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शिक्षक दिवसः शिक्षकों के योगदान की तारीफ जरूरी

शिक्षक दिवस क्यों मनाते हैं, भारत में शिक्षक दिवस, शिक्षक की भूमिका, शिक्षक के पेशे के प्रति सम्मानआप सभी को ‘शिक्षक दिवस‘ की शुभकामनाएं। 21वीं सदी के इस दौर में शिक्षक की भूमिका का निर्वाह करना आसान नहीं है। भारत में शिक्षा जगत वर्तमान में व्यापक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। शिक्षा तंत्र में शिक्षकों पर चारो तरफ से आलोचनाओं की बौछार हो रही है। ग़ौर करने वाली बात है कि इनमें से ज्यादातर आलोचनाएं मनगढंत हैं।

शिक्षकों के काम की तारीफ हो

आप में से बहुत से साथी जिन स्कूलों में काम करते हैं, ख़ासतौर पर ‘सरकारी स्कूलों’ में उनके खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार जारी है। आपके पास संसाधनों का अभाव है। पड़ोसी की नज़र आपके वेतन पर होती है, मगर आपके काम पर उनका ध्यान नहीं जाता। बहुत से लोग आपकी तरह शिक्षक बनना चाहते हैं, मगर आपके काम की वजह से नहीं। इस काम के बदले मिलने वाले पैसे के कारण।

मैं यह भी जानता हूँ कि मेरिट के नाम पर होने वाले चुनाव में नकल के बाजीगर आपके सहकर्मी हैं, जिनके साथ आप निभाने की कोशिश करते हैं। आपको फख्र होता है कि आपके बैच में लोगों का चुनाव प्रतिस्पर्धी परीक्षा से हुआ था। आपके बहुत से सहकर्मी मामूली वेतन पर कई सालों से काम कर रहे हैं। कुछ तो सेवानिवृत्ति के कगार पर खड़े हैं, अपनी तरफ से जो संभव हैं कर रहे हैं। ऐसे शिक्षकों साथियों को हमारे हौसलाफजाई की जरूरत है जो विपरीत परिस्थितियों में अच्छा कर रहे हैं।

नज़रिये में बदलाव की जरूरत

पिछले साल एक स्कूल में जाना हुआ था। वहां दूसरी कक्षा के बच्चे बग़ैर किसी एनजीओ की मदद के हिंदी की किताब अच्छे से पढ़ पा रहे थे। इस तरह के प्रयासों का जिक्र किसी अख़बार में किसी पत्रिका में नहीं हुआ। न ही इस स्कूल का चयन उस ब्लॉक की सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में हुआ। इसकी चर्चा शिक्षक साथी अपने प्रधानाध्यापक के साथ सुबह की स्टाफरूम में कर रहे थे। इसके साथ ही किसी अधिकारी के स्कूल में दौरे का भी जिक्र हो रहा था। जिसमें उन्होंने शिक्षकों से तमाम अनाप-शनाप सवाल पूछे थे। लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि शिक्षक कोई काम नहीं करते।

अगर हम सौ बार किसी झूठ को दोहराते हैं तो वह बात सच हो जाती है। शिक्षकों के बारे में भी यह झूठ एक सच की तरह तैर रहा है। जिसे हाथों-हाथ लिया जा रहा है क्योंकि आज के समय की रफ्तार बहुत तेज़ है। किसी के पास ठहरकर अपने विचारों के ऊपर सोचने का समय नहीं है कि जो सोचा जा रहा है वह कितना सही या ग़लत है। इस कारण से भी हम शिक्षकों के बारे में, सरकारी स्कूलों के बारे में, निजी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों के बारे में भी बहुत सी अफवाहों को सच मानकर रोज़-रोज़ जीते जा रहे हैं।मगर उसमें कोई बदलाव नहीं कर पा रहे हैं।

शिक्षकों से क्या अपेक्षाएं है?

