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“स्कूल केवल कार्यस्थल नहीं, परिवर्तन का केंद्र है” — कुमारी निधि



बिहार के किशनगंज जिले के एक सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से आने वालीं कुमारी निधि आज एक प्रधान शिक्षिका के रूप में हजारों बच्चों के जीवन को दिशा दे रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से सम्मानित निधि जी ने एजुकेशन मिरर के साथ इस बातचीत में अपने बचपन, शिक्षक बनने की यात्रा, भाषा शिक्षण की चुनौतियों और कक्षा को बच्चों के लिए सार्थक बनाने के अपने अनुभव साझा किए।

  1. अपना परिचय दीजिए और बताइए कि आपका बचपन कहाँ बीता। आज के बच्चों के बचपन और अपने बचपन में आप क्या अंतर महसूस करती हैं?

मेरा नाम कुमारी निधि है। मैं बिहार के किशनगंज जिले के एक सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से आती हूँ। मेरा बचपन सीमित संसाधनों के बीच बीता, जहाँ शिक्षा के अवसर कम थे, लेकिन सपनों की कोई कमी नहीं थी। मैं अपने गाँव की पहली बेटी थी जिसने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो संघर्ष ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी दिखाई देता है।

आज के बच्चों और हमारे बचपन में सबसे बड़ा अंतर यह है कि हमारे पास संसाधन कम थे लेकिन धैर्य, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक संबंध अधिक थे। आज बच्चों के पास तकनीक और जानकारी तो बहुत है, लेकिन एकाग्रता, संवाद और पुस्तकों से जुड़ाव पहले की तुलना में कम होता जा रहा है। मेरा प्रयास रहता है कि आधुनिक तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बनाया जाए।

  1. बचपन में पाठ्य पुस्तकों के अलावा क्या पढ़ने को मिलता था? आज के बच्चों को क्या अवसर मिल रहे हैं?

हमारे समय में पाठ्य पुस्तकों के अलावा बहुत कम सामग्री उपलब्ध होती थी। कभी-कभी अखबार, पुरानी पत्रिकाएँ या किसी के घर रखी किताबें ही पढ़ने का अवसर मिलता था। पुस्तकालय जैसी सुविधा लगभग नहीं थी।

आज बच्चों के पास पुस्तकें, बाल पत्रिकाएँ, डिजिटल सामग्री, ऑडियो-वीडियो संसाधन और इंटरनेट तक पहुँच है। लेकिन चुनौती यह है कि इतनी सामग्री के बीच सार्थक पठन की आदत विकसित हो। इसलिए मैंने विद्यालय में पुस्तकालय, बाल पत्रिका और ‘निपुण बाल मंच’ जैसे प्रयास शुरू किए, ताकि बच्चे केवल परीक्षा के लिए नहीं बल्कि आनंद और जिज्ञासा के लिए भी पढ़ें।

  1. शिक्षक बनने का विचार आपके मन में कब आया?

शिक्षक बनने का निर्णय केवल नौकरी पाने के लिए नहीं था। मैं शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मानती हूँ। ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा की वास्तविक स्थिति देखकर मन में यह विश्वास पैदा हुआ कि यदि एक शिक्षक समर्पित हो तो वह कई पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है।

आज जब विद्यालय छोड़ चुकी बालिकाएँ फिर से पढ़ाई में लौटती हैं या किसी बच्चे के चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाई देता है, तब लगता है कि शिक्षक बनने का निर्णय मेरे जीवन का सबसे सही निर्णय था।

  1. क्या कोई ऐसे शिक्षक रहे जिनसे आपको प्रेरणा मिली?

मेरे जीवन में कई ऐसे शिक्षक रहे जिन्होंने केवल विषय नहीं पढ़ाया बल्कि जीवन जीने की सीख दी। उन्होंने हमेशा कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं बल्कि अच्छा इंसान बनना है। उनकी सादगी, अनुशासन और विद्यार्थियों के प्रति समर्पण ने मुझे बहुत प्रभावित किया। आज भी मैं उन्हीं मूल्यों को अपने विद्यालय में अपनाने का प्रयास करती हूँ।

  1. पहली बार पढ़ाने का अवसर मिला तो अनुभव कैसा रहा?

