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भाषा शिक्षणः ‘मैंने पढ़ते-पढ़ते किताब पढ़ना सीख लिया’

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

बच्चों का शब्द भण्डार कैसे विकसित होता है।

कई सालों के लंबे अनुभव के बाद एक बात समझ में आई कि मैंने लिखते-लिखते ही लिखना सीखा। अब शिक्षा के क्षेत्र में एक सिद्धांत से सामना हो रहा है, जो कहता है कि बच्चे पढ़ते-पढ़ते पढ़ना सीख जाते हैं।

भाषा शिक्षण में उन तरीकों पर ग़ौर किया जाता है कि एक बच्चा पढ़ना-लिखना कैसे सीखता है। किसी बच्चे को पढ़ना-लिखना कैसे सिखाया जाये ताकि वह भाषा का समझ के साथ इस्तेमाल कर सके, यह सवाल भाषा शिक्षण से जुड़ा है।

पढ़ते-पढ़ते पढ़ना सीखने वाली बात का संदर्भ भाषा शिक्षण के ‘होल लैंग्वेज अप्रोच‘ से है। इसमें बच्चे शब्दों को पढ़ते हुए वर्णों को पहचानना सीख जाते हैं। इस तरह के शिक्षण में संदर्भ का काफी महत्व होता है। एक शिक्षक के लिए ऐसी कोशिश करना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि वे यह मानने के लिए कतई तैयार नहीं होंगे कि जो बच्चा सारे अक्षर और मात्रा नहीं पहचानता भला वह कैसे पढ़ पाएगा। वह तो केवल अनुमान भर लगा पाएगा, केवल अनुमान लगाने को तो हम पढ़ना नहीं मान सकते।

पढ़ने की प्रक्रिया में अनुमान का क्या महत्व है? इस सवाल पर अगर थोड़ी देर के लिए ग़ौर करें तो कह सकते हैं कि पढ़ने की पूरी प्रक्रिया ही तेज़ी से अनुमान लगाने और समझकर पढ़ने से है। हम पढ़ते समय अक्षरों और मात्राओं को अलग-अलग करके नहीं देखते। किसी शब्द रूपी दीवार में मात्राएं सीमेंट की तरह होती हैं और अक्षर ईटों की तरह से। मगर दोनों आपस में ऐसे जुड़े होते हैं कि बाहर से केवल दीवार दिखाई देती है। सीमेंट और ईटे अलग-अलग नज़र नहीं आतीं।

वर्ण और मात्राओं का रिश्ता

बच्चों को पढ़ना सिखाते समय हम बार-बार उनको ईटों और सीमेंट की तरफ देखना सिखाते हैं, यानी अक्षरों और मात्राओं की मौजूदगी के प्रति बार-बार उनको आगाह करते हैं। इसके कारण वे अटक-अटक कर पढ़ते हैं। ऐसे में पढ़ने का वास्तविक प्रवाह (फ्लो) कहीं खो जाता है। उस शब्द के अर्थ कहीं खो जाते हैं। वाक्य का अर्थ कहीं खो जाता है, और पढ़ने की पूरी प्रक्रिया एक निर्रथक कवायद बनकर रह जाती है। ऐसे में जरूरी है कि भाषा के किसी भी रूप को लिखित या मौखिक उसकी समग्रता में ही देखा जाए। वास्तविक जीवन में भाषा का इस्तेमाल हम कैसे करते हैं? यही उसके महत्व को रेखांकित करता है।

यों तो करते-करते सीख जाने वाली बात आसान सी है। मगर उतनी भी आसान नहीं है। यह सिलसिला लंबा होता है, कभी-कभी हमारा धैर्य भी जवाब देने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि बतौर शिक्षक अपना धैर्य बनाये रखें और बच्चों को भी सीखने के लिए प्रोत्साहित करते रहें। उनको जहां पर सीखने में दिक्कत हो रही है, वहां उनको सपोर्ट करते चलें। क्लासरूम के सवालों को नोट करते रहें और उनके समाधान के बारे में अन्य शिक्षक साथियों से विचार-विमर्श करें। ताकि अपने प्रयासों को समाधान की दिशा में आगे बढ़ा सकें।

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Virjesh Singh

प्रमोद जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपके सुझाव के लिए। किस प्रक्रिया से पढ़ाया जाये, इसके लिए भाषा से जुड़ी अन्य पोस्ट पढ़ सकते हैं। प्रक्रिया के सवाल पर कहना है कि होल लैंग्वेज अप्रोच या फोनिक्स अप्रोच दोनों का संतुलन अपनाते हुए बच्चों को पढ़ाया जा सकता है। वर्णों और मात्राओं से परिचित कराने के साथ-साथ सार्थक शब्दों से बच्चों को एक रिश्ता बनाने का मौका दिया जा सकता है, इसके साथ ही कहानी सुनने और कहानी पर चर्चा के माध्यम से बच्चों की सुनकर समझने वाली क्षमता का विकास किया जा सकता है। इस तरह की कोशिशें एक समय तक लगातार करने के बाद इसके परिणाम देखे जा सकते हैं। हमारी कोशिशों में एक बात साफ रहनी चाहिए कि हम बच्चों को अपना कांसेप्ट बनाने या अवधारणाओं के विकास के लिए उपयुक्त माहौल बनाएं तो उनको मदद मिलती है। इसके साथ ही बच्चों को बोलने का खूब मौका देना चाहिए ताकि वे छोटे-छोटे वाक्यों में सार्थक शब्दों के इस्तेमाल से अपनी बात सुगमता से कह सकें। इसके बारे में लिखते हैं,विस्तार से। पूरी प्रक्रिया को केवल एक पोस्ट में समेटना संभव नहीं है। इसलिए इसे अलग-अलग पोस्ट में विस्तार से साझा करने की कोशिश होगी।

अच्छा है ‚ अगर थोडा विस्तार होता कि कैसे ‚ किस प्रक्रिया से पढाया जाये तो बेहतर। क्योंकि अभी इस तरह की सामग्री का अभाव है।

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