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अध्ययनः गणित विषय के शिक्षण को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए क्या करें?

इस आलेख का यह तीसरा और अंतिम भाग है। पहले दो भाग पढ़कर काफी लोगों ने सराहा , कुछ लोगों ने कमेंट भी किए थे। पहले भाग में ऑनलाइन पढ़ाना और पढ़ने को लेकर बात की गई थी। दूसरे भाग में सीखना क्या होता है, इंसान सीखते कैसे हैं, तमाम सीखने के सिद्धांत क्या है और उनका पढ़ाने की पद्धति में क्या निहितार्थ होता है,  इसको समझने की कोशिश की थी।

आलेख के इस आखरी हिस्से में तमाम शिक्षकों के साथ बातचीत के बाद वह गणित शिक्षण के बारे में क्या सोचते हैं , विषयवस्तु के आकलन के बारे में क्या सोचते हैं, इस सोच का उनके कक्षा में पढ़ाते समय क्या असर होता है इसका विश्लेषण किया है और अंत में स्थिति सुधारने हेतु कुछ सुझाव भी दिये है. यह आलेख उस थीसिस का हिस्सा है जो मैंने एम ए की पढाई करते वक्त इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन (यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन ) में सबमिट किया था। यह शोध छोटे स्तर पर किया गया एक गुणात्मक अध्ययन है। इस शोध अध्ययन का मुख्य उद्देश्य गणित विषय के शिक्षकों का निर्माणात्मक आकलन को लेकर नजरिया क्या है, इस बात को समझना था।

‘शिक्षण, मूल्यांकन व बच्चों का अधिगम स्तर’

मेरा शोध प्रश्न था, “प्राथमिक विद्यालयों में गणित पढ़ाने वाले शिक्षक सतत एवम व्यापक मूल्यांकन को अपने शिक्षण के तरीकों को बेहतर बनाने और बच्चों के अधिगम में बढ़ोत्तरी से कैसे जोड़कर देखते हैं। ” इस शोध से संबंधित सूचनाओं का संकलन छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में किया गया था। इसके लिए रायगढ़ जिले के कुल्बा संकुल में 12 शिक्षकों का चुनाव किया गया था। सूचनाओं का संकलन साक्षात्कार के माध्यम से किया गया। इसके लिए मैंने आकलन की रणनीतियों से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ों की भी समीक्षा की। इंटरप्रिटेटिव (व्याख्यात्मक ) अप्रोच का इस्तेमाल करते हुए साक्षात्कार के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। विश्लेषण के आधार पर छह थीम निकल कर आयी जिस पर मैंने विस्तार से लिखा है –

  1. विषय की प्रकृति और मूल्यांकन रणनीतियों पर इसका प्रभाव
  2. शिक्षकों की समझ कि बच्चे गणित कैसे सीखते हैं
  3. गणित सीखने के शिक्षकों के अपने अनुभव एवं उसका कक्षा कक्ष की गतिविधिओ पर प्रभाव
  4. शिक्षकों की निरंतर मूल्यांकन की समझ
  5. फीडबैक का उपयोग सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में सुधार के लिए
  6. उचित प्रशिक्षण और निरंतर शैक्षणिक सहायता की आवश्यकता

विषय की प्रकृति और मूल्यांकन रणनीतियों पर इसका प्रभाव

विषय की प्रकृति का, मूल्यांकन की रणनीति अपनाने पर प्रभाव पड़ता है। जो सिखाया गया है उसका मूल्यांकन करने के तरीकों पर निर्णय लेने में बहुत सारे मुद्दों की एक पूरी श्रृंखला शामिल होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मूल्यांकन किसका करना है, मूल्यांकन की विषयवस्तु क्या है; यदि शिक्षक इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है तो वह उचित रणनीति बना सकता है। गणित जैसे विषय में, शिक्षक को अच्छी तरह से अवगत होना चाहिए कि उसे सिर्फ मानक एल्गोरिदम और प्रक्रियाओं को समझने में बच्चों की मदद करने के बजाय, बच्चों की समझ का मूल्यांकन करना चाहिए। यदि छात्र इस बात का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि वे समस्या का समाधान निकालने के लिए विशेष तरीके या प्रक्रिया क्यों लागू कर रहे हैं? तो सिर्फ विद्यार्थियों की किताबों में टिक और क्रॉस लगाने से बच्चों की पढ़ाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह शिक्षक को चिंतनशील बनाने में और शिक्षण रणनीति में सुधार करने मे कोई मदद नहीं करेगा।

 

गणित जैसे विषयों में, अनुभव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है; यदि बच्चों के पास अनुभव है, तो उनके लिए समझ के साथ अमूर्त अवधारणाओं को समझना आसान होगा। एक शिक्षक ने मुझे उदाहरण देकर उद्धृत किया: “मैं जो सुनता हूं, मैं भूल जाता हूं। मैं जो देखता हूं, मुझे याद है। मैं जो करता हूं, मैं समझता हूं।” आप जानते हैं कि बच्चे अनुभव के साथ सीखते हैं, केवल कुछ शिक्षकों ने इस पहलू पर जोर दिया कि यदि अधिक से अधिक अनुभव दिया जाता है, तो बच्चे आसानी से सीख सकते हैं, हालांकि शिक्षकों का एक समूह था, जिन्होंने कहा कि बच्चे तब सीखते है जब वे प्रेरित होते हैं और उन्हें स्नेह के साथ फीडबैक प्राप्त होता है , बच्चे उन पर भरोसा करने लगते हैं। यह विश्वास है जो उन्हें अच्छी तरह से सीखने में मदत करता है, हालांकि, सिर्फ यही पूरी बात नहीं है, साथ ही इस शिक्षक को उस व्यापक ढांचे के बारे में जानना होगा जिसके तहत वह बच्चों का मूल्यांकन कर रहा है (शिक्षक ई)