पहली बार जब बच्चों के सामने खड़ी हुई तो उत्साह के साथ जिम्मेदारी का भी एहसास था। मुझे जल्दी समझ में आ गया कि हर बच्चा अलग है और सभी को एक ही तरीके से नहीं पढ़ाया जा सकता।

धीरे-धीरे मैंने बच्चों को समझना शुरू किया। संवाद, गतिविधि और प्रेमपूर्ण वातावरण के माध्यम से सीखना अधिक प्रभावी हुआ। उसी अनुभव ने मेरी शिक्षण शैली की नींव रखी।

  1. आपके अनुसार शिक्षा बच्चे को जीवन के लिए कैसे तैयार करती है?

मेरे अनुसार शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है। शिक्षा बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, समस्या समाधान, सहयोग और जिम्मेदारी विकसित करती है। यदि बच्चा केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाए लेकिन जीवन की चुनौतियों का सामना न कर सके तो शिक्षा अधूरी है।

  1. बच्चों को कक्षा में सक्रिय रखने के लिए आप क्या करती हैं?

मैं गतिविधि आधारित शिक्षण, कहानी, खेल, समूह कार्य, परियोजना आधारित अधिगम, भूमिका निर्वहन, गीत, चित्र, स्थानीय सामग्री और प्रश्नोत्तर का प्रयोग करती हूँ। मैं कोशिश करती हूँ कि कक्षा में सबसे अधिक आवाज शिक्षक की नहीं बल्कि बच्चों की हो। जब बच्चे स्वयं खोजते हैं, बोलते हैं और करते हैं, तभी वास्तविक सीख होती है।

  1. बच्चों की जिज्ञासा को आप कैसे प्रोत्साहित करती हैं?

मैं बच्चों को बिना डर के प्रश्न पूछने का अवसर देती हूँ। मेरी कक्षा में कोई प्रश्न छोटा या गलत नहीं माना जाता। कई बार मैं स्वयं प्रश्न पूछने के बजाय बच्चों से प्रश्न बनवाती हूँ। जब बच्चे प्रश्न पूछना सीख जाते हैं, तभी वे सोचने और सीखने की वास्तविक प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं।

  1. बच्चों को लेकर आपकी क्या नई समझ बनी है?

शिक्षक बनने के बाद मैंने जाना कि कोई भी बच्चा कमजोर नहीं होता। हर बच्चे की सीखने की गति, रुचि और क्षमता अलग होती है। यदि कोई बच्चा पीछे है तो अक्सर उसकी परिस्थितियाँ, भाषा, अवसर या आत्मविश्वास कारण होते हैं, उसकी बुद्धि नहीं। इसलिए तुलना के बजाय व्यक्तिगत सहयोग आवश्यक है।

  1. परीक्षा और अंकों का दबाव शिक्षा को कैसे प्रभावित करता है?

अत्यधिक परीक्षा और अंकों की दौड़ बच्चों की रचनात्मकता और जिज्ञासा को प्रभावित करती है। कई बार शिक्षक भी परीक्षा केंद्रित शिक्षण तक सीमित हो जाते हैं। मेरा मानना है कि मूल्यांकन सीखने को बेहतर बनाने का माध्यम होना चाहिए, भय पैदा करने का नहीं।

  1. गाइड और पासबुक संस्कृति पर आपकी क्या राय है?

तीसरी कक्षा से गाइड और पासबुक का बढ़ता चलन चिंता का विषय है। इससे बच्चे उत्तर याद करना सीखते हैं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया नहीं। यदि प्रारंभिक कक्षाओं में ही बच्चों की सोचने और समझने की क्षमता विकसित नहीं होगी तो आगे चलकर नवाचार और रचनात्मकता प्रभावित होगी। शिक्षक और अभिभावकों दोनों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

  1. शिक्षा में तकनीक की भूमिका को आप कैसे देखती हैं?

तकनीक शिक्षा का महत्वपूर्ण सहयोगी है, लेकिन शिक्षक का विकल्प नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी इंटरनेट, बिजली और उपकरणों की सीमाएँ हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक और गतिविधि आधारित शिक्षण का संतुलित उपयोग ही सबसे प्रभावी मॉडल हो सकता है।

  1. भाषा शिक्षण की सबसे बड़ी चुनौती क्या है और आप उसका समाधान कैसे करती हैं?

