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स्कूल की छुट्टी होने पर याद आया शिक्षक दिवस…

शिक्षकों और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में सहभागी बनने का अवसर देने वाले वाले मित्रों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामना। जिन्होनें जिज्ञासु मन के सवालों को विकसित होने का मौका दिया। उनके काम को बच्चों के साथ बातें करते हुए ज्यादा गहराई से समझने का मौका मिला। आज स्कूल के बच्चों के साथ काफी अच्छा वक़्त बीता। छुट्टी के वक़्त याद आया कि आज शिक्षक दिवस है। इस अवसर पर किसी कार्यक्रम का आयोजन करने और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन को बतौर शिक्षक याद करने से बेहतर लगा कि सारे शिक्षक बच्चों के साथ क्लॉस में समय बिता रहे थे। छोटे बच्चों ने क्लॉस में जमकर शोर मचाया। मेरे साथ जोश-ओ-खरोश से बालगीत गाया। छठीं क्लॉस में हमने गुणाकर मुले द्वारा लिखे “अक्षरों की कथा” नाम के पाठ की पांच पंक्तियां पढ़ीं औऱ अक्षर, शब्द, वाक्य, डायरी और साहित्य की तमाम विधाओं का जिक्र करते हुए तकरीबन एक घंटे तक ढेर सारी बातें की।
इसके बाद आठवीं क्लॉस में बच्चों की पसंद के पाठ “जहां पहिया है…” के ऊपर बच्चों से संवाद किया। इस पाठ में तमिलनाडु के पुडुकोट्टई जिले का जिक्र है। जो महिलाओं के साइकिल चलाने के आंदोलन की कहानी कहता है। पाठ को लिखने वाले लेखक पी. साईंनाथ जी है। जिनसे तीन साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कैंपस में मिलना हुआ था।बच्चों के साथ आदिकाल की लकड़ियों के तने से लेकर पहिए के नि्र्माण की रोचक कहानी पर बात हुई। वहां से जो संवाद का सिलसिला चला तो वह बैलगाड़ी के लकड़ी वाले पहियों से घूमता हुआ कुम्हार के चाक  तक, फिर वहां से गाड़ियों के टायरों तक का जिक्र हुआ….हवाई जहाज के पहिय़ों का ख़्याल भी मन के कोने में कौंध रहा था। शिक्षक और छात्रों के बीच ऐसे रोचक संवादों को जगह मिले। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया दो-तरफा हो। मन तो यही चाहता है।

हमारा स्कूलों में काम बड़ा रोचक है। हम शिक्षकों और प्रधानाध्यापक जी को कहते रहते हैं कि हमारा काम स्कूल में पढ़ाना नही है। हम आपकी जगह को रीप्लेस नहीं कर सकते। लेकिन साथ ही साथ बच्चों से बहुत ज्यादा लगाव होने के नाते और उनसे संवाद के अवसर को उपयोग करने के कारण उनके बीच जाते ही हैं। बच्चों के बीच जाने के बावजूद उनसे दूर बने रहने का कोई कारण समझ में नहीं आता। इसलिए उनके साथ वक़्त जरूर बिताते हैं। किसी पाठ के माध्यम से रोचक संवाद का माहौल बनाकर उनको अपनी बात रखने का मौका भी देते हैं। कहानी, कविताओं और बालगीत की सीढ़ियों पर चढ़कर कल्पनालोक की सैर करते हैं तो कभी जिंदगी के घोर यथार्थ पर मासूम मन की जिज्ञासाओं की टोह भी लेते हैं।

बच्चों को सिखाने से ज्यादा मैनें उनसे सीखा है। यह बात बड़े भरोसे के साथ कही जा सकती है। प्राथमिक स्कूल के बच्चों से संवाद करना जीवन के सबसे सुंदर अनुभवों में से एक है। बच्चों को नादान कहने और समझने वालों की समझदारी पर सवाल खड़ा होता है। आज शिक्षकों से गिजुभाई का जिक्र हो रहा था कि अगर हमारे समय में गिजुभाई जैसे शिक्षक होते तो नौकरी से हाथ धो बैठते। जिन्होनें बच्चों के यह कहने पर कि आज पढ़ने का मन नहीं है। बच्चों की छुट्टी कर दी और उनको घर जाने के लिए कहा। हमारे सफर में अगर शिक्षक नाम के जीव न मिलते तो हमारा जाने क्या होता…। किताबों के अक्षरों के प्रति नेह का निर्माण उन्होनें किया। अपने पक्ष को आगे बढ़कर रखने और जीवन में स्टैण्ड लेने की सीख उनसे मिली। लोगों का सामन करने औऱ सही सवाल पूछने के प्रति मन में ललक हैदा करने में उनके द्वारा दी गई छूट औऱ खुला माहौल सहायक रहे। शिक्षक दिवस के बहाने उन मील के तमाम पत्थरों पर नजर डालते हुए…..अपने शिक्षकों की याद बरबस चली आती है। ऐसे पावन अवसर पर उन्हें सत-सत नमन। 
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4 Comments
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बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी।

Amrita Tanmay

आपकी भावनाओं को आत्मसात किया..

बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी।

Amrita Tanmay

आपकी भावनाओं को आत्मसात किया..

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