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परीक्षाः डर, नंबर और नकल की कहानी…

शिक्षा जीवन भर चलती रहती है।

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बिहार के कुछ स्कूलों की तस्वीर को पूरे प्रदेश की सच्चाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऐसे में परीक्षा, नकल और नैतिकता का रिश्ता खोजने से पहले जानना जरूरी है।

1.सभी छात्रों को ‘नकलची’ कहना उनका अपमान करना है।
2.पूरे प्रदेश के लिए कोई निष्कर्ष निकाल लेना उससे भी ख़तरनाक है।
3.परीक्षा के दौरान छात्रों को जिस डर का सामना करना पड़ता है, क्या वह सही है?
4.नकल की आलोचना करने से पहले यह भी देख लेना जरूरी है कि गाँव के उन स्कूलों में पढ़ाई का स्तर कैसा है?
5.क्या उन स्कूलों के बच्चों को भी नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। सभी विषयों के शिक्षक उपलब्ध हैं या नहीं।
6.परीक्षा और पास-फेल के खेल में पासबुक की कमाई का आँकड़ा क्या है? यह भी जानना जरूरी है।
7.जिन बच्चों के पास कोचिंग के लिए पैसे नहीं है…उनके पास नकल और किताब से रट्टा मारने के अलावा रास्ता क्या है?
8. इस विषय पर प्रसारित किसी भी रिपोर्ट में बच्चों का पक्ष नहीं है कि वे नकल क्यों करते हैं? या नकल करने को क्यों सही मानते हैं।
9.जब अच्छी संस्थाओं में प्रवेश के लिए नंबर चाहिए और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले को दस हज़ार रूपए मिल रहे हैं..तो नंबर की होड़ नहीं होगी क्या?
10. नकल के शोर में बाकी पहलुओं पर हमारी नज़र नहीं जाती जैसे परीक्षा में ऐसे सवाल क्यों पूछे जाते हैं कि गाइड से मदद मिले।

परीक्षा में मिलने वाले नंबरों को महत्वपूर्ण मानने वाली व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से चीटिंग और चोरी को वैधता देती रहेगी। ऐसे में बेहतर यही होगी कि हम छात्रों को अपमानित करने की बजाय उनके डर को समझें।परीक्षा के दौरान उनको होने वाली मानसिक पीड़ा और परेशानी को समझने की कोशिश करें। फेल होने की तकलीफ क्या होती है? फेल होने के बाद कोई छात्र आत्महत्या जैसा गंभीर क़दम क्यों उठा लेता है? इसका जवाब भी इस शिक्षा व्यवस्था और समाज को देना चाहिए। चंद नंबरों से एडमीशन से चूक जाने वाले छात्रों के आँसुओं को भी जवाब चाहिए कि आख़िर उनकी ग़लती क्या है?

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