मैं शिक्षक ‘ई’ की बात से सहमत हूं कि अनुभव सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन अन्य पहलू भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, जैसे शिक्षक की प्रेरणा और विश्वास। इसके अलावा, हर अकादमिक शाखा की अपनी अलग प्रकृति होती है, जैसे की गणित, यही प्रकृति पढ़ाने के पद्धति एवम मूल्यांकन की रणनीतियों को तय करती है। गणित विषय में अमूर्त अवधारणाएं शामिल हैं, लेकिन उन अमूर्त अवधारणाओं को समझने के लिए बच्चों को ठोस वस्तुओं के साथ प्रारंभिक अनुभव की आवश्यकता होती है, जिसे तब विषय वस्तु को समझने में स्थानांतरित किया जाएगा। बच्चे को बुनियादी अवधारणाओं को सीखना चाहिए अन्यथा वह उच्च अवधारणाओं को नहीं समझ सकता है। शिक्षक ‘ई’ ने उपरोक्त उद्धरण में एक व्यापक रूपरेखा का उल्लेख किया है।

आगे के स्पष्टीकरण के लिए मैंने शिक्षक से पूछा कि ‘व्यापक ढांचे’से क्या मतलब है: मैंने उस प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया, जिसमें हमने इस बारे में चर्चा की थी कि हम मूल्यांकन के अपने तरीकों को कैसे सही ठहराते हैं। समूह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि शिक्षा के उद्देश्य और विषय की प्रकृति आपको उचित मूल्यांकन रणनीति तय करने में मदद करती है।(शिक्षक ई)

मेरे लिए यह जानना काफी दिलचस्प था कि शिक्षक के दिमाग में किसी तरह की व्यापक रूपरेखा होती है जब वह पढ़ाता है। व्यापक रूपरेखा से मेरा तात्पर्य यह है कि वह गणित को क्यों पढ़ाये, इन कारणों से भली-भांति अवगत है। वह जानता है कि शिक्षार्थी की समझ में सुधार के लिए गणित पढ़ा रहा है, और इससे उसे शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी पढ़ाने की योजना बनाने में मदत मिलती है। इसके अलावा, शिक्षक की यह धारणा कि बच्चे गणित कैसे सीखते हैं, शिक्षण और मूल्यांकन की योजना पर भी प्रभाव डालती है।

शिक्षकों की धारणा कि बच्चे गणित कैसे सीखते हैं

बच्चों के गणित सीखने के तरीके के बारे में शिक्षकों की अलग-अलग तरह की धारणाएँ हैं और उनका उचित मूल्यांकन के तरीकों के चयन और बच्चों को समझने में काफी प्रभाव पड़ता है। यह धारणा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उपस्थित होने या किसी विशेष शैक्षणिक पृष्ठभूमि के माध्यम से अपने स्वयं के अनुभवों का परिणाम हो सकता है। शिक्षक ‘एम’ ने कहा कि उन्होंने कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया था और काफी समय से खुद एक शिक्षक प्रशिक्षक थे। उन्होंने मूल्यांकन को इस रूप में माना :

मूल्यांकन कुछ ऐसा नहीं है जो शिक्षक को यह समझने में मदद करता है कि बच्चे ने सही किया या गलत, लेकिन यह समझने में मदद करता है कि बच्चा क्या जानता है और वह गलत क्यों कर रहा है। गणित जैसे विषय में शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि बच्चे गणित कैसे सीखते हैं। (शिक्षक एम )

शिक्षक एम के पास इस बारे में विचार हैं कि वह बच्चे का मूल्यांकन क्यों कर रहे हैं, यह विचार उसे यह तय करने में एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है कि बच्चे का मूल्यांकन करने के लिए कौन सी तकनीकें लागू की जाए और उन बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार के साथ-साथ शिक्षक एम स्वयं के अभ्यास में भी सुधार करने पर जोर देते है। गणित में “क्यों” को समझने के लिए, शिक्षक को गणितीय अवधारणाओं की पूरी समझ होनी चाहिए। तभी वह उन जटिल गणितीय विचारों को बच्चों को समझा पाता है। यह बताने के लिए कि वह क्या कह रहा था, उसने गणित की कक्षा के रोजमर्रा के अनुभव से एक उदाहरण दिया:

क्लासरूम का एक उदाहरण

एक कक्षा में मैं बच्चों की नोटबुक देख रहा था , मेरी नजर नीचे दिए गए उदाहरण पर पड़ी।
25

