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शिक्षक ताराराम जी कहते हैं, “सब कंगूरा देख रहे हैं, मैं नींव तैयार कर रहा हूँ”



फुलाबाई खेड़ा गाँव का एक दृश्य

एजुकेशन मिरर के पहले फ़ेसबुक लाइव में एक शिक्षक ताराराम जी की बात हो रही थी। वे राजस्थान के सिरोही ज़िले की पिण्डवाड़ा तहसील के एक विद्यालय राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय फुलाबाई खेड़ा में पढ़ाते हैं।

यह क्षेत्र काफी हरा-भरा है। नहरों से आने वाले पानी से खेतों की सिंचाई होती है। यह स्कूल माउण्ट आबू जाने वाले रास्ते में पड़ता है तो ऊंचे अरावली के ऊंचे पहाड़ों की शृंखला यहां भी देखी जा सकती है। इस विद्यालय की एक ख़ास बात है कि यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की बच्चों के प्रति प्रतिबद्धता है। वे विभिन्न शिक्षक प्रशिक्षणों वे सीखने के अवसरों में सक्रियता के साथ भागीदारी करते हैं और बग़ैर किसी शिकायत के काम करते हैं। शिक्षण के पेशे को प्रोफ़ेशनल बनाने में इस प्रतिबद्धता की बड़ी भूमिका होती है।

‘मैं नींव तैयार कर रहा हूँ’

ताराराम जी को क्लासरूम में पढ़ाता हुआ देखकर मैंने एक दिन लिखा, ” जिस शिद्दत के साथ हम किसी काम को करते हैं, वही उस काम को मायने देता है। एक साल बाद अपने एक शिक्षक से मिलकर, उनकी पहली-दूसरी कक्षा के प्रति जवाबदेही को देखकर लगा कि इस स्कूल को दिए समय का एक-एक लम्हा सार्थक हो गया है। उनकी एक बात मन को छू गई है जब वे कहते हैं, “सब कंगूरा (महल का ऊपरी हिस्सा) देख रहे हैं, मैं नींव तैयार कर रहा हूँ। पहले नींव तैयार करो, फिर आगे बढ़ो। यह फॉर्मूला मेरे लिए मूलमंत्र की तरह है। बतौर शिक्षक मैं इस आदर्श को जीवन में उतारने की कोशिश कर रहा हूँ।”

भाषा कालांश के दौरान बच्चों को हिंदी पढ़ाते हुए ताराराम जी।

उस दिन ताराराम जी बड़े आत्मविश्वास के साथ कह रहे थे कि पहली कक्षा में प्रवेश के समय बच्चों की उम्र का विशेष ध्यान रखा है। इस साल दोनों कक्षाओं को अलग-अलग पढ़ाना है ताकि छोटे बच्चों को भी सीखने का ज्यादा मौका मिले। दूसरी कक्षा के बच्चे तो मुखर हो गए हैं, उनमें से ज्यादातर बच्चे किताब पढ़ते हैं जो नियमित स्कूल आते हैं।

पहली मुलाक़ात में यहां के प्रधानाध्यापक चुन्नीलाल जी ने कहा, “देखिए मेरे पास बात करने के लिए समय नहीं है। मगर काम के सिलसिले में कोई बात हो तो बेझिझक कहिए।” उस दिन होने वाले संवाद के बाद तो उन्होंने कभी किसी बात की कमी कम से कम उस स्कूल में महसूस नहीं होने दी। बच्चों के लिए उनका प्यार काबिल-ए-तारीफ था। बच्चे उनकी ऑफिस में बग़ैर पूछे आ सकते थे। कोई सवाल मन में तो तो बेझिझक पूछ सकते थे। उनकी स्पष्टवादिता उनके व्यक्तित्व को एक विशिष्ट पहचान देती है।

प्रधानाध्यापक के नेतृत्व कौशल से मिली मदद

किसी भी विद्यालय में संचालित होने वाले लिट्रेसी कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रधानाध्यापक की भूमिका बेहद अहम होती है। इस विद्यालय में भी उनके नेतृत्व में ताराराम जी को पहली-दूसरी क्लास में भाषा शिक्षण के  लिए पर्याप्त समय मिला। किसी बात की जरूरत हो तो सदैव वह आगे आते थे। एक बार लायब्रेरी में किताबों के लिए जूट बैग लगाना था, वह ख़ुद हथौड़ी लेकल आए और बोले बताइए कहां कील लगानी है। ऐसे परवाह करने वाले प्रधानाध्यापक का कुशल नेतृत्व शिक्षक साथियों को उत्साह और हौसले के साथ अपने काम को करने का जज्बा बनाए रखने में मदद करती है।

