अहमदाबाद के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले योगेश का मन बहुत ही चंचल है। मगर जब वो कोई काम करता है तो वह उसमें पूरी तरह डूब सा जाता है। ऐसे में उसका पूरा ध्यान अपने काम की तरफ होता है। वह समूह में बैठकर दोस्तों के साथ जमकर मस्ती तो करता है लेकिन साथ ही अपना कल्पना की दुनिया में लगातार आगे बढ़ रहा होता है और बनाता है अपनी सोच की कला।
चित्रों को समझाने का प्यारा अंदाज
योगेश को चित्र बनाना बेहद पसंद हैं और चित्र बनाने की बात पर चहक कर कहता है ये बनाता हूँ ,वो बना दूंगा । हमेशा कहता है आप फिर स्कूला आना मैं और भी सोचकर बनाऊंगा और शुरू हो जाता है। कुछ लाइनें खिचता हैं अधूरी सी और उसकी कला हर पल नयी –नयी कहानी के रूप में आगे बढ़ने लगती हैं । वो हर बात को दो -तीन तरह से मुझे बताता है क्योकि उसकी नज़र में तो मुझे गुजराती समझ नहीं आती ।
छोटी मछली लोटे के अंदर क्यों?
जब वह किसी चित्र में एक छोटे भैया को फुटबाल खेलते हुए बनाता हैं तो वो भैया फूल सूंघते हैं, गुब्बारे उड़ाते रहते हैं। जब वह छोटी सी बेबी बनाता है तो कहता हैं की एक दिन कहीं देखा था उसने और जब उस बेबी के पैर नहीं दिखते तो तर्क देते हुए कहता हैं की अरे छोटा -छोटा पग है न छोटी बेबी का तो पैर मोड़कर सो गयी है । अपनी मछली को उसने छोटे लोटे के अंदर इसलिए डाल दिया क्योंकि वो घास पे बेचारी अकेले ही टहल रही थी ।
उसके घर में खूब सारे हाथी हैं । सब अलग -अलग कमरे में रहते हैं , और उनके पंख भी हैं । क्या वो उन हाथियों के पास जाता है, तो सीधा -सादा सा जवाब मिलता हैं की -नहीं वो तो अभी बहुत छोटा है ना इसलिए । मगर मम्मी रोज जाती है उनके कमरों में । दो तिरछी मोटी लाइन उसके हाथी का एक पावँ है और बाकी पैर कहाँ हैं ,तो बताता हैं की हाथी उधर जा रहा था ना तो झाड़ के पास वाले झाड़ के पीछे बाकी पैर छुप गएँ हैं ।
तीन तरफ से घिरी एक लाइन को वो लड़की कहता है और एक छोटा सा बिंदु उसका वो तरबूज है जिसे खरीदने के लिए बगल में एक लड़की खड़ी हैं। २ मिनट तक वो सोचता है और दुखी होकर कहता है की इसके पास तो पैसे ही नहीं हैं खरीदने के लिए। लेकिन टीचर ये ना दौड़कर पैसे मांगने अभी ही
दिल के अंदर का झूला
घर जाएगी । फिर तीन लाइन जो की उसके लिए लड़की थी तुरंत वो छोटी बच्ची का घर बन जाता हैं । इस तरह मैं भी उसकी कल्पना में समाहित हकीकत को समझने के लिए अपनी बातों को कुछ इस तरह आगे बढाया की अब तुम वो सोचकर बनाओ जो अभी तक नहीं बनाया है । चुटकी बजाकर उसने शुरुवात की से दिल के अंदर झूला बनाने से और हमारी बातें आगे बढ़ी कुछ इस तरह —
योगेश — मैं ना दिल में झूला बनाता हूँ टीचर ।
मैं– दिल में ?
योगेश — हाँ देखना आप (कुछ समय बाद वो वापिस आया ) ये दिल है और उसमें झूला और पता
है ये दिल का छोटा बच्चा है .अच्छा है ।
मैं– हाँ ।
योगेश — ये दोनों ना खो गए थे बहुत दिनों के बाद मिले हैं इसलिए सजे हुए हैं ।
चंदा मामा पहले छोटे थे, अब बड़े हो गए हैं
( फिर वो एक गोला बनाने लगा तो मैंने पूछा क्या बना रहे हो योगेश )
योगेश — चंदा मामा ( फिर वो आँखें बनाकर आस -पास लकीरें खीचने लगा जब मैंने पूछा
ये क्या हैं तो ………)
योगेश — शांति से बैठो मैं समझा देता हूँ आपको …ये लड़की हैं ।
मैं — मगर अभी तो ये चंदा मामा थे ना ?
योगेश — हाँ मगर वो भी तो पहले छोटे थे न ,बाद मैं बड़े हो गए।
‘ये दीवानी लड़की है, संगीत सीखती है’
कुछ देर तक उसी चित्र को देखते हुए लकीरों को दिखाकर बोला ये छोटी लड़की हैं डांस सिखने जा रही है ,औररर….ये पूरे बाड़( तीर ) हैं न लड़की को मारने आ रहें हैं और ये चिल्ला रही हैं -बचाओ -बचाओ । फिर वो चिंता में पड़ गया एकदम चुप होकर बोला अब कैसे बचेगी ये। और तुरंत दूसरी तरफ एक बड़ी लाइन सीधी खिचीं और चिल्लाकर खुशी से बोला।
योगेश — बच गयी -बच गयी, निकल गयी लड़की टीचर और दूसरी तरफ फटाफट दूसरी
लड़की बनायीं और प्यानो भी ।
मैं— ये लड़की क्या कर रही हैं?
योगेश — ये दीवानी लड़की हैं ,प्यानो बजा रही हैं .संगीत सिखाती हैं ।
(दूसरी लड़की बगल में बनाकर कहा ये वाली भी प्यानो सिखने जा रही हैं इसके पास) इसके बाद सफरजन के पास खूब सारी छोटी -छोटी लकीरें बनायीं ।
मैं– अरे ये क्या हैं ?
योगेश — सफरजन हैं वो जो दिवाली में पटाखें बजाते हैं तो जो उसके छोटे -छोटे तन
निकलते हैं न .उसके तन से जो विश मांगते हैं वो पूरी हो जाती हैं ।
मैं— अच्छा आप मांगते हो ?
योगेश — हाँ …।
मैं — पूरी हुयी ?
योगेश — (चुप ) हाँ कभी -कभी तो हुयी थी ।
ये देखो ये छोटी सी नदी हैं न और दोनों तरफ सीढ़ी हैं ।छोटी मछली है छोटी नदी में।सीढ़ी पर से चढ़कर आती हैं ,नदी में खूब नहाती हैं और फिर इस सीढ़ी से बाहर चली जाती है – सूखने के लिए। दूसरी जगह एक सीढ़ी बनायीं बड़ी सी और वह से बच्चे -बड़े जल्दी -जल्दी फिसल रहे थे । फिर वो बाहर चला गया पानी पीने ये वादा लेकर की आप कल स्कूल जरुर आओगी।
योगेश से यशस्वी की बातचीत अहमदाबाद में सरकारी स्कूलों के साथ काम करने के दौरान ही हुई थी। उन दिनों की बहुत सी बातें यशस्वी की डायरी में दर्ज़ हैं। जो आप सभी के साथ एजुकेशन मिरर पर साझा हो रही है। )