+36

511

मैंने तुरंत गलत x नहीं लगाया । मैंने बच्चे को पास बुलाया और उसके साथ बातचीत की । बातचीत कुछ इस तरह रही :

शिक्षक : यहां आओ और पढ़ो तुमने नोटबुक में क्या लिखा?
छात्र: पच्चीस प्लस छत्तीस , बराबर पाँच सौ ग्यारह
शिक्षक : बताओ दस प्लस दस कितने होते है ?
छात्र: बीस
शिक्षक: बीस प्लस बीस कितने होते है ?
छात्र: चालीस
शिक्षक: चालीस प्लस चालीस कितने होते है ?
छात्र: अस्सी

इस समय तक छात्र को एहसास हो गया कि उसने गणना में कुछ गलतियाँ की हैं, मैंने छात्र के साथ बात करना जारी रखा।

शिक्षक: आप 25 और 36 देख सकते हैं, दोनों 40 से छोटे हैं, अगर 40 प्लस 40 से 80  होते हैं, तो 25 प्लस 36 पाँच सौ ग्यारह नहीं हो सकते है
छात्र: हां, यह नहीं हो सकता, यह 80 से कम होना चाहिए
(शिक्षक एम )

मुझे लगता है कि मात्रा की यह समझ उस समस्या को समझने की शुरुआत है। शिक्षक एम ने छात्र को एक संख्या प्रणाली में समूहीकरण की अवधारणा को समझने में मदद की। इसके लिए उसे कुछ अवधारणाओं पर वापस जाने की आवश्यकता पड़ी। उसका मानना है कि गणित जैसे विषयों में यदि कोई बच्चा यह नहीं समझ पाया कि वह क्या कर रहा है, तो यह भविष्य में समस्याएं पैदा कर सकता है, वह विषय की प्रकृति के कारण गणित में उच्च अवधारणाओं को नहीं समझ सकता है जैसे की गणित में आगे बढ़ने से पहले हर कदम को समझना चाहिए यह गणित विषय की प्रकृति का अहम् हिस्सा है।

गणित सीखने के शिक्षकों के अपने अनुभव

गणित सीखने के शिक्षकों के स्वयं के अनुभवों का कक्षा में उनके द्वारा की गयी गतिविधियों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उनका पढ़ाना उनके बचपन में हुए स्वयं के अनुभवों से प्रभावित होता है। उनकी यह धारणा की एक बच्चा गणित कैसे सीखता है, उनका पढ़ाना एवं उसके मूल्यांकन को प्रभावित करता है। व्यक्ति जो सोचता है उसका प्रभाव, वह जो कर रहा है उस पर पड़ता है। शिक्षक ‘एल’ का कथन इसका अच्छा उदाहरण है

“अब कोई डर नहीं है, कोई पास-फेल नहीं है, जब हम बच्चे थे, हमारे शिक्षक हमें मारते थे और तभी बच्चे ठीक से सीखते थे, लेकिन अब यह मामला नहीं है, नीति बदल रही है, कोई भी बच्चे को दंडित नहीं कर सकता। आप मुझे बताओ इस तरह से बच्चे कैसे सीख सकते हैं, और गणित सीखना तो वैसे ही मुश्किल है, उसे केवल भय और ड्रिल के साथ समझा जा सकता है (शिक्षक एल)”

उपरोक्त उद्धरण से यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षक रट्टा मारकर गणित सीखने में विश्वास करते हैं और गणित में बच्चों के प्रदर्शन को सुधारने में सजा के डर का उपयोग करते हैं। इसी तरह की राय शिक्षक ‘एम’ द्वारा भी व्यक्त की गई थी:

लेकिन अब यह माना जाता है कि डर सीखने की प्रक्रिया को बाधित करता है बजाय इसमें वृद्धि करने के (एन. सी. एफ २००५, पेज. ४२)। शिक्षक अपने स्वयं के जीवन के अनुभव का उपयोग अपने पाठ की योजना बनाने के लिए कर रहा है, एक बच्चा गणित कैसे सीखता है, इसकी, शिक्षक की पूरी समझ उसके बच्चे होने पर जो गणित सीखने के अनुभव उसे मिले उस पर आधारित है। पढ़ाने और सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए इस तरह के अभ्यास को बदलने की आवश्यकता है। यह पूर्व-सेवा और इन-सर्विस प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण देकर किया जा सकता है। शिक्षक जे ने अपनी राय व्यक्त की जो शिक्षक एल और एम द्वारा दिए गए उपरोक्त कथन के विपरीत थी; इस शिक्षक की गणित की पृष्ठभूमि (गणित में बी.एससी) है। यह इस तरह से उनकी सोच का कारण हो सकता है कि एक बच्चा गणित कैसे सीखता है।

गणित ड्रिलिंग का विषय नहीं है, ड्रिलिंग केवल यांत्रिक रूप से सीखने में मदद करती है, निचे दिए गए उदाहरण में छात्र को यह पता ही नहीं है कि वह क्या कर रहा है। वह सिर्फ तथ्यों को याद कर रहा है और सवाल हल करता जा रहा है। अगर कोई उसे पूछेगा कि ऐसा क्यों हो रहा है? आपने इसे इस तरह क्यों हल किया तो छात्र इसके पीछे का कारण नहीं बता पाएंगे। (शिक्षक जे)

