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एक भाषा शिक्षक की कहानी, “मुझे बच्चों को किताब पढ़ता देखकर खुशी मिलती है”

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कालूराम जी बच्चों को लगन के साथ पढ़ाते हैं। (तस्वीर में बाएं से पहले स्थान पर)

राजस्थान में सिरोही ज़िले के पिण्डवाड़ा ब्लॉक में एक स्कूल है राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय कालाबोर। यहां पहली-दूसरी कक्षा के भाषा शिक्षक है कालूराम जी। वे बच्चों को बड़े लगन के साथ पढ़ाते हैं।

भाषा शिक्षण के कार्य में सपोर्ट का कार्य रूम टू रीड की तरफ से हो रहा है। लिट्रेसी कोच भाषा शिक्षक के साथ क्लास में बैठते हैं, हर कालांश के बाद शिक्षक के साथ चर्चा करते हैं और जरूरत पड़ने पर डेमो भी देते हैं ताकि भाषा कालांश के माध्यम से बच्चों का अधिगम स्तर बढ़ाया जा सके।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पुरस्कार

इस विद्यालय में पहली के आखिर तक आते-आते बहुत से बच्चों ने हिंदी भाषा में पढ़ना सीख लिया था। वर्तमान में दूसरी कक्षा के बहुत से बच्चे धारा प्रवाह तरीके से पठन करते हैं। सबसे ख़ास बात है कि वे पाठ से जुड़े सवालों का जवाब भी देते हैं। जाहिर सी बात है कि बच्चों के साथ भाषा शिक्षण के काम को इस मुकाम तक लाने के लिए कड़ी मेहनत और काबिल-ए-तारीफ प्रतिबद्धता का श्रेय कालूराम जी को जाता है। जिन्होंने भाषा शिक्षक के कार्यक्रम को सफलता के साथ अपने स्कूल में लागू किया।

26 जनवरी को कालूराम जो को ब्लॉक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया गया। इस तरह के पुरस्कार से निःसंदेह मेहनत करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहन मिलता है कि हमारे प्रयासों को पहचान मिल रही है। उसे सामूहिक स्तर पर लोगों के सामने बतौर उदाहरण पेश किया जा रहा है यानि समाज में एक सही उदाहरण पेश करने की कोशिश हो रही है। अभी कुछ दिन पहले कालूराम जी से उनके अनुभवों पर विस्तार से बात हुई। इस पोस्ट में पढ़िए उनसे होने वाली बातचीत के प्रमुख अंश:

भाषा कालांश के शुरूआती दिन

एक सरकारी स्कूल की कहानी

रूम टू रीड की तरफ से आयोजित लिट्रेसी कार्यक्रम में भाग लेते एक सरकारी स्कूल के बच्चे।

सिरोही जिले के आदिवासी अंचल में गरासिया भाषा बोली जाती है। इसके शब्द हिंदी से काफी अलग हैं। इसलिए बच्चों को हिंदी सीखने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। क्योंकि स्कूल के अतिरिक्त उनके पास हिंदी को सुनने और बोलने के बहुत ज्यादा अवसर नहीं होते हैं।

भाषा कालांश के शुरूआती अनुभवों को याद करते हुए कालूराम जी कहते हैं, “हमारे स्कूल में गाँव के कोने-कोने से बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। शुरूआत में बच्चों की भागीदारी कम थी। वे बोलते नहीं थे। हिचकिचाते थे। अपने घर की भाषा में ही बात करते थे। मगर अब उनकी झिझक टूटी है। हमने उनको अपनत्व दिया। अपने घर की भाषा में ही बोलने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बात बच्चे खुलते गए और सीखते गए। लगन के साथ भाषा शिक्षण के काम का बड़ा सकारात्मक परिणाम मिला। पहली-दूसरी के बहुत से बच्चे किताब पढ़ रहे हैं। एक शिक्षक के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी?”

वे आगे कहते हैं, “स्केपफोल्डिंग का प्रासेस (I do, We Do, You Do) अपनाने के कारण बच्चों के सीखने के अवसर बढ़े हैं। इसमें हम बच्चों को कुछ भी नया बताने के पहले उनको अवगत कराते हैं, फिर साथ-साथ करते हैं और आखिर में उनको खुद से पढ़ने और जवाब देने का मौका देते हैं।”

शिक्षक के लिए रिफलेक्टिव होना कितना जरूरी है?

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इस किताब के लेखक चकमक के संपादक सुशील शुक्ल जी हैं। यह किताब बच्चों को काफी पसंद है।

वे एक ग़ौर करने वाली बात कहते हैं, “पहले हम कुछ बच्चों के सीखने से संतुष्ट हो जाते थे। लेकिन जब क्लास के ज्यादा बच्चों को सीखते देखा तो प्रण लिया कि मुझे बच्चों को रोज़ पढ़ाना है। इससे आत्मा को खुशी मिलती है। जो बच्चे पढ़ने में पीछे रह जाते हैं, हम उनके ऊपर भी ध्यान देते हैं। उसको बार-बार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बार-बार उसको समझाते हैं। दो बच्चों को एक साथ बैठकर पढ़ने का अवसर (पियर लर्निंग) देते हैं क्योंकि बच्चे, बच्चों से तेज़ी से सीखते हैं।”

एक शिक्षक को रिफलेक्टिंव प्रेक्टिशनर होना चाहिए यह बात बार-बार कही जाती है। भाषा कालांश के बाद होने वाले विचार-विमर्श के महत्व को रेखांकित करते हुए कालूराम जी कहते हैं, “अगर हम कालांश के बारे में मनन-चिंतन करेंगे तो जो कमी-बेसी होगी उसमें सुधार हो पाएगा।”

एक शिक्षक के लिए मनन-चिंतन करना कितना जरूरी है? इस सवाल के जवाब में कालूराम जी कहते हैं, “मनन और चिंतन से हम नवाचार कर पाएंगे। भाषा कालांश में क्या बदलाव की जरूरत है, इसके लिए रास्ता खोज पाते हैं।”

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3 Comments on एक भाषा शिक्षक की कहानी, “मुझे बच्चों को किताब पढ़ता देखकर खुशी मिलती है”

  1. dheerendra singh // February 22, 2017 at 2:37 am //

    good job Kaluram ji:)

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  2. Thank you for sharing your exprience.

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  3. Mai Kalu Ram ji se puri tarah saihmat hu kyuki maine khud teacher training kar rakhi hai or ctet pass bhi hu or bacho ko tution bhi padhati hu. jab koi bachcha padhne ata hai to ushe kuch khash nai ata par jab us par lgatar maihnat karte hai or vo bachcha sikhkar achchha RESULT deta hai to bahut khushi hoti hai sachchi me lagta hai ki hamari maihnat safal ho gai hai. student adhigam (learning).karta hai usme student ka mulayankan(evalution) hota hai.mulyankan shikshan adhigam prakriya ka ek aisa sopan hai jisme teacher yeh sunichit karta hai ki uske dwara ki gai shikshan vaivastha tatha shikshan ko aage badhne ki kriyae kitni safal rahi sath hi teaching Aids ka use karkar bhi hum adhyapan adhigam ki prakriya ko saral, parbhavkari aur ruchikar bana sakte hai

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