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‘नौकरी है जरूरी, मगर बच्चों को पढ़ाना भी’

राजस्थान के स्कूलों में पीपीपी मॉडल का प्रयोग हो रहा है। भविष्य में सरकारी स्कूलों के बारे में क्या फ़ैसला होगा? अभी से कुछ कहना मुश्किल है। किताब बदलने की तैयारी हो रही है। सीसीई का कार्यक्रम चल रहा है। इसकी योजना भर बनाई जा रही है। कक्षा में उसके आधार पर पढ़ाई के लिए न तो शिक्षकों के पास समय है और न ही उसकी तैयारी है। बहुत से स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का काम ठप पड़ चुका है। ऐसे बच्चे पूरे दिन खेलते हैं। पासबुक से नोट्स लेते हैं। चुपचाप बैठे रहते हैं। एक शिक्षक से मैंने सवाल किया कि क्या स्कूल में बैंक के खाते खुलवाने, सीसीई की डायरी भरने और बीएलओ के रूप में जनगणना का काम क्या सच में इतना ज्यादा है कि एक शिक्षक को पढ़ाने का मौका ही न मिले। जानिए ये शिक्षक साथी क्या कहते हैं?

किताब पढ़ते बच्चे

लायब्रेरी में किताब पढ़ते बच्चे।

एक शिक्षक साथी से मैंने सवाल किया, “ये बताइए सर क्या सीसीई का काम इतना ज्यादा है कि स्कूल में पढ़ाई का काम करने का मौका ही न मिले?” ऐसे में उनका जवाब था, “ऐसे शिक्षक जो किसी भी काम के कारण बच्चों को नहीं पढ़ा रहे हैं, वे बच्चों के साथ अन्याय कर रहे हैं।”

वे कहते हैं कि हमारा असली काम तो बच्चों को पढ़ाना ही है। अगर हम यही काम नहीं कर रहे हैं तो स्कूल में होने का क्या मतलब है? प्रिय शिक्षक, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया एक सुंदर जवाब के लिए। ऐसे जवाब उम्मीद का दिया बन जगमगाते हैं। दीपावली के बाद भी दीपावली मनाने का एक बहाना देते हैं।

नौकरी है जरूरी, तो बच्चों को पढ़ाना भी

उन्होंने आगे कहा कि स्कूल में अपनी नौकरी बचाना जरूरी लगता है। एक शिक्षक के लिए उतना ही जरूरी बच्चों को पढ़ाना भी होना चाहिए। एक उच्च प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक साथी बेहद शर्मीले स्वभाव के हैं। लोगों के सामने डेमो करने में उनको झिझक होती है। वे लोगों के सामने अपनी बात को आत्मविश्वास के साथ नहीं रख पाते हैं। वे किसी बात को सैद्धांतिक तौर पर समझने की कोशिश करते हैं, एक-एक लाइन बहुत अच्छे से नोट करते हैं। किसी चीज़ को अच्छी तरह समझने की कोशिश करते हैं। वे हमेशा कहते हैं कि एक बार मुझे सारी बात समझ में आ जाए तो फिर बच्चों को पढ़ाने और लाइव डेमो देने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा। बस मुझे लोगों के सामने डेमो देने के लिए मत कहिए।

मेरा मानना है कि हर किसी को अपने व्यक्तित्व के हिसाब से काम करने का मौका देना चाहिए। शिक्षक साथियों को अपने व्यक्तित्व के मजबूत पहलू के साथ काम करने का मौका देना चाहिए। उनकी ईमानदारी को। उनकी सहजता को। उनकी सरलता को। बच्चों के साथ उनके लगाव को सम्मान की नज़र से देखना चाहिए। उनकी कोशिशों में भरोसा करना चाहिए। उन्होंने कहा, “बच्चों को कक्षा में पढ़ाने वाली बातों के बारे में होने वाली चर्चा काफी उपयोगी रही। जैसे कि वर्ण सिखाने के बाद एक-एक मात्रा पर लगातार एक-दो दिन काम करना और इसके बारे में बच्चों की समझ को पुख़्ता करना।”