कक्षा-कक्ष में गणित शिक्षण की वास्तविक स्थिति

शिक्षक ने कक्षा के अनुभव से एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट किया। उन्होंने अपने कक्षा के अनुभवों में से एक को विस्तृत किया:

यदि बच्चा इस तरह के योगों के बहुत सारे अभ्यास कर रहा है
25 + 97 = 112; 25 + 99 = 124

या गुणा कर रहा है
25

× 33

75

+75×

825x

यदि आप बच्चे से पूछेंगे कि वह 5 के नीचे X या ० क्यों लिख रहा है, तो वह उत्तर दे सकता है कि मुझे नहीं पता, यहाँ ‘X’ लिखने की परंपरा है, जब हम गुणा कर रहे होते हैं तो शिक्षक हमसे ऐसा ही करने के लिए कहते है, यदि आप आगे और पूछेंगे क्या ‘X’ का दोनों स्थानों पर एक ही अर्थ है ? विद्यार्थी भ्रमित हो जाएगा। (शिक्षक जे)

उपरोक्त उदाहरण में, यह पूरी तरह से बच्चों की गलती नहीं है, जिस तरह से शिक्षक बच्चों का मूल्यांकन कर रहे हैं, उसमें बच्चों को पास बुलाना और उनसे बातचीत करना और सवाल पूछना शामिल नहीं है (ऑनलाइन टीचिंग ने इन सम्भावनाओ को और दूर तक धकेल दिया है )। यह तभी संभव है जब शिक्षक बच्चे को ठीक से समझें और उसके साथ सहृदयता से संबंध बनाए। स्कूल में, दबाव सिर्फ इस बात पर है कि इसे कैसे किया जाए और एकल उत्तर तक पहुंचने के लिए मानक एल्गोरिथ्म का पालन किया जाए। गणित जैसे विषयों में, शिक्षक को पूरी कक्षा को संबोधित करने की बजाय एक एक छात्र के साथ बातचीत करने की आवश्यकता होती है, क्योंकि सभी को एक ही समस्या नहीं हो सकती है, बच्चों को अलग-अलग समस्याएं हो सकती हैं।

फीडबैक का उपयोग सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में सुधार के लिए

फीडबैक शिक्षकों और छात्रों दोनों को उनके शिक्षण और सीखने में सुधार करने में मदद करता है। यह शिक्षकों को यह समझने में मदद करता है कि छात्र कहाँ खड़ा है और वांछित स्तर को प्राप्त करने के लिए उसे क्या करने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों को फीडबैक देने के लिए, शिक्षक को छात्र को अच्छी तरह से जानना होगा। केवल टिक्स (√) और क्रॉस (X) डालकर काम नहीं चलेगा, शिक्षक को इससे अधिक करने की आवश्यकता है। हमेशा ऐसा नहीं होता है कि फीडबैक दिए जाने के बाद, बच्चे सीखेंगे ही, शिक्षक को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे ने समझ के साथ सीखा है।

विद्यार्थियों को उनके नोटबुक्स में जो कुछ दिखाई देता है, वह टिक्स (√) और क्रॉस (X), ग्रेड, संख्या, प्रशंसात्मक और उत्साहजनक टिप्पणियों की एक श्रृंखला है। वे अपने सीखने में आगे बढ़ने के लिए इनका उपयोग कैसे कर सकते हैं? जब तक विद्यार्थियों की वर्तमान सीखने और सफलता के वांछित स्तर के बीच अंतर के बारे में जानकारी का उपयोग इसे ख़त्म करने के लिए नहीं किया जाता है, यह फीडबैक नहीं है। सीखने के लिए, सीखने के अंतराल को स्थापित करने के लिए चिह्नित कार्य की व्याख्या करना और यह जानना आवश्यक है कि किस प्रकार के अगले चरणों की आवश्यकता है सीखने के अंतराल को पाटने के लिए ।

मैं नियमित रूप से नोटबुक्स की जांच करता हूं और उस पर फीडबैक देता हूं। मैं टिक्स और क्रॉस (√, X) लगाकर सही और गलत के रूप में फीडबैक प्रदान करता हूं। कभी-कभी मैं प्रेरक टिप्पणियां भी लिखता हूं जैसे – ‘अच्छा ’, ‘बहुत अच्छा’, ‘इसे बनाए रखना’,’ अद्भुत’, ‘घटिया’ , ‘सुधार की जरूरत’, सही पद्धति का पालन करो’ और इसके साथ अपना हस्ताक्षर भी करता हूं , वह भी लाल स्याही वाले पेन से। छात्रों को खुशी महसूस होती है कि उनके शिक्षक ने नोटबुक में ‘अच्छा’लिखा है। (शिक्षक आय )

इस तरह का फीडबैक छात्रों के सीखने में सुधार के लिए सहायक नहीं हो सकता है, क्योंकि यह नहीं बताता है कि क्या सुधार की कोई गुंजाइश है।

इस उदाहरण में छात्र इस तरह ½ + ½ = 2/4 गलती करता है, तो शिक्षक इस पर ‘X ’लगाता है। साथ ही ‘खराब’ ’या ‘सुधार की आवश्यकता’ इस तरह की टिप्पणी लिखता है।

