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अगर 15-20 बच्चों की क्लास में केवल चार-पाँच बच्चे ही सीख रहे हों तो क्या करें?

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

हर बच्चे के सीखने का अपना तरीका होता है, हमें इस बात को समझकर उसे सीखने में मदद करनी चाहिए।

अगर किसी स्कूल में 15-20 बच्चों की क्लास में केवल चार-पाँच बच्चे ही सीख रहे हों तो क्या करें? हर क्लास में ऐसे छात्र होते हैं जो कैसी भी पढ़ाई हो। सीख ही लेते हैं। वे क्यों सीख लेते हैं? इसका कुछ श्रेय शिक्षक को दिया जाना चाहिए और बाकी का श्रेय बच्चे को दिया जाना चाहिए, ऐसे बच्चों में शायद जटिल निर्देशों को भी समझ लेने की सहज योग्यता होती है।

इसके साथ ही ऐसे बच्चे चीज़ों को अपने तरीके से समझकर चीज़ों की स्पष्ट समझ बना लेते हैं। उनको बहुत ज्यादा बाहरी सपोर्ट की जरूरत नहीं होती, हाँ मोटीवेशन और प्रोत्साहन की जरूरत होती है। वह शिक्षकों की तरफ से मिल ही जाती है क्योंकि क्लास में उनका प्रदर्शन बाकी बच्चों की तुलना में बेहतर होता है।

अगर किसी स्कूल में अगर आप टीचर एजुकेटर हैं, अगर किसी क्लास में अगर आप शिक्षक हैं, अगर किसी क्लास में आब्जर्बेशन के दौरान अगर आप एजुकेशन सेक्टर में में काम कर रहे हैं तो ऐसी स्थिति को लेकर सतर्क होना चाहिए। शिक्षकों के साथ बातचीत करनी चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्या आपके पढ़ाने का तरीका ऐसा है कि जिसका लाभ कुछ ही बच्चों को होता है। या फिर आप चुनिंदा बच्चों के ऊपर ही ध्यान दे रहे हैं, ख़ासकर उन बच्चों के ऊपर जो सीख रहे हैं या जिनके बारे में आपको भरोसा कि वे सीख जाएंगे। क्योंकि बच्चों का सीखना एक शिक्षक के अच्छे निर्देश, सही फीडबैक, सही सपोर्ट और अच्छे प्रयासों के लिए मिलने वाली सही तरीफ पर निर्भर करती है।

बच्चों पर भरोसा करें

क्लास में हमें कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे बच्चों के सामने बच्चों की आलोचना न करें, बच्चों के अभिभावकों को जिम्मेदार न ठहराएं, निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए जाने वाले बच्चों से उकी तुलना करके, ऐसे बच्चों को कमतर न ठहराएं, ये बच्चे भी सीख सकते हैं। सीखतें हैं। बच्चों की क्षमता पर ऐसा भरोसा और विश्वास आपको बतौर शिक्षक और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के नाते होना ही चाहिए।

अगर नहीं है तो अपनी मान्यताओं को फिर से झकझोरिए और सोचिए कि बच्चों के प्रति अविश्वास का भाव कहां से आ गया। ठीक है कि बच्चे के माता-पिता उनको घर पर नहीं पढ़ाते। मगर किसी भी बच्चे के लिए स्कूल में मिलने वाला समय पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए पर्याप्त होता है।

अगर आप क्लास में पर्याप्त तैयारी के साथ जा रहे हैं। पढ़ाने की सही रणनीतियों को अपना रहे हैं, क्लास के दौरान इस बात को ग़ौर से देख पा रहे हैं कि बच्चा कौन सी बात सीखने की राह पर है, किस कांसेप्ट को थोड़ा-थोड़ा समझ रहा है. उसका कौन सा कांसेप्ट बिल्कुल क्लियर हो गया, कौन से प्वाइंट हैं जहां वह उलझन वाली स्थिति का सामना कर रहा है।

‘पियर लर्निंग’ से मिलेगी मदद

क्लास में पढ़ना-लिखना सिखाते समय बच्चा कौन सी चीज़ों को रटकर बोल रहा है, किस चीज़ को समझकर बोल रहा है, पढ़ते समय कहां पर अनुमान का सहारा ले रहा है, कहां पर केवल तुक्का लगा रहा है। अनुमान वाली चीज़ को ज्यादा बेहतर तरीके से समझकर पढ़ने की दिशा में कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है? ऐसे सवाल आपके लिए बहुत काम के सवाल हैं। पढ़ना सीखना और सिखाना थोड़ा मुश्किल जरूर है। पर उसकी अच्छी तैयारी हो तो इस मुश्किल काम को भी आसान बनाया जा सकता है।

फिर से पहले वाले सवाल पर वापस लौटते हैं, अगर किसी क्लास में ऐसी स्थिति दिखाई देती है। तो बच्चों को दो-दो के जोड़े में बैठाकर उनको एक-दूसरे से सीखकर (पियर लर्निंग) आगे बढ़ने वाला माहौल क्लास में बनाना चाहिए। इससे सीखने वाले बच्चों की संख्या को 5 से 10 और 10 से 15 की दिशा में एक क़दम उठाया जा सकता है इस तरीके का इस्तेमाल कहानी सुनाने और किसी पाठ को पढ़ाने के दौरान किया जाता है। किसी क्लास को एक स्तर पर लाने के लिए भी इस तरीके का अच्छा इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

इसके अभाव में बहुत अच्छे से पढ़ाने के बावजूद आप सारे बच्चों तक नहीं पहुंच पाएंगे और ऐसे में आपकी क्लास का हाल भी तीन-चार बच्चों को पूरी क्लास मानने जैसा हो जाएगा।

आखिर में एक बात

एक टीचर एजुकेटर और आपके शुभचिंतक के रूप में मैं नहीं चाहता कि आपकी क्लास में ऐसा नजारा दिखाई दे। चार बच्चे सक्रियता से भागीदारी करें और बाकी बच्चे मूकदर्शक बने रहे हैं। हर बच्चा पढ़ता हुआ दिखाई दे, सीखता हुआ नज़र आए, आगे बढ़ने की कोशिश करे, आपको उसका सपोर्ट मिले। क्लासरूम में बनने वाला ऐसा माहौल आपको भी ख़ुशी देगा और बच्चों को भी सीखने के आनंद से रूबरू कराएगा।

बच्चे आपकी बहुत से परेशानियों को नहीं समझते कि आप डाक का काम कर रहे हैं। किसी अन्य परेशानी में उलझे हुए हैं, मगर वे आपके मनोभावों को समझते हैं। वे बच्चे हैं, मगर समझते बहुत कुछ हैं। हमें इस बात को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझते हुए अपनी कोशिशें ख़ुशी-ख़ुशी जारी रखनी चाहिए।

हर कोशिश का परिणाम मिलता है, कुछ कोशिशों का तुरंत मिलता तो बाकी कोशिशों के परिणाम आने में समय लगता है। इसलिए हताश न हों, निराश न हों, अपने अभियान में लगे रहें, हर बच्चे को पढ़ना-लिखना सिखाने का लक्ष्य आपको जरूर मिलेगा।

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