फुलाबाई खेड़ा स्कूल में लिट्रेसी कार्यक्रम के दौरान बच्चे गुब्बारे दिखाते हुए।

प्रधानाध्यापक साथियों के साथ काम करने का अनुभव गाँधी फेलोशिप के दौरान मिला था। उस दौरान हमारा फ़ोकस प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास कार्यक्रम (पीएलडीपी) था। यहां उस काम को सहजता के साथ करने का श्रेय निश्चित तौर पर उन दिनों के काम और दोस्तों के साथ स्कूल के विकास को लेकर होने वाली लंबी चर्चाओं और बहसों को जाता है। जिसने हम सभी को शिक्षा के क्षेत्र में एक पुख्चा बुनियाद तैयार करने का अवसर दिया। जो शिक्षकों के साथ समानुभूति वाले संप्रत्यय पर आधारित था। जहाँ बग़ैर की सत्ता या अथॉरिटी के माध्यम से प्रभावित करने की बात होती थी। जो हम कहना चाहते हैं वह हमारे व्यवहार व विचार दोनों से संप्रेषित हो तो ऐसी कोशिश निःसंदेह असर डालती है।

‘शिक्षक का सबसे प्रमुख दायित्व पढ़ाना है’

फेसबुक लाइव में भी हमने इस बात को विशेषतौर पर रेखांकित किया था कि ताराराम जी को अपने प्रधानाध्यापक की तरफ से काम करने में पूरा सहयोग मिला। इससे उनको अपने काम के दौरान आने वाली बाधाओं को दूर करने और पढ़ाई वाले काम पर ज्यादा फ़ोकस देने में मदद मिली। उनके पास बीएलओ (बूथ लेवल ऑफीसर) का भी काम था, मगर इस काम को उन्होंने अपनी पढ़ाई के दायित्व पर कभी हावी नहीं होने दिया।

ताराराम जी सदैव कहते थे, “एक शिक्षक का सबसे प्रमुख दायित्व पढ़ाना है। यही हमारी पहचान है। हमारी पहचान जिन कामों से नहीं है। उसे हमें कर देना चाहिए, क्योंकि हम सरकारी नौकरी में हैं। मगर उन बच्चों के लिए अगर हम नहीं सोचेंगे, हम काम नहीं करेंगे तो कौन सोचेगा। इन बच्चों के अभिभावक भी तो शिक्षित और जागरूक नहीं हैं कि हम उनसे कोई अपेक्षा रखें।”

इस तस्वीर में बच्चों को एक-दूसरे की सीखने में मदद करते हुए देखा जा सकता है। यह पियर लर्निंग का एक बेजोड़ उदाहरण उदाहरण है।

नौकरी में बने रहना भर शिक्षक का काम नहीं

बतौर लिट्रेसी कोच काम करते समय शिक्षक साथियों को प्रेरित करने और अच्छे प्रयासों के लिए प्रोत्साहित करने की भूमिका का निर्वहन हम करते थे। शिक्षक साथियों की तरफ से जो अनुभव और विचार साझा होते थे, वे भी हमें प्रभावित करते थे। उदाहरण के तौर पर अगर कोई शिक्षक साथी कहते थे कि हम तो टाइम पास के लिए स्कूल आते हैं। ऐसे भी वाक्य सुनने को मिले हैं।

इस सिलसिले में लिखी एक पोस्ट पढ़िएः नौकरी है जरूरी, मगर बच्चों को पढ़ाना भी

सरकारी स्कूल की एक दीवार पर लिखा कथन शिक्षक के पेशे को अलग नज़रिए से देखने की माँग करता है।

ऐसी बातों के असर से मुक्त का काम भी ताराराम जी जैसे शिक्षक साथियों की इन बातों ने किया है कि हमारा मुख्य दायित्व नौकरी की औपचारिकताओं को पूरा करके नौकरी में बने रहना या नौकरी बचाना नहीं है बल्कि बच्चों की शिक्षा कैसे अच्छे से अच्छी हो पाए। इसके लिए विचार करना और चिंतन करना। फिर उसे क्लासरूम में लागू करके देखना है कि वे बच्चों तक किस सीमा तक पहुंच पा रही हैं और उनमें क्या सुधार करना है।