क्या इससे छात्र को सीखने में सुधार करने में मदद मिलेगी? दूसरे शब्दों में, क्या यह शिक्षक को अपने पढ़ाने के तरीकों को बेहतर बनाने में कोई मदद करेगा? उपरोक्त मामले में, बच्चे ने गलती की है, लेकिन उसने एक नियम-बद्ध गलती की है। छात्र ने उपरोक्त योग को हल करने के लिए प्राकृतिक संख्याओं के अपने ज्ञान का उपयोग किया है। उपरोक्त स्थिति में शिक्षक एक अच्छे सूत्रधार की भूमिका निभा सकता है, लेकिन फिर उसे बच्चे को बुलाने की जरूरत है और उसके साथ बातचीत करने की आवश्यकता है और इसके लिए शिक्षक को खुद अवधारणा को अच्छी तरह से जानना होगा। शिक्षक जे ने इस बात पर जोर देकर कहा:

मैं आमतौर पर अपने काम को साप्ताहिक रूप से इकट्ठा करता हूं, और पूरी तरह से इससे गुजरता हूं। मैं उन छात्रों को वर्गीकृत करने की कोशिश करता हूं जो अवधारणा को ठीक से समझते हैं, और जो नहीं समझते हैं। वह मेरी टीचिंग प्लान का एक हिस्सा बन जाता है। उस हिसाब से मैं मेरी रणनीति तय करता हूं कि उनकी नोटबुक पर कोई टिप्पणी लिखने के बजाय दूसरे समूह को अवधारणाओं को समझाने की कोशिश करता हु। जहा तक हो सके मैं कक्षा में ही समस्या को हल करने की कोशिश करता हूँ। इसके लिए मै तिमाही या छमाई परीक्षा का इंतजार नहीं करता। यह वास्तव में मददगार साबित होता है, क्योंकि गणित जैसे विषय में छात्रों को आगे बढ़ने से पहले प्रत्येक अवधारणा को ठीक से समझना होगा। अन्यथा वे उच्च अवधारणाओं को नहीं समझेंगे। (शिक्षक जे)

यहां शिक्षक इस तथ्य से अच्छी तरह से अवगत है कि गणित जैसे विषय में, वह बच्चों की समझ में सुधार के लिए फीडबैक प्रदान करने के लिए परीक्षा या वर्ष के अंत की परीक्षा का इंतजार नहीं कर सकता। इसके अलावा, शिक्षक इस तथ्य पर भी जोर देता है कि गणित में गलती को सुधारने के लिए तत्काल फीडबैक देने की आवश्यकता है, अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो बच्चों के लिए उच्च अवधारणाओं को समझना मुश्किल हो जाएगा। यहां शिक्षक विषय की प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ है, और जानता है कि यदि फीडबैक प्रदान नहीं किया जाता है तो बच्चे को इससे संबंधित अन्य अवधारणाओं को सीखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। उपर्युक्त कथन में, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है की शिक्षक अपने कक्षा कक्ष के अनुभवों पर चिंतनशील होकर अपने पाठ की योजना बना रहा है। इससे शिक्षक को पढाने की योजना तैयार करने और अवधारणाओं के बारे में छात्रों की समझ के आधार पर कक्षा को पुनर्गठित करने में मदद मिलती है। शिक्षक एम ने अपनी पढ़ाने के प्रक्रिया में सुधार और बच्चों के सीखने में सुधार के लिए निरंतर मूल्यांकन का उपयोग करने की समान राय व्यक्त की:

मैं आपको मेरी कक्षा से एक उदाहरण दे रहा हूं कि मैं निरंतर मूल्यांकन कैसे लागू करता हूं। मैं छात्रों को आमने-सामने फीडबैक देता हूँ, ना की पूरी कक्षा को। आजकल, मैं बच्चों के साथ नियमित बातचीत पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं। मैं उनके साथ बात करता हूं और बताता कि क्या सही और क्या गलत था, न कि केवल छात्रों की नोटबुक में टिक (√) (X) लगाता। मैं बच्चों को पास बुलाता हूं, उन्हें समूह कार्य, व्यक्तिगत कार्य करने के लिए कहता हु । उनको मौखिक प्रश्न पूछता हु , उन्हें पहेली हल करने कहता हु। मैं उनसे केवल जवाब देने के बजाय सवाल पूछने पर भी जोर देता हूं। एक और बात मै सुनिश्चित करता हूँ कि वे जो भी करें, लेकिन वे समझे की वे क्या कर रहे हैं, इसके लिए मैं उनसे पूछता रहता हूं कि योग , गुणा  और भाग उसी तरीके से क्यों हल किया जाता है? एल्गोरिथ्म इसी तरह से कैसे काम करता है? (शिक्षक एम )

शिक्षक के मन में होने वाले बदलाव हैं महत्वपूर्ण

उपर्युक्त कथन इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह दर्शाता है कि शिक्षक एम के मन में परिवर्तन हो रहा है। अब शिक्षक एम ने विद्यार्थियों के साथ व्यक्तिगत बातचीत के साथ-साथ फीडबैक के मूल्य की सराहना करना शुरू कर दिया है और उन्हें वह एक समूह जैसा नहीं मान रहे हैं। शिक्षक एम ने इस तथ्य पर जोर दिया कि वह सुनिश्चित कर रहा है कि बच्चे समझदारी से सीखें न कि यंत्रवत तरीके से। ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षक एम इस तथ्य से अच्छी तरह से अवगत हैं कि गणित में आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है की बच्चों ने अवधारणा वाली समझ के साथ सीख ली है।

