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एजुकेशन टेक्नोलॉजी: शिक्षा पर संवाद के लिए कितने प्रासंगिक हैं ‘ह्वाट्सऐप ग्रुप’?


लोकप्रिय मोबाइल मैसेजिंग एप्लिकेशन ह्वाट्सऐप की शुरुआत ब्रायन एक्टन और जॉन कुम ने वर्ष 2009 में की थी। इसकी ख़ास बात है कि इस स्टार्टअप को शुरू करने वाले लोग याहू जैसी प्रतिष्ठित जैसी कंपनी में एक अच्छी और स्थायी जॉब में थे। इसके लोकप्रिय होने की दो प्रमुख कारण एक थे पहला मोबाइल आधारित अप्लीकेशन और दूसरा मैसेज के इन्क्रिपश्न की सुविधा यानि मैसेज को बीच में डिकोड करना कठिन होना।

वर्ष 2014 में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक द्वारा 19 अरब डॉलर के अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह फेसबुक में शामिल हो गया और इसके संस्थापक फेसबुक के निदेशक मण्डल में शामिल हो गये। यह तो रही ह्वाट्ऐप की कहानी। इसका इस्तेमाल परिवार से लेकर विभिन्न संस्थाओं, स्कूलों व कॉलेजों में काफी लोकप्रिय हुआ। आज हर स्कूल, ब्लॉक, जिले, प्रदेश व विभिन्न विभागों का एक ह्वाट्सऐप ग्रुप जरूर है, जिसमें विभिन्न तरह की सूचनाओं व तस्वीरों का आदान-प्रदान तेजी से होता है।

शिक्षा संवाद के लिए ह्वाट्सऐप समूहों का इस्तेमाल

शिक्षा के उद्देश्यों के लिए विभिन् ह्वाट्सऐप समूहों के माध्यम से विभिन्न स्कूलों के शिक्षकों के बीच संवाद व बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके कारण स्कूलों से जुड़ी तस्वीरों व गतिविधियों की अपडेट्स भी मिल जाती हैं। लेकिन एक बात ग़ौर करने वाली है कि राजनीतिक चर्चाओं के ग्रुप में आने से ग्रुप के उद्देश्य को हासिल करने पर असर पड़ता है। इसके लिए एडमिन की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है ताकि समूह के सदस्यों में एक सामंजस्य बना रहे।

शिक्षा के क्षेत्र में जो सबसे जरूरी बात है वह है कि चर्चा और संवाद हो। यह बहुत से समूहों से कई बार नदारत होती है क्योंकि लोगों को अपनी-अपनी तस्वीरें शेयर करनी होती है। एक समूह की लिमिट 256 की होती है, अगर 40 लोग भी सक्रिय हैं और 5-5 तस्वीरें व 8-10 लिंक शेयर कर दें तो फिर 200-250 के आसपास सामग्री का प्रवाह एक ग्रुप में हो जाता है।

वास्तव में इतनी सामग्री को देखना और सबका जवाब देना किसी के लिए संभव नहीं है। इससे व्हाट्सऐप ग्रुप में जरूरी सामग्री को दोबारा खोजने में परेशानी होती है। तेज़ी से सामग्री आते रहने के कारण भी उसके ऊपर चर्चा करना संभव नहीं हो पाता है।
इसके लिए बेहतर है कि शिक्षक साथी शेयरिंग व चर्चा पर समान रूप से फोकस करें और विभागीय व अन्य जरूरतों के लिए कंटेंट जैसी जरूरत हो उसके अनुसार शेयर कर सकते हैं। प्रासेस पर बात करना और चीज़ों पर चर्चा सीखने के लिए जरूरी है। इस मूल बात को लेकर चलना जरूरी है।

कई बार शिक्षक साथी खुद भी कहते हैं कि हमें लोगों को सामग्री भेजनी होती है, इसलिए हम बग़ैर पढ़े भी फॉरवर्ड कर देते हैं, इस फॉरवर्ड के कारण समूहों में सामग्री की बाढ़ सी आ जाती है। एक ही सामग्री को एक समूह से दूसरे समूह में भेजने वाली बात भी एक सच्चाई है।

एक और गौर करने वाला तथ्य है कि पढ़ने की आदत न होने के कारण भी चीजों की अधिकता से एक तरह की उदासीनता जकड़ लेती है। इसके कारण जरूरी सामग्री को भी देखना और पढ़ना संभव नहीं रह जाता है।

