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प्रारंभिक शिक्षा में क्या गुल खिलाएगी ‘टेक्नॉलजी’?

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।



राजस्थान के एक स्कूल में किताब पढ़ते बच्चे।

हम एक अद्भुत दुनिया में रह रहे हैं। यहां पर कुछ लोग वास्तविक गांवों को मिटाने और डिजिटल विलेज बसाने की बात करते हैं। 

भारत में चुनिंदा टेक्नोक्रेट चाहते हैं कि प्रायमरी एज्यूकेशन पर उनका कब्जा हो जाए और टीचर की जगह टेक्नॉलजी को रिप्लेस कर दिया जाए। 

मगर यह बात सौ फ़ीसदी सच है कि कोई तकनीक एक अच्छे टीचर की जगह कभी भी नहीं ले सकती।

भारत में इंटरनेशनल सेमीनार के नाम पर शब्दावाली का एक खेल हो रहा है, इस सेमीनार में हिस्सा लेने वाले लोग गाँव के स्कूलों की ज़मीनी वास्तविकताओं से अनभिज्ञ हैं।

लेकिन स्कूल में इंटरनेट, वीडियो और स्मार्टफ़ोन पर इस्तेमाल होने वाले सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करने की बहुत सी मनगढ़ंत वजहें गिनाते वक़्त उका आत्मविश्वास देखने लायक होता है।

शिक्षक और टेक्नॉलजी 

हालांकि स्कूल में टेक्नॉलजी को बढ़ावा देने वाले कुछ समर्थक स्वीकार करते हैं कि तकनीक शिक्षक के सहायक की भूमिका निभा सकती है। लेेकिन तकनीक पर इससे ज़्यादा भरोसा शिक्षा को उस मानवीय ऊष्मा से वंचित कर देगा, जिसकी झलक अभी स्कूलों में दिखाई देती है।

बुनियादी तौर पर शिक्षकों से यह कहने की कोशिश हो रही है कि बच्चों को क्या पढ़ाया जाएगा (कंटेंट) के साथ-साथ कैसे पढ़ाया जाएगा? यह तय करने की जिम्मेदारी भी बाकी लोगों पर होगी। किसी स्कूल में क्या एक शिक्षक की भूमिका मात्र ऊपर से आने वाले निर्देश फॉलो करने की होगी?

अगर ऐसा होता है तो शिक्षक अब अपने ही बच्चों के बीच अज़नबी होने को मजबूर होगा। और बच्चों के बारे में कहा जाएगा कि उनको तो वीडियो गेम और इंटरनेट पर पढ़ना, प्रोजेक्ट बनाना पसंद है ऐसे में शिक्षक की जरूरत क्या है? लेकिन ज़मीनी वास्तविकताएं काफी अलग है।

ऐसे में सवाल उठता है कि तकनीक का अत्यधिक लोभ हमें एक ऐसे अंधे रास्ते की तरफ न मोड़ दे…जहां से कोई वापसी नहीं होगी।

अध्यापक को बदनाम करने की मुहिम

इसी संदर्भ में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार का वक्तव्य याद आता है, जिसमें वह कहते हैं, “शिक्षाविद कृष्ण कुमार कहते हैं, “आज तो ऐसा लगता है जैसे अध्यापक को बदनाम करने की एक मुहिम सी चल पड़ी है। भारत दरअसल एक युद्ध लड़ रहा है, जिसमें राज्य बिल्कुल सेनापती के भूमिका में है और यह युद्ध अध्यापक से लड़ा जा रहा है उसके पेश से, उसकी अस्मिता से, उसके काम से….। इसमें वैश्वीकरण जैसी शक्तियां शामिल हैं…लेकिन भारत के भीतर भी ऐसी शक्तियां कम नहीं है।”

भारत के स्कूलों की वास्तविकता:

आजादी के बाद का दूसरा विभाजनः 

वर्तमान में टेक्नॉलजी के फ़ायदे-नुकसान को ग़ौर से देखने की जरूरत है। इसके लाभों को अपनाने की जरूरत है, लेकिन इसके नुकसान के बारे में समय रहते सचेत होने की जरूरत है।

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