शिक्षक एम ने इस तथ्य पर भी जोर दिया की वे यह सुनिश्चित करते है की बच्चे को इस बात का पता होना चाहिए कि वह क्या कर रहा है और वह ऐसा क्यों कर रहा है। यह एक ऐसा गुण है जो लोकतांत्रिक समाज में आवश्यक है। शिक्षक एम ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि वह बच्चे को पास बुलाता है और उसके साथ व्यक्तिगत बातचीत करता है, जो कि निरंतर मूल्यमापन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। बच्चे को ठोस फीडबैक प्रदान करने और उसे सीखने में सुधार करने में मदद करने के लिए बच्चे को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है। यह इस धारणा पर आधारित है कि हर बच्चा गणित सीख सकता है बशर्ते उसे प्यार और देखभाल के साथ उचित सहायता मिले।

जैसे-जैसे “सीखना” क्या है इसको देखने का नजरिया बदला है, वैसे-वैसे फीडबैक स्टाइल भी। सीखने के सह-निर्माणवादी मॉडल में, चिंतनशील प्रक्रियाएं, महत्वपूर्ण जांच, विश्लेषण, व्याख्या और ज्ञान का पुनर्गठन शामिल है। सह-रचनावादी मॉडल में, फीडबैक सीखने का एक अभिन्न हिस्सा है: इसे बेहतर तरीके से संवाद के रूप में वर्णित किया जा सकता है, न कि किसी श्रेणीबद्ध संबंध में किसी श्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा दी गई चीज के रूप में, बल्कि संवाद और जानकारी के माध्यम से निर्मित किया जाता है। यह दृष्टिकोण इस बात से कम चिंतित है कि एक छात्र ने अच्छा किया या बुरी तरह से, लेकिन शिक्षक और छात्र के बीच संवाद बनाने के बारे में प्रयासरत है, जो की बराबर का है, जिसमें दोनों को एक दूसरे से सीखने की उम्मीद है।

उचित प्रशिक्षण और निरंतर शैक्षणिक सहायता की आवश्यकता

किसी भी प्रकार के परिवर्तन को उन लोगों द्वारा समझने की आवश्यकता है जो इसे लागू करने जा रहे हैं। इस तरह गणित सीखने एवं सिखाने लिए मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है और उसके बाद ही इसके प्रभाव देख सकेंगे। रचनावादी दृष्टिकोण से सीखने को समझना होगा, जिसमे शिक्षक सूत्रधार की तरह होगा वह नहीं जो ज्ञान दे रहा है। ऐसा करने के लिए मूल्यांकन के विभिन्न तरीकों का उपयोग करने की आवश्यकता है जैसे सीखने के लिए खोजी दृष्टिकोण एवं कौशल, ज्ञान और समझ का अनुप्रयोग। इस तरह के बदलाव में, आज के तेजी से बदलाव की दुनिया में ‘रोट मेमोराइजेशन’ का कोई स्थान नहीं है। इसके बजाय, समझ, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन और निर्माण अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। शिक्षकों को लगता है कि बच्चों में इन कौशलों को बेहतर बनाने के लिए, उन्हें अकादमिक समर्थन प्राप्त होना चाहिए, जो उन्हें सरकारी आदेशों का पालन करने के बजाय निर्णय लेने के लिए स्वायत्त बना देगा !!!!

हर बार सरकार नई चीजों को पेश करती है, लेकिन बदलाव को लागू करने के लिए आवश्यक कौशल हासिल करने के लिए पर्याप्त रूप से संसाधन उपलब्ध नहीं कराती है, बस इस उदाहरण को लें, यह परिवर्तन अचानक आया है और हमें नए मूल्यांकन का पालन करने की आवश्यकता है, जो हम कर रहे थे, हम में से कई भ्रमित थे कि क्या और कैसे करें, मैं प्रारूप का इंतजार कर रहा हूं … (शिक्षक ए)

मुझे लगता है कि शुरू किए गए परिवर्तन कोई भी वांछित परिणाम नहीं लाएंगे जब तक कि शिक्षकों को ठीक से प्रशिक्षित नहीं किया जाता है और इन-सर्विस प्रशिक्षण के माध्यम से निरंतर समर्थन दिया जाता। जब नए बदलाव पेश किए जाते हैं, तो पुराने तरीकों को अचानक छोड़ दिया जाता है। उदाहरण के लिए, शिक्षकों को अचानक समय के अंतराल पर छात्रों का मूल्यांकन बंद करने और निरंतर मूल्यांकन करने के लिए कहा जाता है, शिक्षको को विभाग से एक प्रारूप मिलता है और वह प्रारूप के अनुसार फॉर्म भरता है, जिसके बाद वह समझता है कि उसकी जिम्मेदारी खत्म हो गई है और वह यह नहीं सोचता कि बच्चे की पढ़ाई में सुधार हो रहा है या नहीं।