क्या है नया ट्रेंड

एक नया ट्रेंड ह्वाट्सऐप ब्रॉडकास्ट का है। यह उन लोगों के लिए उपयोगी है जो कंटेट क्रियेटर हैं और चाहते हैं कि क्वालिटी का कंटेट लोगों तक पहुंचे और उनके व्यक्तिगत फीडबैक आपको मिलें। इससे आप लोगों का एक ब्रॉडकास्ट ग्रुप बना सकते हैं और चीज़ों को शेयर कर सकते हैं। इससे ग्रुप में संवाद की गुंजाइश न होने या फिर असहमति के कारण बातचीत न होने वाली समस्या दूर हो जाती है और लोग सुविधा व सहूलियत से चीजों को देख लेते हैं.

ह्वाट्सऐप इस्तेमाल करने में आसान है, वीडियो कॉलिंग,ऑडियो कॉल व डॉक्युमेंट शेयरिंग व लिंक शेयरिंग जैसी सुविधाओं के कारण काफी लोकप्रिय है, लेकिन ग्रुप से लोगों का मोहभंग होना शुरू हो गया है। व्यक्तिगत स्तर पर अपने-अपने स्कूल की गतिविधियों को शेयर और प्रस्तुत करने के लिए बेहतर है कि प्रासेस वाले डॉक्युमेंट बनाए जाएं और शैक्षिक यात्रा को उसके अनुभव व भावनाओं के साथ कहीं दर्ज़ किया जाये।

इस तरह की स्टोरीज़ से आपकी मैसेजिंग काफी अच्छी हो जाएगी। पढ़ी गई किताबों पर चर्चा होनी चाहिए। इससे काफी मदद मिलती है और अन्य लोगों को भी पढ़ने का प्रोत्साहन मिलता है।

ह्वाट्सऐप समूहों पर शिक्षकों की राय

शिखा अवस्थी कहती हैं, “व्हाट्सएप के विभिन्न समूहों में शैक्षिक उद्देश्यों से जुड़ने के मेरे अनुभव कुछ इस प्रकार हैं- जब ग्रुप की शुरुआत होती है तब कुछ दिन तो सभी बहुत सक्रिय होकर शैक्षिक उद्देश्यों पर बातचीत करते और शायद उन्हें व्यवहारिक रूप में अपने कार्यक्षेत्र में लागू भी करते हैं। पर समय बीतने के साथ साथ अन्य समूहों से बेहतर दिखने की एक होड़ सी लग जाती और यही वह समय होता जब “जो दिखता है वह बिकता है” के चक्कर में हम समूह की वास्तविकता के साथ, उसके उद्देश्य के साथ अनजाने में ही अन्याय कर बैठते हैं। फिर हम उसे तस्वीरें शेयर करने और लिंक शेयर करने का जरिया बना देते। इसका प्रभाव उस समूह में जुड़े उन लोगों पर भी पड़ता है जो वास्तव में समूह के उद्देश्य पर कार्य करना चाहते हैं, पर करते नहीं। शायद कुछ लोगों का मत इस से भिन्न हो। उन्हें ये लगता हो कि तस्वीरें और लिंक शेयर करके भी तो वो शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति कर रहे हैं। पर हम इस बात पर भी विचार करें कि ये शैक्षिक उद्देश्य हमने किसके लिए तय किये हैं, क्या वास्तव में ज़मीनी तौर पर व्यवहारिक रूप में उनकी प्राप्ति हो रही या नहीं।”

रीता गुप्ता कहती हैं, “मैंने भी एक ह्वाट्सऐप ग्रुप बनाने का प्रयास किया। कुछ ह्वाट्सऐप ग्रुपों में सक्रियता के साथ प्रतिभाग भी कर रही हूँ। लोग शिक्षा से जुड़े वीडियो बना रहे हैं। टीएलएम बनाते हैं। बच्चों को शेयर करते हैं। बच्चे उसे कॉपी करते हैं। कॉफी का फोटो खींचकर ग्रुप में डाल देते हैं। शिक्षक बड़े उत्साह के साथ बताते हैं कि यह हमारे बच्चों का रेस्पांस हैं। सभी लोग अपना पोस्ट शेयर करते हैं। चर्चा कौन करना चाहता है, ज्यादातर तो हर किसी को लगता है कि उसने जो शेयर किया है उसकी तरफ लोगों का ध्यान जाना चाहिए और उसकी तारीफ होनी चाहिए।”