एक शिक्षक से ऐसी अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विचारों पर सोचे जो चीज़ें ठीक नहीं है, उसमें बदलाव करे। समय के साथ खुद को अपडेट करें। समाज की नब्ज को समझे। परिस्थितियों से समझौता करने की बजाय रास्ता निकाले। जुगाड़ की बजाय लगातार मेहनत पर भरोसा करे। वह जिन बच्चों के साथ काम करता है उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझे। इससे उनके काम करने का तरीका और काम के प्रति नजरिया ज्यादा परिपक्व होगा और ज़मीन से जुड़ा हुआ होगा।

उदाहरण के तौर पर पिछले साल एक शिक्षक ने बताया, “अगर मैं गाँव में सर्वे के लिए नहीं जाता तो मुझे पता नहीं चलता कि मेरे स्कूल की एक बच्ची स्कूल नहीं आने पर भी खाने के समय स्कूल क्यों आती है?” इस तरह की संवेदनशीलता का विकास बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझने से आती है। एक संवेदनशील शिक्षक अपने बच्चों की क्षमता को पहचानते हैं। उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। ताकि एक संदेश पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहे कि हमें एक-दूसरे का सहयोग करना है। एक बार फिर से सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। संवाद का सिलसिला सतत जारी रहेगा। क्योंकि ये शुभकामाएंऔर संवाद सिर्फ दिन विशेष की औपचारिकता तक सीमित नहीं हैं।

‘शिक्षक दिवस’ का महत्व

हर दिन को हाइजैक करने की कोशिश होती है। यह दिन सिर्फ आपके लिए है। शिक्षकों के काम का सम्मान करने के लिए है। उनके योगदान के लिए शुक्रिया कहने का अवसर है। इसे राजनीति के बाकी तामझाम से अलग रखना चाहिए। शिक्षक दिवस को किसी खास ‘व्यक्तित्व’ के फ्रेम में क़ैद करने की जरूरत नहीं है। वर्तमान संदर्भ में इसे उन शिक्षकों के प्रति समर्पित करना चाहिए जो स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में अपने योगदान से छात्रों की ज़िंदगी में अपना योगदान दे रहे हैं।

यह योगदान गिनती सिखाने जितना छोटा भी हो सकता है और गणित के किसी सिद्धांत को रिसर्च के माध्यम से सिद्ध करने जैसा विशाल भी हो सकता है। दोनों तरह के योगदान का अपना महत्व है। आदिवासी अंचल में, गाँव में और गंदी बस्तियों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का योगदान कुछ कम नहीं है। उन्हें भी उनके योगदान के लिए शुक्रिया कहना चाहिए, पढ़ाई इन क्षेत्रों में भी होती है। यहां के बच्चे भी विभिन्न विश्वविद्यालयों में दाखिला ले रहे हैं, अपने सफर को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसा इन क्षेत्रों में काम करने वाले शिक्षकों के कारण हो रहा है। इस सच्चाई को स्वीकार करने से हमें गुरेज नहीं होना चाहिए।

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3 Comments on शिक्षक दिवसः शिक्षकों के योगदान की तारीफ जरूरी

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया ऋषिकेश, आपकी टिप्पणी हर बार मुझे चौंकाती है। हाँ, एक कोशिश थी कि सारी बातों को एक पोस्ट में कैसे पिरोया जा सके। ताकि स्थिति की जटिलता दिखाई दे, जिसमें विभिन्न आयामों का जिक्र हो। आपका ग़ौर से पढ़ना एक गिफ्ट ही है, मेरे लिए। पिछले दो-चार दिनों की बात वही कह सकता है जो आपको रोज़ाना पढ़ता है। आपके शब्दों में एक अच्छे पाठक और समालोचक दोनों के भाव नज़र आते हैं। यह नज़र और पढ़ने का यह जज्बा बना रहे।
    -वृजेश

  2. ऋषिकेश // September 5, 2016 at 5:40 am //

    नमस्कार ! शिक्षक दिवस पर उम्दा लेख, इस लेख के माध्यम से आपने शिक्षक एवं शिक्षा जगत की चुनौतियों एवं संभावनाओं को शब्द देने की एक सफल कोशिस की है, इसके लिए आपको साधुवाद ,
    हालांकि मैं समय समय पर आपके दोनों ब्लॉग को पढ़ता रहता हूँ , लेकिन पिछले दो -चार दिनों से ‘Education Mirror’ पर आप पहले से ज्यादा सटीक एवं विश्‍लेषित लेख दे रहे हैं , साथ ही भाषा की प्रवाह तो, मुझ जैसे पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रखती है ,
    एक बार पुनः आपको साधुवाद.

    आपका अपना ही
    ऋषिकेश

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