चूंकि परिवर्तन पेश किया गया है, मैं सिर्फ इस मूल्यांकन प्रणाली का नाम सुन रहा हूं, लेकिन वास्तव में नहीं जानता कि नई प्रणाली क्यों शुरू की गई है, जब पहले एक बेहतर परिणाम दे रही थी, अगर कोई परीक्षा नहीं होगी, तो बच्चो का सीखना कैसे होगा, प्रतियोगिता की भावना कैसे आएगी। यदि परीक्षा का डर नहीं रहेगा तो छात्र अध्ययन नहीं करेंगे। (शिक्षक सी)

उपरोक्त उद्धरण शिक्षक की परीक्षा प्रणाली, उसके लाभों और सीखने में बच्चों के सुधार के साथ इसके संबंध के बारे में गहरी धारणा को दर्शाता है। यदि शिक्षक के पास प्रशिक्षण सत्र में नए परिवर्तनों पर चर्चा करने का अवसर नहीं है, तो सभी प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। पूर्व-सेवा प्रशिक्षण में, शिक्षकों को गणित में निरंतर मूल्यांकन के लाभों पर चर्चा करने, इसके अंतर्निहित सिद्धांतों को समझने और नई प्रणाली के साथ मौजूदा प्रणाली की तुलना करने का अवसर दिया जाये। शिक्षक डी ने अपनी इच्छा इस प्रकार व्यक्त की:

गणित विषय में निरंतर और व्यापक रूप से मूल्यांकन करने के लिए शिक्षकों को अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें कुछ ठोस उदाहरणों दिए जाये जहां इस प्रणाली को लागू किया जाता है, ताकि हमें विश्वास हो जाए कि यह उचित है। (शिक्षक डी)

सिर्फ यह कैसे करना है, इस बारे में जानकारी प्रदान करना सहायक नहीं होगा। प्रशिक्षण में “विषय ज्ञान” या ‘शिक्षा-विज्ञान-संबंधी सामग्री’ पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक अपने विषय में निपुण नहीं है, जहां से शुरुआत हुई थी, वही वापस आ जायेगा उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक को गणितीय अवधारणाओं की पूरी समझ नहीं है, गणितीय ज्ञान क्या होता है , या गणित में समझना क्या है ये वो नहीं जनता, इस स्थिति में तो शिक्षक के लिए बच्चे को सीखने में सुधार करने में मदद करना आसान नहीं होगा।

मौजूदा ज्ञान के आधार के पर, गणित में निरंतर मूल्यांकन को लागू करना वास्तव में मुश्किल है, हमें कई पहलुओं जैसे कि गणितीय अवधारणाओं, अभिनव प्रश्न कैसे बनाएं या कैसे पूछें, मूल्यांकन में निष्पक्षता कैसे बनाए रखें, हर बच्चे को कैसे आश्वस्त करे कि वह गणित सीख सकता है यह सुनिश्चित करने के लिए अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। (शिक्षक सी)

मुझे लगता है कि इस तरह के बदलाव के लिए रणनीतियों के उचित प्रचार-प्रसार की आवश्यकता होती है। शिक्षकों ने भी इच्छा व्यक्त की, कि बच्चों के सीखने के स्तर और उनके स्वयं के पढ़ाने के तरीको में वांछित परिवर्तन लाने के लिए उन्हें ठीक से प्रशिक्षित किया जाए। उनमें से अधिकांश ने अपने पढ़ाने के तरीको में सुधार करने और अपने अनुभवों पर चिंतन करने के लिए अंतिम परीक्षा के बजाय निरंतर मूल्यांकन की आवश्यकता को पहचाना ।

निष्कर्ष और सिफारिशें

शिक्षकों के साथ हुई मेरी बातचीत और उसके विश्लेषण से पता चलता है कि शिक्षकों को गणित में निरंतर मूल्यांकन और उनके पढ़ाने के तरीको में सुधार और बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार के लिए इसके उपयोग के बारे में कुछ समझ है। निष्कर्ष बताते हैं कि शिक्षक अपने पढ़ाने के तरीको पर चिंतन और सुधार के लिए मूल्यांकन के उपयोग का अनुभव करते हैं। कुछ विशिष्ट निष्कर्ष इस प्रकार हैं।

