी आपकी यदि कोई शंका है तो आप विद्यालय में उपस्थित किसी भी गणित शिक्षक की मदद ले सकते हैं और मेरे पास भी आ सकते हैं।
‘गणित क्लब’ और विद्यालय को ट्युशन फ्री बनाने का लक्ष्य
रोहन की बात सुनकर मैंने फैसला लिया कि अब रोहन जैसे बहुत से छात्रों को जिन्हें विद्यालय के अतिरिक्त भी गणित में मदद की आवश्यकता है, शाम के समय तथा अवकाश वाले दिन सहायता करूंगी और वह भी निशुल्क। मेरे साथ मेरे दो साथी और भी इस मिशन में जुड़ गए। हमने मिलकर एक ‘गणित क्लब’ बनाया जिसमें छात्रों को खेल-खेल में गणित कराया जाने लगा> गणित क्लब में धीरे-धीरे बाकी छात्र-छात्राएं भी जुड़ने लगे और पता ही नही चला कब एक वर्ष बीत गया।
छात्रों ने हमें और हमने उनको अर्थात हमसब ने मिलकर खूब गणित सीखा। इस वर्ष हमने अपने विद्यालय को ट्यूशन फ्री बनाने का निर्णय लिया है और हम सब मिलकर इस मिशन को पूरा करेंगे। गणित शिक्षण तो हम सब गणित शिक्षकों की शत-प्रतिशत जिम्मेवारी है। हमारा कर्तव्य है कि बच्चे इस ट्यूशन माफिया की गिरफ्त से बाहर निकले जहां इन्हें यह कहकर ब्लैकमेल किया जाता है कि गणित आप के बस की बात नहीं है और फिर उनसे और भी अधिक फीस ली जाती है। तो अब समय आ गया है कि ऐसे समाज का निर्माण करें जहां छात्र गणित शिक्षण में खुशी-खुशी भागीदारी करें। इस विषय को आनंद के साथ पढ़ें व समझें। और वह भी बिना किसी ट्यूशन शिक्षक की मदद से।
(परिचय: नीता बत्रा वर्तमान में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में गणित की शिक्षिका हैं। आप जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से वर्तमान में ‘गणित शिक्षण’ में शोध भी कर रही हैं। इस लेख को पढ़ने के बाद अपनी टिप्पणी जरुर लिखें।)

