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बच्चों को समझ के साथ पढ़ना सिखाने के लिए ‘टीचिंग प्रेक्टिस’ में क्या बदलाव करें?

जब हम भाषा को केवल विचारों के संप्रेषण का माध्यम भर मानते हैं तो यह भाषा का बहुत सीमित दायरा होता है। किसी भाषा शिक्षक के लिए भाषा शिक्षण का यह लक्ष्य हासिल करना, केवल एक छोटे से तालाब में बच्चों को तैरना सीखाने जैसा है। इसी कारण भाषा शिक्षक वर्ष भर कक्षाओं में डिकोडिंग की गतिविधियां करते नजर आते हैं और वर्ष के अंत में भी वे हताश होकर यह कहते दिखते हैं कि बच्चे तो पढ़ना नहीं सीख पा रहे।

स्वतंत्र पठन तक पहुंचने के लिए वे कक्षा को भाषा समृद्ध बनाने में जोर लगाते हैं , भाषा के प्रिंट के साथ बच्चों का बहुत सा अभ्यास (पठन, डिकोडिंग व लेखन का कार्य) कराते हैं, फिर भी एक कक्षा में अधिकतर बच्चे पढ़ना नहीं सीख पाते। यह तथ्य तब और भी अधिक पीड़ादाई होता है, जब हम हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी भाषा सीखाने का कार्य कर रहे होते हैं और बहुत से प्रयास के बाद भी आशा अनुरूप सफलता नहीं मिलती। वर्ष भर पढ़ाने के बाद यदि हम आकलन करें तो हम देखेंगे की क्षेत्रीय भाषा में कुशल संप्रेषण का कौशल तो बच्चा घर से ही सीख कर आ रहा है, तो वर्ष भर हमने क्या किया? केवल भाषा के लिखित रूप से परिचय कराने का प्रयास!

भाषा शिक्षण और बाल साहित्य

यहां हमें थोड़ा ठहरकर सोचना और समझना होगा कि किसी भाषा में लिखी सामग्री को भाषा पढ़ पाना,उस भाषा को बोल पाना और उस भाषा की सामग्री का सुनकर और पढ़कर आनंद ले पाना, यह परस्पर जुड़े हुए तीन अलग-अलग मुद्दे हैं। वर्तमान में सभी शिक्षण व शिक्षणेत्तर संस्थाओं का उद्देश्य भाषा के प्रवाहपूर्ण पठन के लक्ष्य को हासिल करने का है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भाषा अध्यापक के पास एक अदद पाठ्यपुस्तक होती है (कभी-कभी कार्य पुस्तिका भी) जिसमें लगभग 10 से 15 पाठ है और वर्ष के 12 महीना में शिक्षक को वे पाठ पढ़ाने होते हैं।

पाठ्य पुस्तकों की अपनी एक सीमा होती है, लेकिन यदि हम अपने आसपास के साहित्यिक संसार पर नजर डालें तो वर्तमान में अत्यंत समृद्ध बाल साहित्य (विशेष कर हिंदी भाषा में) उपलब्ध है। प्रभात, सुशील शुक्ल, प्रमोद पाठक जैसे अनेक साहित्यकार, प्लूटो,चकमक,साइकिल जैसी अनेक बाल पत्रिकाएं तथा एकलव्य, एकतारा, तूलिका, कथा, एनबीटी व सीबीटी जैसे अनेक प्रकाशक हैं जो बाल साहित्य को समृद्ध करने में लगातार परिश्रम कर रहे हैं।

कविताओं का रचनात्मक उपयोग

एक भाषा शिक्षक होने के नाते हमारा यह पहला दायित्व है कि हम इस रचना संसार में खूब यात्रा करें और पारंपरिक कहानियों कविताओं से आगे बढ़कर इस नवीन रचना संसार से बच्चों का परिचय कराएं।

यहाँ एक कविता को उदाहरण की तरह लेते हैं-

गाय ओ गाय , तू कहां गई थी
गाय ओ गाय , तू कहां गई थी
यही कहीं थी पास में
घास की तलाश में…

इस गीत को चूहे, बिल्ली, कुत्ते, हाथी, सांप, ऊंट, शेर, खरगोश और घोड़े इत्यादि के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ाया जा सकता है और नए-नए आशय/अर्थ और संदर्भ ग्रहण करते हुए कक्षा-कक्ष का वातावरण रचनात्मक और आनंदमय बनाया जा सकता है।

यहां ऐसे सैकड़ो उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन जरूरत है कि हम स्वयं एक खोजी वृत्ति अपनाएं और अपने बच्चों की चेष्टा अनुसार (उनकी जिज्ञासा को प्रोत्साहित करने वाली) सामग्री ढूंढे,उनसे स्वयं परिचित होते हुए उनका कक्ष में खूब प्रयोग करें ।

