शिक्षा के क्षेत्र में प्रदेश, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने वाली शिक्षिका अल्पा निगम कहती हैं, “कल शिक्षक दिवस (यानि 5 सितंबर) बीत गया। अब फिर पूरे एक साल का इंतज़ार रहेगा जब लोग एक दिन के लिए शिक्षकों पर फिर विश्वास जताएँगे।”
मूल प्रश्न यह है कि क्या ‘शिक्षकों पर विश्वास’ यानि ‘शिक्षक दिवस’ केवल एक दिन का उत्सव मात्र है? आज केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि हर रिश्ते में विश्वास कम होता जा रहा है। जैसे माँ-बाप का बच्चों पर, पति-पत्नी का एक-दूसरे पर, दोस्तों और सहकर्मियों का आपसी रिश्तों पर, यहाँ तक कि इंसान का खुद पर भी। यही टूटता हुआ विश्वास, लोगों को भीतर से भी तोड़ रहा है।
शिक्षकों पर विश्वास से मिलेंगे ‘बेहतर परिणाम’
अगर शिक्षकों की बात करें तो गाँव से लेकर उच्च स्तर तक, हर जगह उनका सम्मान और विश्वास कम होता जा रहा है। यह सच है कि गलतियाँ दोनों ओर से होती हैं—“ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती”। लेकिन विश्वास में वह ताक़त है जो बिगड़ी हुई बात को भी सुधार सकती है।
अगर समाज शिक्षकों पर अपना पूरा विश्वास दिखाए, तो यही विश्वास शिक्षकों के आत्मबल और आत्म-विश्वास को कई गुना बढ़ा देगा। यानि किसी इंसान पर जितना ज्यादा विश्वास या भरोसा किया जाता है, उतना ही उसके टूटने की संभावना कम होती है। ऐसा इंसान विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर परिणाम और सुधार के अवसरों की राह खोल देता है। वहीं दूसरे तरफ अविश्वास हमेशा पतन की ओर ले जाता है।
तो आइए, इस ‘शिक्षक दिवस’ के बाद हम सब मिलकर यह संकल्प लें, “हम शिक्षकों को केवल एक दिन के लिए नहीं, बल्कि हर दिन विश्वास और सम्मान देंगे—क्योंकि यही विश्वास बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव है।”
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