शशि कला यादव लिखती हैं, “आपको हर तरह के ग्रुप मिल जाएंगे। विभागीय आदेशों वाले ग्रुप भी मिल जाएंगे। हर ग्रुप का एक निश्चित उद्देश्य होता है। कई ग्रुप्स केवल शिक्षा से संबंधित भी मिल जाएंगे। ये हम पर निर्भर करता है कि हम वहाँ से क्या लेंगे और क्या देंगे अपने बच्चों को। ऐसा नही है कि इन ग्रुप्स में शिक्षा से संबंधित कोई चर्चा नही होती। है मगर फोटोज की संख्या ज्यादा होती है लेकिन वो फोटोज काफी काम की भी होती हैं। विषय से संबंधित जो भी पोस्ट्स आते हैं ऐसे ग्रुप्स पे उनका इस्तेमाल हम अपने स्कूल्स में पढ़ाने के लिए भी करते हैं।”

सौरभ राजपूत कहते हैं, “शिक्षा विभाग के व्हाट्सएप समूहों में सिर्फ विभागीय आदेशों का अनुपालन होता है! शिक्षा के उत्थान और उसमें सुधार के विषय मे कोई चर्चा नहीं होती है।”

देवेन्द्र कुमार गुर्जर कहते हैं, “अधिकतर शिक्षा से जुड़े ग्रुप तो केवल शिक्षा विभाग की खबरो से अटे पड़े हैं। मुश्किल से ही वहाँ शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है।”

संजय सोनारे कहते हैं, “कहीं न कहीं कोई कमी है, इसे हम सिस्टम का डर कहे, या हमारी कमजोरी बेबाकी से राय नही रख पाते। केवल एक तरफा संवाद हो रहा है। डरा हुआ शिक्षक क्या अपना काम वास्तविक योग्यता से कर पायेगा।”

स्नेहिल पाण्डेय कहती हैं, “ह्वाट्सऐप ग्रुप पर शेयर होने वाला विचार या आइडिया कहीं का भी हो, अगर वह अच्छा और उपयोगी है तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए और एक-दूसरे के साथ साझा करना चाहिए।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए स्नेहिल कहती हैं, “ह्वाट्सऐप का एक फायदा यह भी है कि हम एक ही ग्रुप में बहुत दूर-दूर के लोगों से जिनसे हम कभी मिल नहीं सकते, जुड़ पाते हैं। अपने अनुभवों व विचारों को अपने प्रदेश और अपने क्षेत्र से इतर भी कई जगह पहुंचा पाते हैं। नये विचार और रणनीतियों से भी परिचय होता है। यह बात हर हाल में सकारात्मक है। कभी-कभी ग्रुप में कुछ वाकई ऐसा देखने को मिल जाता है जो चकित कर देने वाला होता है जिससे मन में यह बात आती है कि असंभव कुछ भी नहीं और रुक जाने का कोई मतलब नहीं। इससे अपने काम को जारी रखने की ऊर्जा और उत्साहवर्धन मिलता है।”

आखिर में यही कह सकते हैं कि हमें व्हाट्सऐप पर आ रही सामग्री से चुनाव करना होगा कि कौन सी सामग्री शेयर करनी है। इससे गुणवत्ता वाली सामग्री की शेयरिंग होगी और उस पर बातचीत और चर्चा के लिए समय भी मिलेगा। तस्वीरों के साथ काम की प्रक्रिया शेयर करने से काफी लाभ होगा। इसमें व्यक्तिगत स्तर पर मेहनत तो है लेकिन यह सामुहिक बेहतरी और प्रयासों के आसपास चर्चा के लिए गुंजाइश पैदा करेगा।

प्रतिस्पर्धा की बजाय सहयोग और सामुहिक रूप से मिलकर समाधान खोजने की जरूरत है। अंत में प्रक्रिया व काम का प्रोत्साहन हो चाहे वह किसी भी व्यक्ति की तरफ से साझा हो रहा हो। इस एक बात को ध्यान में रखकर ही शैक्षिक उद्देश्यों को पाने में मदद मिलेगी। साथियों को वास्तविक फीडबैक देना भी जरूरी है ताकि लोग अपने काम को सुधार सकें और बेहतर बना सकें। उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा और इससे आपको अपने स्तर पर Whatsapp का बेहतर इस्तेमाल करने में जरूर मदद मिलेगी। अपने सुझाव टिप्पणी के रूप में लिखें।

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