सुनने के आनंद से परिचित कराते हैं गीत

यहाँ पर संदर्भ के लिए प्रभात जी का लिखा एक गीत उद्धृत है-

जलेबी चौक की जलेबी मशहूर है
जलेबी चौक तो बड़ी ही दूर है
जलेबी चौक हम छुट्टी के दिन जाएंगे
जलेबी चौक से जलेबी खाकर आएंगे

यह गीत मेरी भाषा कक्षा में लगभग प्रतिदिन होता है। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि बच्चों को इसे बार-बार सुनने में बहुत मजा आता है। आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि अच्छा तो इससे भाषा शिक्षण के कौन से उद्देश्य पूरे हो रहे हैं? मैं इस बारे में ज्यादा तो क्या कहूं? पर एक बात जरूर होती है कि इससे बच्चों का भाषा के प्रति लगाव बढ़ रहा है और नए गीत सुनने-सीखने की समझ विकसित हो रही है। भाषा की नई नई रचनाओं के प्रति उनकी ग्राह्यता बढी है और यही तो भाषा की असली समझ है।

ओह अच्छा। तब तो यह कह सकते हैं कि बच्चों को 10- 20 बाल गीत और कुछ कहानियों को सुना कर रटाकर भाषा शिक्षक भाषा के प्रति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। नहीं, ऐसा अर्थ लगाना तो फिर से दायरे को संकुचित कर देना है।

भाषा शिक्षण का एक उद्देश्य ‘मौलिक लेखन’ है

एक शिक्षक के रूप में हमें अपने भाषा शिक्षण का लक्ष्य स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए। बच्चों को भाषा के विभिन्न रूपों (विधाओं) को स्वयं से पढ़ने-समझने व चर्चा करने में मजा आए और उनमें रचनात्मकता के बोए गए बीजों की फसल इस तरह पनपे कि वह स्वयं कुछ लाइन जोड़कर कुछ सार्थक बनाने लग जाएं। भाषा शिक्षण का महत्वपूर्ण उद्देश्य रचनात्मक लेखन और मौलिक लेखन है, जिसमें अपने मुद्दे चुनना, अपने जीवन में झांक पाना और अपनी बातों को एक प्रभावी तरीके से साझा कर पाना शामिल है। ओह!तो क्या कक्षा एक और दो के बच्चों के साथ यह लक्ष्य हासिल हो सकते हैं? कठिन तो है,पर उतना ही सरल भी।

लिख पाने का अर्थ सिर्फ वर्तनी लिखने से नहीं अपितु रचनात्मक लेखन का अर्थ रचनात्मक समझ विकसित करते हुए रचनात्मक गढ़ने से तो है ही। उदाहरण के तौर पर बच्चे की कल्पनाशीलता को पंख मिले और वे दिए गए दो-तीन पात्रों का प्रयोग करके कोई कहानी या गीत गढ़ लें और उसी समय उसके साथी उसकी बनाई कहानी में कुछ उतार-चढ़ाव या बदलाव करके उसे एक नए रूप में प्रस्तुत कर दें या उसे कहानी पूर्ण करने में मदद कर दें तो ऐसा माना जा सकता है कि कक्षा के छात्रों में भाषा के प्रति समझ विकसित हो रही है।

मुर्गा और लोमड़ी कहानी का रोल प्ले करते हुए बच्चे।

भाषा शिक्षण को सार्थक बनाने के लिए साहित्य से दोस्ती है जरूरी

भाषा शिक्षक को यह कार्य बहुत आनंद देने वाला है, मगर शर्त है कि यह कार्य हमें बहुत धैर्य पूर्वक करना होगा। बाल साहित्य से दोस्ती के बिना भाषा शिक्षण के काम को सार्थकता नहीं दी जाती है, इसलिए स्वयं के पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी और उसका विस्तार बच्चों के बीच करना होगा। समग्रता में होने वाले ऐसे प्रयास से आप बच्चों में धारा प्रवाह और समझ के साथ पढ़ने के अपेक्षित लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे और साथ-साथ बच्चों की सृजनात्मक क्षमता (बोलकर, लिखकर और किसी लिखित सामग्री को पढ़कर अपने विचार साझा कर पाने की योग्यता) का भी विकास कर पाएंगे जो किसी भी भाषा के सीखने और उसमें प्रगति का एक महत्वपूर्ण सूचक है।

(लेखक परिचय: जय शेखर जी उत्तर प्रदेश के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में कार्य कर रहे हैं। पुस्तकालय, भाषा शिक्षण और बच्चों को दीवार पत्रिका ‘तितली’ के माध्यम से उनके रचनात्मक योगदान का सिलसिला सतत जारी है। उन्होंने इस लेख में अपने अनुभवों के साथ-साथ भाषा शिक्षण की उन विसंगतियों की तरफ भी ध्यान दिलाया है जिसमें सुधार की जरूरत है।)

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