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यूपी बोर्डः 10 लाख से ज्यादा छात्रों ने छोड़ी परीक्षा

 

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उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा हर दिन परीक्षा केंद्रों का दौरा कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश का माध्यमिक शिक्षा विभाग दुनिया का सबसे बड़ा बोर्ड है। इस साल बोर्ड परीक्षाओं में कड़ाई के चलते 6 लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों ने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा छोड़ दी है। इस साल बोर्ड परीक्षाओं की शुरूआत 6 फरवरी से हुई। परीक्षा केंद्रों के चुनाव के दौरान सीसीटीवी लगाने और अन्य सुविधाओं के पर्याप्त इंतज़ाम के लिए शुरूआत से ही ध्यान रखा गया। ‘नकल विहीन’ परीक्षा की मंशा सरकार और प्रशासन द्वारा बार-बार शिक्षकों की बैठकों और अन्य सार्वजनिक मंचों से बार-बार कही जा रही थी। अभी इसकी ज़मीनी सच्चाइयां भी सामने आ रही हैं।

6 लाख से ज्यादा छात्र-छात्राओं ने छोड़ी बोर्ड परीक्षा

 

बोर्ड परीक्षाओं की ज़मीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा लगातार ऐसे संवेदनीशल क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं जहाँ से परीक्षा में गड़बड़ी की सबसे ज्यादा आशंका जाहिर की गई थी। इसका असर बोर्ड परीक्षा में हिस्सा लेने वाले ऐसे छात्रों की संख्या गिरावट के रूप में सामने आया है जो नकल के भरोसे बैठे हुए थे। यूपी बोर्ड की परीक्षा में रेगुलर और प्रायवेट दोनों तरह के छात्र हिस्सा लेते हैं। ग़ौर करने वाला आँकड़ा ऐसे छात्रों का भी है जो नियमित हैं, और उन्होंने कड़ाई के डर से परीक्षा छोड़ दी है। इस तरह केो आँकड़ों के लिए हमें थोड़ा इंतज़ार करना होगा।

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उप मुख्यमंत्री के दौरे को सभी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया।

परीक्षा को लेकर जो गंभीरत सरकार की तरफ से दिखाई जा रही है, वह स्वागत योग्य है। इसे लेकर कुछ नकल माफिया, छात्रों और अभिभावकों में गुस्सा हो सकता है, मगर प्रदेश के शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को समझने की दृष्टि से इस परीक्षा के दौरान नकल के मामलों की संख्या, परीक्षा छोड़ने वाले कुल छात्रों की संख्या ग़ौर करने लायक है।

लाखों छात्र-छात्राओं के हौसले पर भारी परीक्षा में कड़ाई का डर

इसके साथ ही नियमित पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या जिन्होंने परीक्षा छोड़ी है और ऐसे प्रधानाध्यापकों व शिक्षकों की संख्या जो नकल कराते हुए पकड़े जा रहे हैं, ग़ौर करने वाले हैं। यह आने वाले सत्र में शिक्षा व्यवस्था में सुधार के क्षेत्रों और चिंता क्षेत्र की तरफ संकेत करेंगे, जिसके ऊपर पूरे अकादमिक सत्र में नज़र रखने, सहयोग करने और बोर्ड परीक्षाओं के लिए छात्र-छात्राओं की अच्छी तैयारी की दृष्टि से जरूरी हैं।

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परीक्षा में सख्ती का असर शिक्षकों पर भी पड़ा है।

बहुत से ऐसे हाईस्कूल और इंटर कॉलेजे हैं, जहाँ पर विषय विशेष के शिक्षकों की कमी है। इसके कारण क्षेत्र में चलने वाले निजी ट्युशन का बोलबाला है। अभिभावकों की आय का एक बड़ा हिस्सा परीक्षा-पढ़ाई की फीस के साथ-साथ ट्युशन फीस पर भी खर्च हो रहा है।

इस स्थिति में बदलाव के लिए शिक्षकों की बहाली और सेवारत-शिक्षकों की अच्छी तैयारी को केंद्रीय महत्व देना होगा ताकि शिक्षक वर्तमान समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को तैयार करें। सब चलता है, वाले नज़रिये में बदलाव परीक्षा के संदर्भ में साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है, इसे पढ़ाई और क्लासरूम तक ले जाने की जरूरत है। अगर सरकार ऐसा करने में कामयाबी हासिल करती है तो प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था अपने अंधकार युग से नई रौशनी वाली राह पर कुछ क़दम जरूर आगे बढ़ेगी।

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