उनकी क्लास में शिक्षक से ज्यादा ऊर्जा बच्चों की नज़र आती है

ताराराम जी का व्यक्तिव काफी सहज है। वे बड़ी सहजता के साथ आपसे बात करेंगे। अपनी अपेक्षा साझा करेंगे और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहल भी करेंगे। वे अपनी क्षमता को लेकर थोड़ा संकोच भी करते हैं। मगर बच्चों का साथ उनका जो लगाव है और स्नेह है। वह उनके भीतर की उन सारी खूबियों को एक-एक करके उभारता चला जाता है जो उन्हें एक ख़ास शिक्षक बनाती हैं।

एक ऐसा शिक्षक जिनकी क्लास में बच्चों की ऊर्जा शिक्षक से ज्यादा होती है। बच्चों के पास सवाल पूछने और हँसी-मजाक के अवसर ज्यादा होते हैं। एक ऐसा शिक्षक जिनकी क्लास में बच्चे खुद सीखने के साथ-साथ, साथियों के साथ अपना सीखा हुआ साझा करने (पियर लर्निंग) में ख़ुशी महसूस करते हैं। पियर लर्निंग आज के दौर में बहुत बड़ा कांसेप्ट माना जा रहा है, जिससे बच्चों के सीखने की गुणवत्ता और रफ़्तार कई गुना बढ़ जाती है। इस पर कई लंबे-लंबे आलेख प्रकाशित हो रहे हैं। यह सारी चीज़ें ताराराम जी क्लास में जाने पर आपको दिखाई देती हैं।

बच्चों का स्कूल के प्रति लगाव हमारा ध्यान खींचता है

पहली क्लास की एक बच्ची शुरूआती दिनों में पढ़ने का अभिनय करते हुए। रीडिंग रिसर्च की भाषा में इस एक्टिंग ऑफ रीडिंग कहते हैं।

स्कूल के साथ बच्चों का लगाव और विद्यालय के संसाधनों के प्रति एक अपनापन बच्चों के विकास की तरफ आपका ध्यान खींचता है कि यह कैसे संभव हुआ। उनके विद्यालय में बच्चे खाली समय में लायब्रेरी में किताबें पढ़ते हैं।

एक क्लास को दूसरी क्लास के बच्चे किताबें इश्यू करते हैं। दूसरी क्लास के बच्चे जब किताब पढ़ते हैं तो कोई शोर नहीं होता, एक आवाज़ आती है जिसमें बच्चों की खुसुर-फुसुर शामिल होती है कि देखो दीवार पर जो चित्र बना हुआ, वही इस किताब में भी है। कहानी और कविता को बच्चे दोहराते हैं।

यहां बच्चे इस बात की परवाह नहीं करते कि बड़े उनके कमरे में क्या कर रहे हैं, ऐसे बच्चों के ऐसे व्यक्तित्व विकास की कहानी निःसंदेह हमारा ध्यान खींचती है। किसी विचार के हक़ीकत में बदलने की यात्रा काफी सुखद होती है और चुनौतियों से भरी हुई भी। मगर ताराराम जैसे शिक्षक साथी इस यात्राों को पार भी करते हैं और भावी संभावनाओं के द्वार हमेशा खुले रखते हैं।

इस स्कूल में हिंदी भाषा की पढ़ाई का स्तर कैसा है?

गर्मी की छुट्टियों के दौरान उन्होंने फ़ोन पर कहा था, “दूसरी कक्षा के बच्चे पाँचवीं कक्षा को भी किताब पढ़ने के मामले में टक्कर दे रहे हैं। पढ़ने के प्रति बच्चों का लगाव बना हुआ है और वे धाराप्रवाह ढंग से किताबों को पढ़ पाते हैं। पढ़ी हुई सामग्री से सवालों का जवाब दे पा रहे हैं।”