नये बच्चों को मिली पढ़ने की ख़ुशी

उन्होंने कहा कि मेरी सबसे बड़ी समस्या है कि बच्चे स्कूल में नियमित नहीं आते। आजकल खेती का काम चल रहा है। घर वाले छोटे बच्चों को बाकी बच्चों की रखवाली के लिए घर पर छोड़ देते हैं। बाकी बच्चों के अभिभािवक काम पर चले जाते हैं और वे स्कूल नहीं जाते। घर वालों को इस बात की बहुत ज्यादा परवाह नहीं है। अभिभावक बहुत ज्यादा जागरूक नहीं है। पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के बाद उन्होंने सीधे दूसरी कक्षा में आए कुछ बच्चों से मिलवाया जो बहुत तेज़ी से पढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

पठन कौशल, पढ़ने की आदत, रीडिंग स्किल, रीडिंग हैबिट, रीडिंग रिसर्च,

एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

पहली कक्षा की किताब को वे बड़ी जिज्ञासा, हैरानी और ख़ुशी वाले भाव से पढ़ रहे हैं। ऐसे चार-पांच बच्चों से उन्होंने मिलवाया। कह सकते हैं कि उनकी कोशिशों का असर साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है। उनके प्रभाव का दायरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। वे पहली कक्षा के अलावा बाकी कक्षाओं के ऊपर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हैं।

उनका कहना है, “अगर बड़ी कक्षाओं पर ध्यान नहीं दे पाए तो वे ख़ुद से पढ़ सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए तो सबकुछ नया है। ऐसे में उनको सपोर्ट की सबसे ज्यादा जरूरी है। अगर वे पढ़ना सीख गये तो आगे की कक्षाओं में उनके साथ इतनी ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं होगी।”

काम का बोझ है, मगर कोई शिकायत नहीं

दूसरी कक्षा में सीधे आने वाले बच्चों का आत्मविश्वास उनकी कोशिशों का आईना है। आख़िर में उनकी व्यस्तता का हवाला देते हैं। वे अभी अपनी स्कूल की तरफ़ से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) के रूप में काम कर रहे हैं। जनगणना में लगी ड्युटी को पूरा कर रहे हैं। वे कह रहे थे कि इस काम के कारण छोटे बच्चों पर ख़ास ध्यान नहीं दे पाया। सोमवार को इस काम से छुट्टी के बाद पहली कक्षा पर फिर से ध्यान देने की कोशिश करेंगे। ताकि उनके पाठ्यक्रम के अनुसार उनकी तैयारी करवाई जा सके।

सरकारी स्कूलों में ऐसे शिक्षकों की मौजूदगी एक उम्मीद की रौशनी की तरह है। जिसे सकारात्मक सहयोग और प्रोत्साहन मिलना जरूरी है। ताकि वे उत्साह के साथ अपने मिशन में आगे बढ़ सके। आख़िर में उनकी एक टिप्पणी, “प्रायवेट स्कूल में आने वाले बच्चे भी तो पढ़ना-लिखना सीखते हैं। वहां के शिक्षकों को कितना कम वेतन मिलता है। सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तो इतना वेतन मिलता है। फिर भी काम करने में आलस करते हैं। सरकारी स्कूलों का नाम ऐसे ही शिक्षकों के कारण खराब होता है। किसी शिक्षक को बच्चों के भविष्य को अंधकार में नहीं धकेलना चाहिए। स्कूल में उनको खाली बैठाकर उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहिए।”

ऐसे शिक्षक वास्तव में शिक्षा के अधिकार क़ानून की रखवाली कर रहे हैं और उसके अस्तित्व को सार्थकता दे रहे हैं। अपने काम से बाकी शिक्षकों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण भी पेश कर रहे हैं। हमें ऐसे शिक्षकों की मौजूदगी को रेखांकित करना चाहिए ताकि उम्मीद की रौशनी बहुत दूर तक फैल सके। मन के अँधेरे को जीतने की राह को आलोकित कर सके।

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