मेरे विद्यालय के अधिकांश बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ घर में स्थानीय भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं, जबकि विद्यालय में शिक्षण का माध्यम मुख्यतः हिंदी है। ऐसे में बच्चों के लिए विद्यालय की भाषा को समझना और उसमें स्वयं को अभिव्यक्त करना प्रारंभिक स्तर पर एक बड़ी चुनौती होती है। यदि इस संक्रमण को संवेदनशीलता से नहीं संभाला जाए, तो बच्चे पढ़ाई से जुड़ने के बजाय संकोच और भय महसूस करने लगते हैं।

मैं इस चुनौती को बच्चों की कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी भाषाई समृद्धि मानती हूँ। इसलिए सबसे पहले मैं उनकी मातृभाषा का सम्मान करती हूँ और उसी को सीखने का आधार बनाती हूँ। प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों से उनकी अपनी भाषा में संवाद करती हूँ, स्थानीय कहानियों, लोकगीतों, चित्रों, खेलों, गतिविधियों और अनुभवों के माध्यम से धीरे-धीरे उन्हें हिंदी से जोड़ती हूँ। इससे वे सहज महसूस करते हैं, कक्षा में सक्रिय भागीदारी करते हैं और बिना झिझक अपनी बात रखने लगते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा आधारित शिक्षण पर विशेष बल देती है। मेरा अनुभव है कि जब बच्चे की भाषा और संस्कृति को सम्मान मिलता है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और सीखना स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाता है। मेरा विश्वास है कि भाषा केवल पढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व, विचार और आत्मविश्वास को विकसित करने का सबसे सशक्त साधन है। इसलिए मेरा प्रयास रहता है कि विद्यालय में भाषा कभी बाधा न बने, बल्कि प्रत्येक बच्चे की सीखने की यात्रा को सरल, आनंददायक और समावेशी बनाए।

  1. पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए आपने क्या प्रयास किए?

विद्यालय में पुस्तकालय को सक्रिय बनाया गया है। बच्चे नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ते हैं और घर भी ले जाते हैं। इसके अलावा बाल पत्रिका, कहानी वाचन, पुस्तक चर्चा, रीडिंग कॉर्नर और ‘निपुण बाल मंच’ जैसे नवाचारों के माध्यम से बच्चों में पढ़ने की संस्कृति विकसित की जा रही है।

  1. आपकी पसंदीदा पुस्तकें कौन-सी हैं?

कोई एक पुस्तक की बात कही जाए तो मुझे ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की “माय लाइफ” ने बहुत प्रभावित किया। श्रीमद्भागवत गीता, पवित्र रामायण जैसी पुस्तकों के साथ मुझे बाल साहित्य, प्रेरक जीवनियाँ, भारतीय चिंतन, शिक्षा और समाज से जुड़ी पुस्तकें पढ़ना पसंद है। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के साहित्य ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है। व्यस्तता के बावजूद मैं प्रतिदिन कुछ समय पढ़ने के लिए अवश्य निकालने का प्रयास करती हूँ।

  1. स्वयं को अपडेट रखने के लिए आप क्या करती हैं?

मैं राष्ट्रीय शिक्षा नीति, एनसीईआरटी, एससीईआरटी की सामग्री, शैक्षिक पत्रिकाएँ, शोध लेख, वेबिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रम, शिक्षक संवाद मंच और शिक्षा से जुड़े विश्वसनीय डिजिटल प्लेटफॉर्म का नियमित अध्ययन करती हूँ। मेरा विश्वास है कि जो शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर देता है, वह बच्चों को सीखने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता।

  1. शिक्षक समुदाय को लेकर समाज की क्या राय है?

समाज में शिक्षक से आज भी बहुत अपेक्षाएँ हैं। कभी-कभी आलोचना भी होती है, लेकिन जब किसी विद्यार्थी का जीवन बदलता है, तब वही समाज शिक्षक को सबसे अधिक सम्मान देता है। मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा तब मिलती है जब कोई अभिभावक कहता है कि उसके बच्चे में सकारात्मक बदलाव आया है। पुरस्कार और सम्मान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी बच्चे की मुस्कान और उसका आत्मविश्वास एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ा सम्मान होता है।

अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि शिक्षा केवल भविष्य बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि बेहतर समाज निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि हर शिक्षक अपने विद्यालय को केवल कार्यस्थल नहीं बल्कि परिवर्तन का केंद्र मान ले, तो देश की तस्वीर बदल सकती है।

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