ऐसे परिणाम निःसंदेह लिट्रेसी के क्षेत्र में प्रयास करने वाली रूम टू रीड जैसी ज़मीनी संस्था के कार्यों को पहचान देते हैं बल्कि एक शिक्षक की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं कि अगर कोई शिक्षक अपने बच्चों को नियमित पढ़ाते हैं। बच्चों के प्रगति को ध्यान में रखकर अपने पढ़ाने की रणनीति में जरूरत के अनुसार बदलाव करते हैं, अपनी समस्याओं के लिए किसी से बात करते हैं और समाधान खोजने का प्रयास करते हैं तो बच्चों के अधिगम स्तर में यथोचित सुधार होता है।

गाँव में मिट्टी के खिलौने बनाते बच्चे। अभी इस गाँव में टीवी और डिश का बहुत ज्यादा प्रचार नहीं हुआ है।

इस स्कूल में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे गरासिया आदिवासी हैं। बच्चे घर पर आदिवासी गरासिया भाषा ही बोलते हैं। उनके स्कूल में हिंदी माध्यम में पढ़ाई होती है। शिक्षक जरूरत के अनुसार दोनों भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। यानि बहुभाषिकता के विचार को यहाँ लागू करने की कोशिश अच्छे से हो रही है। ख़ासतौर पर पहली-दूसरी-तीसरी में बच्चों को अपने घर की भाषा में जवाब देने और अपनी बात रखने कू पूरी छूट है। इसका असर भी बच्चों के आत्मविश्वास पर दिखाई देता है। पहली-दूसरी के बच्चे हिंदी अच्छे से समझ लेते हैं और बोल भी लेते हैं।

सिरोही से एक भाषा शिक्षक की कहानी: मुझे बच्चों को पढ़ा हुआ देखकर ख़ुशी मिलती है

दूसरी से तीसरी कक्षा में आने वाले बच्चे तो पूरे स्कूल का माहौल बदलने की दिशा में सकारात्मक योगदान दे रहे हैं। उनको हिंदी भाषा और इस भाषा के गीतों और कहानियों से ख़ास लगाव है। ग़ौर करने वाली बात है कि वे क्लास में स्थानीय भाषा के लोकगीत भी आनंद के साथ गाते हैं। ऐसे माहौल के निर्माण का श्रेय़ निःसंदेह ताराराम जी जैसे शिक्षक साथी को जाता है। जो अन्य लोगों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत की तरह हैं। उनके साथ ही स्कूल लायब्रेरी के लिए विशेष सहयोग देने वाले प्रकाश जी और ताराराम जी को समय-समय पर प्रेरित करने वाले फुलाबाई खेड़ा गाँव के ही रहने वाले शिक्षक साथी विदाराम जी का भी जिक्र जरूरी है। यह सफलता एक टीम के रूप में हासिल की गई सफलता की मिशाल है। जो अन्य स्कूलों के लिए एक अच्छा उदाहरण।

इस स्कूल में साथ-साथ विज़िट करने और बच्चों के साथ काम करने के लिए मुकेश भागवत का बहुत-बहुत शुक्रिया। हमनें इस  स्कूल में बच्चों के साथ कुछ बेहद यादगार दिन बिताए हैं, जब प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार की किताब ‘बच्चों की भाषा और अध्यापक’ के बहुत से अनुभव और विचार जीवंत रूप में लायब्रेरी में तैर रहे थे। बच्चे किताबों की दुनिया में खोए हुए थे और हम उनके बारे में आपस में बात कर रहे थे। उनको कहानियां सुना रहे थे। बोर्ड पर लिखा हुआ गद्यांश पढ़ने का अवसर दे रहे थे। एजुकेशन मिरर के पहले फ़ेसबुक लाइव में ताराराम जी का जिक्र करने और उनकी बात करने की सबसे बड़ी वजह यही थी कि हम दोनों लोग उनको जानते हैं। उनके काम से अच्छी तरह परिचित हैं। शब्दों की सीमा अब रूकने के लिए कह रही है।

इतनी लंबी कहानी पढ़ने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया। इस पोस्ट पर आपकी टिप्पणी ऐसी लंबी पोस्ट लिखने का हौसला देगी। ताराराम जी तक आपके विचारों को पहुंचाने में मदद करेगी। इसलिए अपनी राय जरूर साझा करें और दोस्तों के साथ यह कहानी भी शेयर करें ताकि उनको भी ऐसे शिक्षक साथी के बारे में पता चले जो चुपचाप बदलाव की अमिट कहानियां लिख रहे हैं और बच्चों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला रहे हैं।

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