  1. सबसे पहले, सभी शिक्षक अपने सिखाने के तरीको को बेहतर बनाने के लिए मूल्यांकन उपकरणों का उपयोग करते हैं, हालाँकि वे इसे अलग तरह से समझते हैं और यह अंतर उनके विश्वास के कारण है जो सीखने को वो क्या समझते है, गणित में समझना मतलब क्या है और गणित सीखने के उनके अपने अनुभवों कैसे रहे हैं।
  2. दूसरा, बातचीत में एक चीज उभरकर सामने आई वह ये की शिक्षक गणित में बच्चों के सीखने को सुनिश्चित करने के लिए फीडबैक का विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करते हैं। उन्होंने इस तथ्य को भी साझा किया कि फीडबैक देने के लिए उन्हें बच्चे को अच्छी तरह से समझने की आवश्यकता है और कक्षा के अनुभव पर वापस चिंतन करने की आवश्यकता पड़ती है और, विशेष रूप से इस संदर्भ में कि वे अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर रहे हैं, और इसे वे कैसे सुधार कर सकते हैं।
  3. तीसरा, बातचीत इस तथ्य का भी खुलासा करती है कि कुछ शिक्षक शिक्षा के उद्देश्य, विषयवस्तु की प्रकृति और मूल्यांकन में इसके निहितार्थ को समझते हैं। मुझे लगता है कि यह एक सकारात्मक विकास है जो उन्हें मूल्यांकन रणनीतियों के बारे में निर्णय लेने और उन्हें उचित ठहराने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है।
  4. चौथा, एक बात ये भी सामने आई की शिक्षकों को गणित विषय में निरंतर मूल्यांकन के बारे में कुछ चिंताएं हैं कि यह उनके कार्यभार को बढ़ाएगा, हालाँकि, कुछ शिक्षक इसे एक सकारात्मक कदम मानते हैं जो उन्हें लगता है कि इससे उनके पढ़ाने के ढंग और बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार होगा।
  5. पांचवीं बात जो विश्लेषण के आधार पर सामने आई, शिक्षक निरंतर शैक्षणिक सहायता, पूर्व-सेवा के साथ-साथ, सेवा में भी उम्मीद करते हैं, जिसमें वे मूल्यांकन रणनीतियों में विशेषज्ञता हासिल करने की उम्मीद करते हैं।

मौजूदा स्थिति में सुधार की बहुत गुंजाइश है, हालाँकि, इसके लिए राज्य, स्कूल और शिक्षकों के स्तर पर मानसिकता में पूर्ण बदलाव की आवश्यकता है। एनईपी- 2020 भारत के शिक्षा सुधारों में से एक प्रमुख मील का पत्थर है, जिसमें शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने से आगे की बात की गयी जो की है शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना। शिक्षा निति में कहा गया है गवर्नमेंट फॉउण्डेशनल लिटरेसी एवं न्युमरेसी (FLN) मिशन का गठन करेगा जिसका मुख्य उद्देश्य होगा २०२५ तक सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता (समझ के साथ पढ़ना और बुनियादी गणित) को प्राप्त करना।

यह आलेख मिशन में गणित विषय में योगदान करने की क्षमता रखता है। इस मिशन को प्राप्त करने के लिए शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि उनके प्रशिक्षण मॉड्यूल में मानव और समाज की प्रकृति, मानव समझ की प्रकृति, इंसान कैसे सीखते, गणित क्या है है इसके संदर्भ का गहन अध्ययन शामिल होना चाहिए। यह संभवतः उन्हें महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करेगा, और अन्य तरीकों से उन्हें स्वायत्त बनाते हुए और आश्वस्त करेगा।

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(लेखक गजेन्द्र राउत शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 14 सालों से काम कर रहे हैं। ‘जिज्ञासा इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग एण्ड डेवेलपमेंट’ जो महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित है, उसके संस्थापक हैं। एजुकेशन मिरर की ‘कोर टीम’ का हिस्सा हैं। आपने दिगंतर, रूम टू रीड, टाटा ट्रस्ट्स के पराग इनीशिएटिव (प्रोग्राम मैनेजर लाइब्रेरीज़) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में काम किया है। इसके साथ ही साथ राजस्थान और छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों के लिए गणित विषय की पाठ्यपुस्तकों को लिखने में भी योगदान दिया है। लंदन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूटऑफ एजुकेशन से एमए (करिकुलम, पेडागॉडी एण्ड असेसमेंट) किया है। इस लेख को पढ़िए और अपने सुझाव व विचारों को टिप्पणी के रूप में जरूर लिखें।)

5 Comments on अध्ययनः गणित विषय के शिक्षण को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए क्या करें?

  1. Shruti Tupat // March 24, 2021 at 1:07 pm //

    “मैं जो सुनता हूं, मैं भूल जाता हूं। मैं जो देखता हूं, मुझे याद है। मैं जो करता हूं, मैं समझता हूं।” सच में

  2. Anonymous // March 21, 2021 at 4:19 pm //

    Good to read

  3. Pranali Garud // March 16, 2021 at 1:13 am //

    Great insightful article

  4. Anonymous // March 15, 2021 at 8:14 pm //

    बहुत ही अच्छा
    शिक्षक और छात्र दोनो के लिये उपयुक्त
    👌👌👌👌

  5. Anonymous // March 15, 2021 at 4:25 pm //

    जिस जमिनी वास्तविकता से गजेंद्र जी ने इसे साझा किया है, मुझे लगता है की इस लेख मे दिए गए नूख्खों का अगर विद्यालयों मे इस्तमाल किया जाए तो, शिक्षक और छात्रों के बीच आनेवाले उन सभी गणितीय अन्तर को आसानी से मिटाया जा सकता है।
    सच मे गजेंद्र जी ने इसे बहुतही सजगता और बारीकी से इसे अनुभव किया है। असल मे आज शिक्षा के क्षेत्र मे गणित विषय के बारे मे इस तरह के experiment की बहूत जरूरी है।
    बहुतही अच्छा।
    सतिश पवार
    पिरामल फौंडेशन
    नंदूरबार /महाराष्ट्र

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